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हाथी जैसा पर्व सोहराय

 

    भारत एक विभिन्न जातियों एवं संस्कृतियों का धर्मनिरपेक्ष देश है। यहाँ भिन्न-भिन्न मूलनिवासी या जनजातिय समुदाय निवास करते हैं। भारत में जनसंख्या की दृष्टि से गोंड और भील आदिवासी समुदाय के बाद तीसरा बड़ा समुदाय है संथाल समुदाय। संताल भारत के विभिन्न राज्यों जैसे झारखण्ड, असम, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल के अलावा त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम में निवास करते हैं। भारत के बाहर अन्य देशों जैसे बांग्लादेश, नेपाल आदि में भी आज उनका निवास स्थान है। भारत में संथालों की जनसंख्या लगभग 1.5 करोड़ है। इनकी मुख्य भाषा संथाली है। इस समुदाय का सबसे बड़ा त्यौहार ‘सोहराय पर्व’ है उसके बाद बाहा पर्व।

संतालों के कैलेंडर के अनुसार सोहराय माह में अमावस्या और पूर्णिमा को, फसल के कटने या खेत खलिहान के काम खत्म होने के बाद यह पर्व मनाया जाता है। सोहराय शब्द को इस अर्थ में भी समझा जा सकता है – सोहराय यानी बधाई अथवा शुभकामना।

 यह त्यौहार पालतू जानवरों और मानव के बीच गहरा प्रेम स्थापित करता है। सृष्टि के आरंभ से ही संताल समुदाय कृषि कार्य बैलों, भैंसों के माध्यम से ही की करता आया है। इसलिए सोहराय पर्व में पशुओं की माता लक्ष्मी की तरह पूजा की जाती है। इस दिन बैलों व भैंसों की पूजा कर किसान वर्ग धन-संपत्ति की वृद्धि की कामना करते हैं। जहाँ जहाँ संथाल समुदाय रहते हैं वहाँ यह पर्व जरूर मनाया जाता है।  Image result for sohrai

कब और कैसे शुरू हुआ यह त्यौहार यह तो कहना मुश्किल है। वाचिक रूप से सुनने और सुनाने की परम्परा रही है। आदिवासियों के इतिहास में ऐसा माना जाता है कि धरती की रचना के बाद ईश्वर द्वारा मानव को निर्मित किया गया। पेट भरने के लिए कृषि उपज बनाया गया तथा बीज व फसल दिये गये। फसल को उपजाने के लिए ईश्वर ने पालतू पशु जैसे गाय, बैल और भैंसो की वृद्धि कर सहचारी बनाया। आदि समय की बात है कि जब किसान इन पशु व जानवरों की सहायता से सम्पन्न कृषि कार्य के चलते काफी धनवान हो गए, तब वे इन पालतू पशुओं के साथ दुर्व्यवहार करने लगे। वे गाय, बैलों को धिक्कारने एवं मारने पीटने लगे। गौशालाओं को गन्दा रखने लगे। अंत में इन जानवरों ने ईश्वर के पास शिकायत की कि अब वे मानव के पास नहीं रहेंगे। यह जानकर मरांग बुरु के रूप में ईश्वर ने सभी गाय, भैंसों को गायब कर दिया।

तब आदिवासी संथालों के गांव में महामारी और अकाल पड़ने लगा। पीड़ित होकर संतालों ने पूजा स्थल ‘जाहेर’ में पूजा पाठ किया जिससे इन्हें पता चला कि गौ और मवेशियों की देखभाल न करने एवं उनका अपमान करने की वजह से यह सब हुआ है। फिर संतालों ने मरांग बुरु से निवेदन किया कि उन्हें ये पशु वापस दिये जाएँ अन्यथा उनका जीवन यापन करना मुश्किल हो जायेगा। यह सब सुनकर गाय, बैल, भैंसों ने कहा कि हमें वापस लाने के लिए आपलोग पूजा पाठ कीजिए। नाच-गान के साथ-साथ बधाई और शुभकामनाओं के साथ हमें घर लाएं और जब घर गौशाला पर हम कदम रखेंगे तो हमारे द्वारा अर्जित धन से ही हमारा स्वागत कीजिए। तब से ही गौशाला के द्वार पर चावल के आटा से विभिन्न चित्र बनाकर सजाया जाता है। धान का एक बोझा रखा जाता है, धान की बाली से माला पहनाया जाता है और जानवरों को नचाया जाता है। सोहराय पर्व में यह प्रथा तब से आज तक प्रचलित है।

       दूसरी कथा यह भी है कि एक अनाथ परिवार था। उनमें पांच भाई और एक बहन थी। बड़ी बहन ने इन पांचों भाइयों को पाल-पोस कर बड़ा किया था। बड़ी बहन के लिए पांचों भाइयों के मन में बहुत श्रद्धा थी। उस श्रद्धा के प्रतीक के रूप में आज भी सोहराई पर्व पर बड़ी बहन को जरूर घर आने का निमंत्रण दिया जाता है। उसके नाम पर सोहराय गीत भी है जिसे आज भी बहूत खुशी और उत्सव के साथ गाया जाता है। Image result for sohrai

