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मध्यप्रदेश

गाय और “लव जिहाद” के सहारे शिवराज सरकार

 

हमारे समाज में प्रेम विवाह की स्वीकार्यता नही है। ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों को जीवन साथी चुनने का विकल्प नहीं देना चाहते, वे उनकी शादी अपनी मर्जी से खुद के धर्म, जाति, गौत्र में ही करना चाहते हैं। अगर मामला धर्म से बाहर का हो तो स्थिति बहुत गंभीर बन जाती है। ऐसे शादियों को बगावत ही नहीं गुनाह की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे प्रेमी जोड़ों के लिये पूरा समाज ही खाप पंचायत बन जाता है। अंतर्धार्मिक विवाह करने वालों को सामाजिक बहिष्कार और सम्मान के नाम पर हत्या तक का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें थोड़ी बहुत संरक्षण की उम्मीद राज्यव्यवस्था से ही थी लेकिन अब वहां भी “लव जिहाद” नाम सियासी फितूर हावी है जिसके बहाने अंतर्धार्मिक विवाहों को नियंत्रित करने के वैधानिक रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

पिछले दिनों उत्तरप्रदेश और हरियाणा के साथ मध्यप्रदेश में भाजपा की राज्य सरकारों ने ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने की घोषणा की है। उत्तरप्रदेश की सरकार की कैबिनेट ने तो इसको लेकर एक अध्यादेश भी पारित कर दिया है। जबकि मध्यप्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने घोषणा की है कि उनकी सरकार 28 से 30 दिसम्बर के बीच होने जा रहे विधानसभा के सत्र में “लव जिहाद” के ख़िलाफ़ विधेयक पेश करने वाली है जिसका ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। मध्यप्रदेश में “लव जिहाद” और इसपर कानून बनाने की बात करना भाजपा और संघ परिवार का एजेंडा तो है ही साथ ही यह शिवराज सरकार की कारगुजारियों और विफलताओं से ध्यान हटाने की कवायद भी है।

पुरानी बोतल में नयी शराब

तथाकथित “लव जिहाद” के ख़िलाफ़ मध्यप्रदेश सरकार जो विधेयक लाने वाली है उसे ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2020’ नाम दिया गया है। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार इस विधेयक मसौदे में जबरदस्ती, लालच या प्रलोभन देकर विवाह करने को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध माना जाएगा तथा इसके लिये 10 साल के कारावास का प्रावधान रखा गया है साथ ही ऐसी शादियों को अमान्य घोषित किया जा सकता। यही नहीं इस तरह की शादियों में सहयोग करने वालों को भी कड़ी कारवाई की जायेगी।

इस क़ानून में इस बात का भी प्रावधान होगा कि अगर कोई अंतर्धार्मिक जोड़ा शादी करते हुये धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं तो इसके लिये पहले उन्हें ज़िला मजिस्ट्रेट को आवेदन देना होगा। जिसके बाद ज़िला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर इस मामले की पड़ताल करेंगें कि कहीं धर्म परिवर्तन किसी दबाव में तो नहीं किया जा रहा है। आवेदन को स्वीकार या खारिज किये जाने दोनों ही स्थिति में प्रशासन द्वारा लड़का-लड़की दोनों पक्षों को सूचित किया जाएगा। यहीं नहीं इस तरह की शादियों में अगर शादी के बाद भी लड़की के परिवार की तरफ़ से जबरन धर्म परिवर्तन से सम्बंधित किसी भी तरह की शिकायत आने पर भी कानून में इसके खिलाफ प्रावधान किया जायेगा। बगैर आवेदन प्रस्तुत किये धर्मांतरण कराने वाले धर्मगुरु, काजी मौलवी या पादरी के लिये भी पांच साल के सजा का प्रावधान किया गया है।