यह पर्व संथाल समुदाय के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि धरती के बड़े जीव – हाथी से इस पर्व की तुलना की गई है संथाली में कहते हैं कि ‘हाथी लेकान पर्व’ यानि ‘हाथी जैसा पर्व’।

यह पर्व झारखण्ड के छोटानागपुर के दक्षिण क्षेत्र, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में दिवाली के एक या दो दिन के बाद मनाया जाता है। पर संथाल परगना में यह जनवरी माह में मनाया जाता है।

संताल परगना में इस पर्व के जनवरी में मनाये जाने के पीछे अंग्रेजों ब्रिटिश सरकार के प्रतिरोध की भी बात है। जब संथाल परगना (बिहार के दक्षिणी भाग) में सिदो-कान्हू के नेतृत्व में 30 जून 1855 को बड़ा विद्रोह -‘संथाल हूल’ किया गया। अंग्रेज सरकार इस विद्रोह से काफी भयभीत हुई। इस विद्रोह को दबाने के लिए धारा 144 लागू किया गया एवं मार्शल लॉ लगाया गया। इसे 20 नवंबर 1855 को लागू किया गया और जनवरी 1856 में हटाया गया।

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इस कारण से संथाल परगना में सोहराय पर्व का आयोजन नहीं हो सका। पर सोहराय पर्व तो मनाना था और अंग्रेज़ सरकार के विरोध में अपनी अस्मिता, एकता, संस्कृति, परंपरा को प्रदर्शित करना था। इसी वजह से यहाँ निर्णय लिया गया कि 5 जनवरी के बाद सोहराय पर्व का आयोजन हो और तब से संथाल परगना में इसका आयोजन जनवरी महीना में होता आ रहा है। इस विद्रोह का प्रभाव बिहार में भी पड़ा था इसलिए। वहाँ के संतालों के बीच भी जनवरी माह में ही इसे पर मनाया जाता है। असम व बांग्लादेश के संथाल, संथाल परगना के प्रवासी ही हैं इसलिए वहाँ भी जनवरी में ही सोहराय पर्व को बहूत धूमधाम से मनाते हैं।

       यह पर्व पाँच दिनों तक मनाया जाता है। पहला दिन (गोट पूजा) गांव के नायकों (पुजारियों) के नेतृत्व में सभी पुरुष स्नान कर ‘जाहेर एरा’ की पूजा करते हैं। मुर्गे की बलि देकर हड़िया चढ़ाई जाती है। रोगों से मुक्ति व झगड़ों से बचने की मन्नत मांगी जाती है। युवकों के दल घर-घर जाकर गाय बैल की पूजा करते हैं। दूसरे दिन गोडा साफ कर सजाया जाता है। गाय के पैर धोए जाते हैं तथा सींगों पर तेल व सिंदूर लगाया जाता है। पितरों और देवी देवताओं के नाम पर मुर्गे और सूअर की बलि दी जाती है। पर्व के तीसरे दिन खुटाव गांव के माझी से होकर साधारण गृहस्थ तक अपने अपने पशुओं को धान की बाली तथा मालाओं से सजाते हैं और नगाड़ा-मांदर बजा कर उन्हें प्रफुल्लित करते हैं। चौथे दिन युवक-युवतियों के दल प्रत्येक गृहस्थ के यहाँ चावल, दाल, नमक एकत्रित करते हैं। पांचवें दिन इन वस्तुओं से खाना पकता है तथा सह भोज का आयोजन किया जाता है। हड़िया पीने के बाद समारोह का समापन हो जाता है। Image result for sohrai

       सोहराई खोखर पेंटिंग भी इन संथालों की ही पेंटिंग है। यह झारखण्ड के हजारीबाग जिले में प्रचलित है। यह एक पारंपरिक और अनुष्ठानिक भित्ति कला है। भित्ति चित्र कलाकृति का एक टुकड़ा होता है जिसे सीधे दीवार की छत या अन्य स्थायी सतहों पर लगाया जाता है। इस कला में लाइनों, डाट्स, जानवरों के चित्र व पौधों को चित्रित किया जाता है जो इस कला की एक प्रमुख विशेषता है। इस कला में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध विभिन्न रंगों की मिट्टी का उपयोग करके स्थानीय फसल और शादी के अवसरों के दौरान यह स्थानीय आदिवासी महिलाओं द्वारा बनाया जाता है पर यह प्रथा अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है।

      पशुधन का मान सम्मान इस पर्व का मुख्य उद्देश्य तो है ही, मनुष्य एवं पशुओं के साथ सामंजस्य द्वारा पारिस्थितिकी सन्तुलन का संदेश भी इस पर्व में छिपा है। इसके साथ 1855 की क्रांति, जो संताल – हूल और सिदो-कान्हू की बलिदान की कहानी है, की भी यादें जुड़ी हैं। पशुधन की प्रतिष्ठा के साथ साथ आदिवासियों के नृत्य, गीत, भित्ति चित्र की परम्परा को भी ले चलना इस पर्व का उद्देश्य है, ऐसे ही नहीं कहा जाता है इसे ‘हाथी लेकान पर्व’।

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