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में ‘धर्म परिवर्तन निरोधक कानून’ बहुत पहले से ही मौजूद है  जिसमें 2013 में शिवराजसिंह चौहान की भाजपा सरकार ने ही संशोधन करते हुये उसे और ज्यादा सख़्त बना दिया था जिसके बाद से प्रदेश का कोई नागरिक अगर अपना मजहब बदलना चाहे तो इसके लिए उसे जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी, अगर धर्मांतरण करने वाला या कराने वाला ऐसा नहीं करता है तो इसके लिये सजा का प्रावधान है। 2013 में हुये संशोधन के बाद “जबरन धर्म परिवर्तन” पर जुर्माने की रकम दस गुना तक बढ़ा दी गयी थी और कारावास की अवधि भी एक से बढ़ाकर चार साल तक कर दी गयी थी। यह संशोधन हिन्दुतत्ववादी संगठनों द्वारा ईसाई समुदाय द्वारा आदिवासियों के धर्मांतरण के आरोप को ध्यान में रखते हुये किया गया था। प्रदेश के ईसाई संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि मध्यप्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है और ईसाईयों के खिलाफ “जबरन धर्मांतरण” के फर्जी केस थोपे जा रहे हैं। 2020 में इस कानून में एक बार फिर संशोधन किया जा रहा है जिसे “लव जिहाद” के खिलाफ कानून के तौर पर पेश किया जा रहा है। इस खेल में नया विषय यही है कि इस बार मुख्य निशाने पर ईसाई नहीं मुस्लिम समुदाय है।

शिवराज की छवि बदलने की कवायद

तमाम तिकड़मों के बाद आखिरकार शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। इससे पहले वे 2005 से 2018 तक लगातार 13 सालों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था और उनकी जगह कांग्रेस के कमलनाथ मुख्यमंत्री बने थे लेकिन पन्द्रह महीने बाद ही  शिवराज एक बार फिर वापसी करने में कामयाब रहे। शिवराजसिंह चौहान भाजपा के नरमपंथी नेता माने जाते रहे हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि नरम हिन्दुतत्व को उन्होंने कांग्रेस के भरोसे छोड़ दिया है। चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका मिजाज बदला हुआ है, वे अपने आपको पहले से अलग पेश करने की कोशिश कर रहे हैं और इस बार अधिक खुले तौर पर लगातार आक्रमक हिन्दुतत्व की तरफ बढ़ते हुये दिखाई पड़ रहे हैं।

तथाकथित “लव जिहाद” के खिलाफ कानून लाने की घोषणा के बाद शिवराज सिंह चौहान ने ‘गो-कैबिनेट’ गठित करने का निर्णय लिया है जिसके आदेश जारी कर दिए गये हैं। अपने तरह के देश के इस पहले कैबिनेट में मुख्यमंत्री के अलावा प्रदेश के पशुपालन, वन, पंचायत और ग्रामीण विकास, राजस्व, गृह और किसान कल्याण विभाग के मंत्री शामिल किए गए हैं। गो-कैबिनेट’ निर्णयों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी इन छह विभाग की होगी। गो-कैबिनेट की पहली बैठक हो चुकी है जिसमें गौ-आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए और आगर-मालवा में स्थित गो-अभयारण्य में गो-उत्पादों के निर्माण के लिए एक अनुसंधान केंद्र स्थापित करने का फैसला लिया गया है।

इसी क्रम में शिवराज सरकार गायों के कल्याण के लिये अलग से टैक्स लगाने की योजना बना रही है साथ ही मुख्यमंत्री ने प्रदेश में गौशाला संचालन के लिए कानून बनाने, और आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों को अंडे के बजाय गाय का दूध दिये जाने की भी घोषणा की है।

नेटफ्लिक्स पर प्रसारित वेब सीरीज़ ‘अ सूटेबल बॉय’ के एक एपिसोड में मंदिर के अंदर चुंबन के दृश्य दिखाने पर भी शिवराज सरकार की प्रतिक्रिया काफी सख्त रही है। दरअसल मीरा नायर के इस वेब सीरीज़ को लेकर भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय सचिव गौरव तिवारी द्वारा आरोप लगाया गया था कि इसमें एक किसिंग सीन मध्यप्रदेश के महेश्वर क़स्बे के मंदिर में फिल्माया गया है, जिससे लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। गौरव तिवारी द्वारा आरोप लगाया गया था कि इस वेब सीरीज़ की पटकथा में मुस्लिम युवक को हिंदू महिला के प्रेमी के तौर पर मंदिर प्रांगण में किसिंग करते हुये दिखाया गया है जिससे लव-जिहाद को बढ़ावा मिलता है। इससे  हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचा है। इसके बाद मध्यप्रदेश पुलिस ने आईपीसी की धारा 295 ए (धार्मिक भावनाओं के आहत होने संबंधी धारा) के तहत नेटफ्लिक्स के दो अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है।

हाशिये पर असली एजेंडे

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार भले “लव जिहाद” और “गायों” की चिंता में दिखाई पड़ रही हो लेकिन राज्य के अर्थव्यवस्था की हालत बहुत पतली है। सरकार कर्ज के सहारे चल रही है, सूबे की माली हालत तो पहले से ही खराब थी, कोरोना और जीएसटी में कमी के कारण सरकार के राजस्व में भारी कमी आई है। हालत यह हैं कि इस साल मार्च में चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से पिछले 8 महीने के दौरान ही शिवराज सरकार अभी तक कुल दस बार में करीब 11500 करोड़ रूपये का कर्ज ले चुकी है। इससे पहले दिसम्बर 2018 से फरवरी 2020 के बीच कमलनाथ की सरकार ने करीब 8500 करोड़ रूपये का कर्ज लिया था। खस्ता माली हालत के चलते ही राज्य के 2020-21 के बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य सहित सामाजिक कल्याण से जुड़े विभागों के बजट में कटौती की गयी है। महामारी के दौरान भी राज्य के स्वास्थ्य सेवाओं के बजट में पिछले बजट के मुकाबले 316 करोड़ रूपये की कमी की गयी है। इसी तरह से इस बार के बजट में किसानों के कर्जमाफ़ी के लिये अलग से कोई बजट नहीं रहा गया है जबकि पिछले साल के बजट में कांग्रेस की सरकार ने इसके लिये आठ हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया था। इसी प्रकार से महिलाओं और बच्चों से सम्बंधित योजनाओं के बजट में 301 करोड़ रूपये, पंचायत राज संस्थाओं  के बजट में 1465 करोड़ रूपये, सामाजिक न्याय विभाग के बजट में करीब 2100 करोड़ रूपये तथा स्कूली शिक्षा के बजट में पिछले साल के मुकाबले करीब 6,796 करोड़ रूपये की कटौती की गयी है।

कमलनाथ के 15 महीनों के मुख्यमंत्रित्व काल को छोड़ दे तो भाजपा दिसम्बर 2003 से मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज है, खुद शिवराज सिंह चौहान 2005 से मुख्यमंत्री हैं। वे मध्यप्रदेश में अपने शासन को विकास के माडल के तौर पर पेश करते रहे हैं। लेकिन जमीनी हालात बताते हैं कि तथाकथित मध्यप्रदेश माडल के दावे खोखले हैं, तमाम आंकड़ेबाजी और दावों के बावजूद भाजपा के लम्बे शासनकाल के दौरान मध्यप्रदेश “बीमारु प्रदेश”” के तमगे से बहुत आगे नहीं बढ़ सका है। मई 2010 में मध्यप्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री शिवराज ने मध्यप्रदेश के सर्वांगीण और समावेशी विकास के लिये 70 सूत्रीय संकल्प प्रस्तुत किया था जिसमें प्रदेश में खेती को लाभ का धंधा बनाने, मूलभूत सेवाओं के विस्तार के साथ अधोसंरचना का निरंतर सुदृढ़ीकरण करने, निवेश का अनुकूल वातावरण निर्मित करने, सबको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था उपलब्ध करने,  सुदृढ़ सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था स्थापित करने जैसे बिंदु शामिल थे। लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद यह संकल्प शिवराज सरकार के कागजों में भी नहीं बचे हैं।

मध्यप्रदेश की मानव विकास सूचकांकों के आंकड़े शर्मिंदा करने वाले हैं आज भी मध्यप्रदेश शिशु मृत्यु दर में पहले और कुपोषण में दूसरे नंबर पर बना हुआ है। मध्यप्रदेश के स्कूल भी लगातार शिक्षकों और संसाधन की कमी से जूझ रहे हैं। मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में अभी भी 40 हजार से ज्यादा शिक्षकों की कमी है और करीब बीस प्रतिशत स्कूल एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। बिना शिक्षकों के स्कूल चलाने के मामले में मध्यप्रदेश देश के अव्वल राज्यों में शामिल है जिसके चलते स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर लगातार गिरता गया है और बच्चे अपनी कक्षा अनुसार नही सीख पा रहे हैं।

चौथी बार सत्ता में आने के बाद शिवराजसिंह चौहान की सरकार ने आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश का नया शिगूफा छोड़ा है। हाल ही में इसके लिये 2023 तक का रोड मैप जारी किया गया है जिसमें फिर मध्यप्रदेश देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाने, कृषि क्षेत्र को भी लाभकारी व्यवसाय बनाने, आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ावा देने जैसे वही घिसे-पिटे वादे दोहराये गये हैं जिसे शिवराजसिंह चौहान पिछले पंद्रह वर्षों से दोहराते रहे हैं।

संघ की सक्रियता और छाप

पिछले कुछ महीनों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत लगातार भोपाल के दौरे पर रहे हैं। संघ के सांगठनिक बैठकों के लिये भोपाल के चुनाव को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा। इस दौरान संघ ने 2021 की जनगणना के दौरान आदिवासियों के बीच जागरूकता अभियान का फैसला किया गया है जिससे वे जनगणना में अपना धर्म हिंदू लिखवायें। साथ ही इन बैठकों में भोपाल सहित देश भर में सीएए,एनआरसी के खिलाफ हुये आंदोलनों और तथाकथित “लव जिहाद” पर भी गहन चर्चा की गयी है।

मध्यप्रदेश वह सूबा है जहाँ संघ परिवार अपने शुरुआती दौर में ही दबदबा बनाने में कामयाब रहा है, यहां संघ की सामाजिक स्तर पर गहरी पैठ है। मध्यप्रदेश में अल्पसंख्यकों की अपेक्षाकृत कम आबादी होने के बावजूद साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील बना रहता है। मध्यप्रदेश में “गाय” और “धर्मांतरण” ऐसे हथियार है जिनके सहारे मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना बहुत आसान और आम हो गया है अब इसमें “लव जिहाद” के शगूफे को भी शामिल कर लिया गया है। अपने पिछले कार्यकालों के दौरान शिवराजसिंह चौहान भले ही खुद को विनम्र और सभी वर्गों का सर्वमान्य नेता दिखाने की कोशिश करते रहे हों लेकिन इसी के साथ ही वे बड़ी मुस्तैदी और बारीकी के साथ प्रदेश में संघ का एजेंडा लागू करते रहे हैं।

भाजपा ने मध्यप्रदेश में सत्ता में आने के बाद 2004 में ही ‘मध्यप्रदेश गौवंश वध प्रतिशेष अधिनियम’ लागू कर दिया था, 2012 में इसे और अधिक सख्त बनाने के लिये इसमें संशोधन किया गया जिसमें गौ-वंश वध के आरोपियों को स्वयं अपने आप को निर्दोष साबित करने जैसा प्रावधान जोड़ा गया। मध्यप्रदेश के भाजपा सरकार द्वारा स्कूलों में योग के नाम पर “सूर्य नमस्कार” अनिवार्य करने की कोशिशों को लेकर कई वर्षों से विवाद रहा है। राज्य सरकार द्वार लम्बे समय से स्कूलों में “सूर्य नमस्कार” को अनिवार्य बनाने की कोशिशें की जाती रही हैं जिसका कई मुस्लिम और ईसाई संगठनों की तरफ से लगातार विरोध किया जाता रहा है। इन सबके बावजूद 2007 में राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों में सूर्य नमस्कार, मंत्रोच्चारण और प्राणायाम को अनिवार्य बना दिया था। इसके बाद यह मामला कोर्ट में गया। जिसके बाद 24 जनवरी 2007 को जबलपुर हाईकोर्ट की ओर से जारी एक अंतरिम आदेश में कहा गया है कि राज्य सरकार किसी भी विद्यार्थी को सूर्य नमस्कार के लिए बाध्य नहीं कर सकती है। इसके बाद साल 2009 में  जबलपुर हाईकोर्ट पीठ द्वारा कैथोलिक बिशप काउंसिल आफ मध्यप्रदेश की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह शैक्षणिक संस्थाओं में सूर्य नमस्कार और प्राणायम को अनिवार्य नहीं करे। साल 2016 में एक बार फिर राज्य के स्कूल एवं उच्च शिक्षा राज्य मंत्री द्वारा घोषणा की गयी कि सूर्य़ नमस्कार को सूबे के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा और प्रत्येक शनिवार को आयोजित होने वाली बाल सभा की कार्यसूची में सूर्य़ नमस्कार को शामिल किया जाएगा।

इसी प्रकार से 2009 में राज्य सरकार ने प्रदेश भर के सरकारी स्कूलों में बँटने वाले मिड डे मील से पहले बच्चों से भोजन मंत्र का पाठ कराने के आदेश दिये गये थे जिसको लेकर काफी विवाद की स्थिति बनी। मुस्लिम संगठनों का कहना है कि ‘सरकार का यह आदेश मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों के खिलाफ है, मुसलमान भोजन से पहले बिसमिल्लाह पढ़ते हैं इसलिए उनके लिए भोजन मंत्र की अनिवार्यता का कोई औचित्य नहीं है और यह उनके धार्मिक मामलों में दखल की तरह है’। मध्यप्रदेश के क्रिश्चियन एसोसिएशन द्वारा भी सरकार के इस फैसले से नाखुशी जताई गयी थी।

मध्यप्रदेश में मिड-डे मील में बच्चों को अंडा देने को लेकर काफी पुराना विवाद रहा है। दरअसल प्रदेश में कुपोषण की भारी समस्या है। सूबे के 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, कुपोषण के सबसे ज्यादा शिकार आदिवासी बहुल जिले हैं। कुपोषण से निपटने के लिए अंडा एक अच्छा पोषक आहार हो सकता है। लेकिन मिड डे मील में अंडा परोसने के प्रस्ताव को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कई बार ठुकराया जा चूका है। इसको लेकर लगातार राजनीति होती रही है। इसको लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते रहे हैं कि “जब तक मैं मध्यप्रदेश का सीएम हूं, मिड डे मील में अंडा नहीं बांटा जाएगा, मानव शरीर शाकाहारी खाने के लिए बना है और इसे शाकाहारी खाना ही दिया जाना चाहिए।”  पिछले दिनों उन्होंने आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों को अंडे के बजाय गाय का दूध दिये जाने की भी घोषणा की है। गौरतलब है कि अधिकांश कुपोषित बच्चे आदिवासी और दलित समुदाय से आते हैं जो कि अमूमन मांसाहारी है और अंडा उनके खानपान में शामिल रहा है और अगर किसी बच्चे के घर में पहले से अंडा खाया जाता है और वो मिड डे मील में अंडा खाना चाहता है तो उस पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं होना चाहिए।

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा साल  2011 में भगवत गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की गयी थी। 13 नवंबर 2011 को इंदौर के एक स्कूल में गीता पढ़ाने के निर्णय की घोषणा करते हुए शिवराज सिंह ने कहा था कि “पवित्र ग्रन्थ गीता को स्कूलों में पढ़ाया जाएगा भले ही इसका कितना ही विरोध क्यों न हो।” सरकार के इस कदम का नागरिक संगठनों और अल्पसंख्यक समाज द्वारा पुरजोर विरोध किया गया था। बाद में ईसाई संगठनों से जुड़े फादर आनन्द मुटुंगल मुख्यमंत्री की इस घोषणा को क्रियान्वित होने से रोकने के लिये जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी जिसे 2012 में हाईकोर्ट द्वारा यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि “गीता एक भारतीय दर्शन है न कि धर्म”। कोर्ट के इस फैसले के बाद शिवराज सरकार द्वारा गीता को स्कूली पाठच्यक्रम में शामिल करने का विधिवत प्रावधान कर दिया गया।

इसके बाद 1 अगस्त 2013 को राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना जारी कर मदरसों में भी गीता पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया था। जिसमें मध्यप्रदेश मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त सभी मदरसों में कक्षा तीन से कक्षा आठ तक सामान्य हिन्दी की तथा पहली और दूसरी की विशिष्ट अंग्रेजी और उर्दू की पाठयपुस्तकों में भगवत गीता में बताये प्रसंगों पर एक एक अध्याय जोड़े जाने की अनुज्ञा की गयी थी और इसके लिए राज्य के पाठ्य पुस्तक अधिनियम में बकायदा जरूरी बदलाव भी किए गए थे। विधानसभा चुनावों से मात्र चार महीने पहले लिए गए इस फैसले ने काफी विवाद पैदा कर दिया था बाद में विरोध के चलते इस निर्णय वापस ले लिया गया था।

2009 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बाल पत्रिका देवपुत्र को सभी स्कूलों में अनिवार्य तौर पर भेजे जाने का फैसला लिया था। दरअसल ‘देवपुत्र’ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अनुषांगिक संगठन विद्या भारती से संबद्ध पत्रिका है, इसके प्रकाशक एवं संपादक कृष्ण कुमार अष्ठाना हैं जो कि आरएसएस मालवा प्रांत के संघ चालक रह चुके हैं। इस दौरान पत्रिका ने पूर्व सरसंघ चालक एम।एस। गोलवलकर पर केन्द्रित विशेष अंक निकाला था। जाहिर है प्रदेश के सभी स्कूलों में इस पत्रिका को अनिवार्य रूप से भेजने के पीछे सरकार की यह मंशा थी कि वहां पढ़ने वाले सभी बच्चे आरएसएस की विचारधारा के बारे में जान सकें। बाद में इस पत्रिका के खरीद में वित्तीय अनिमित्तायें सामने आयीं जिसकी वजह से इस योजना को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा।

कांग्रेस का रुख

मध्यप्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर कमलनाथ के आने के बाद से कांग्रेस लगातार नरम हिन्दुतत्व के रास्ते पर आगे बढ़ी है और इस दौरान विचारधारा के स्तर पर वो भाजपा की बी टीम बन कर रह गयी है। 2018 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान कमलनाथ ने ऐलान किया था कि ‘मध्यप्रदेश में कांग्रेस के सत्ता में आने पर उनकी सरकार प्रदेश के हर पंचायत में गोशाला बनवायेगी और इसके लिये अलग से फंड उपलब्ध कराया जायेगा’।  कमलनाथ अभी भी उसी लाईन पर चलते हुये दिखाई पड़ रहे हैं। शिवराज सरकार के “गौ–कैबिनेट” गठित करने के निर्णय पर उन्होंने कहा है कि ‘2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान शिवराज सिंह और भाजपा ने गायों के लिए एक अलग विभाग (मंत्रालय) स्थापित करने का वादा किया था, लेकिन अब केवल ‘गो-कैबिनेट’ की स्थापना की जा रही है।’ यही नहीं कमलनाथ ने आरोप लगाया है कि “शिवराज सरकार ने गोमाता के संरक्षण व संवर्धन के लिए कुछ भी नहीं किया, उल्टा कांग्रेस सरकार द्वारा गोमाता के लिए बढ़ाई गयी चारा राशि को भी कम कर दिया है।” हालांकि इसके बावजूद भी गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा कमलनाथ के सॉफ्ट हिन्दुत्व को सिर्फ स्टंट मानते हैं।  

हालांकि कांग्रेस ने शिवराज सरकार के “लव जिहाद” के खिलाफ कानून बनाने की घोषणा पर यह कहते हुये विरोध जताया है कि मध्यप्रदेश में महिला अपराध बढ़ रहे हैं सरकार को पहले उस ओर ध्यान देना चाहिये और इस विधेयक की जगह सरकार को महिला अपराध रोकने के लिए कोई विधेयक लाना चाहिए लेकिन अभी तक इसपर कमलनाथ या किसी और बड़े नेता का बयान नहीं आया है। शायद इसीलिये  गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कांग्रेस से यह पूछा है कि वो प्रस्तावित विधेयक के पक्ष में हैं या खिलाफ में?

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