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चौथा स्तम्भ लहू लुहान

 

उत्तर प्रदेश में एक बार फिर पत्रकारिता और राजनीति की पवित्रता पर काला धब्बा लग गया है। मार्च के दूसरे सप्ताह पत्रकारिता फिर से लहू लुहान और असहाय दशा में नजर आई। लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली मीडिया घायल दशा में कराह उठी। तीन दशक पहले मुलायम सिंह कार्यकाल में अखबार घरानों पर हल्ला बोल जैसी चर्चित घटना को अंजाम देकर महीनों दहशत फैला देने वाली समाजवादी पार्टी के मौजूदा मुखिया व पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव 11 मार्च को पिता मुलायम सिंह यादव के नक्शे कदम पर चलते हुए एक बार फिर यह संदेश देने में कामयाब रहे कि चौथे स्तम्भ को उनके मुताबिक चलना होगा, नहीं तो हंटर चलाकर अपने हिसाब से उसको औकात में रखा जाएगा। बहरहाल, घटना से गुस्साए पत्रकारों ने समाजवादी पार्टी के मुखिया व पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव समेत बीस लोगों पर मुकदमा दर्ज करा दिया। मामला यहीं नहीं थमा, तीन दिन बाद सपा कार्यकर्ताओं की तरफ से पत्रकारों पर भी क्रास केस दर्ज करा दिया गया। स्वाभाविक तौर पर दोनों तरफ से तनातनी की हालत है। दोनों पक्ष पर आरोप – प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि इस लोमहर्षक घटना के कई अलग अलग निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं।

 एक तरफ प्रेस कॉन्फ्रेंस में गलत सवाल पूछ लेने पर पूरे पत्रकार ग्रुप की दौड़ा दौड़ा कर पिटाई करने जैसा शर्मनाक मामला है, तो दूसरी तरफ पत्रकारों के ‘चंगेजी – सेना’ की कार्यशैली को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में नए रंग – रूट मार्का कतिपय पत्रकारों की कार्य शैली अक्सर बहुत गैर जिम्मेदाराना हो जाती है। कभी कभी तो सार्वजनिक प्रदर्शन बेहद शर्मनाक, यहाँ तक कि पत्रकार बिरादरी को बगल झांकने को मजबूर कर देती है। हालांकि आए दिन इस पर दबी जुबान आपत्ति भी की जाती रही है पर रवैए में कमी आने के बजाए दिनों दिन ‘ मर्ज ‘ बढ़ता ही जा रहा है। इस घटना में भी आलोचना, दोनों की कार्यशैली को लेकर शुरू हो गयी है। बहरहाल, पत्रकारों में गुस्सा और असंतोष व्याप्त है। इस बीच यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि किसी एक की करनी का खामियाजा समूचे ग्रुप को क्यों भुगतना पड़े? 

 ग्यारह मार्च को मुरादाबाद शहर के फाइव स्टार होटल हॉली डे रीजेंसी में समाजवादी पार्टी के मुखिया व प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गयी थी। पत्रकारों को बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस में आमन्त्रित किया गया। पत्रकारों का समूह तय समय पर पहुंचा तो वहाँ पत्रकारों को घण्टों इन्तजार करना पड़ा। अखिलेश यादव वहाँ दो घन्टे लेट पहुंचे। इसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हो गयी। बताया जा रहा है कि सवाल – जवाब के दौरान एक – दो पत्रकारों ने नरेंद्र मोदी के साथ अखिलेश यादव के पारिवारिक सम्बन्ध और आजम खान से जुड़े सवालों को बारी बारी से पूछना शुरू कर दिया। इस पर अखिलेश यादव का पारा अचानक चढ़ गया।

बताया जा रहा है कि एक पत्रकार के दुबारा सवाल पूछने पर अखिलेश यादव का पारा इस कदर चढ़ गया कि वे गुस्से में पत्रकारों को अनाप – शनाप बोलने लगे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नाराज अखिलेश यादव बोले – कभी ऐसे सवाल बीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी कर लिया करो। बताया जा रहा है कि अखिलेश यादव का गुस्सा बाद में भी कम नहीं हुआ। अखिलेश यादव के वहाँ से हटते ही आठ- दस लोगों का समूह पत्रकारों पर टूट पड़ा। धक्का देने के साथ ही लात – जूता और घूंसा- थप्पड़ चलाने लगे। एक पत्रकार जमीन पर गिर पड़ा। एक अन्य पत्रकार का सिर फूट गया। कई पत्रकारों के कपड़े फटे, जबकि कई के चश्मे टूट गए। करीब पंद्रह मिनट चली पिटाई में आधे दर्जन से ज्यादा पत्रकार चोटिल हुए। आरोप लगाया गया कि उनकी पिटाई करने वालों में पार्टी कार्यकर्ता, समर्थक और सुरक्षा गार्ड शामिल रहे।

इलेक्ट्रानिक और प्रिण्ट मीडिया से जुड़े पत्रकारों – कैमरा पर्सन को दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया। वहाँ काफी देर तक अफरा तफरी का माहौल रहा। करीब घन्टे भर बाद काफी मशक्कत के बाद पुलिस वाले मीडिया कर्मियों को सुरक्षित दशा में होटल परिसर से बाहर निकाल पाए। इस घटना की सूचना जंगल में आग की तरह फैली। आनन – फानन घायल पत्रकारों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहाँ उनकी मरहम पट्टी कराई गयी। इस घटना से नाराज पत्रकारों ने राजधानी लखनऊ में पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव, पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक समेत बीस लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया। दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश के कई जिला, तहसील मुख्यालयों पर पत्रकारों ने विरोध जाहिर करने के बाद ज्ञापन भी सौंपा। इस शर्मनाक घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया।

सवाल किए जाने लगे कि अखिलेश यादव जैसे अनुभवी नेता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचानक इस तरह की घटना कैसे हो गयी? क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस को डिस्टर्ब करा देना किसी की साजिश थी या महज संयोग। लोगों के बीच सवाल ये भी उठाए जा रहे हैं कि आखिर गुस्से पर क्यों कंट्रोल नहीं कर पाए अखिलेश यादव? बहरहाल, पत्रकारों में काफी नाराजगी है। सियासी गलियारे में लोग चटकारे ले रहे हैं। कहा जा रहा है कि मुलायम सिंह वाली समाजवादी पार्टी में तीन दशक पहले मीडिया को लेकर जो सोच थी, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में अभी भी वही सोच और नियति बरकरार है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी ने इस घटना को शर्मनाक बताया है। उन्होंने कहा कि राजनेताओं को मर्यादा में रहकर अपनी असहमति दर्ज करानी चाहिए, खासकर तब तो और सतर्कता बरतनी चाहिए जब यह लगे कि कुछ लोगों के चलते समूचा मामला ही बिगड़ जाने वाला है। याद रखना चाहिए कि पत्रकारों की पिटाई कोई मामूली घटना नहीं है। श्री त्रिपाठी यह सलाह भी देते हैं कि मुरादाबाद सरीखी घटना पर पत्रकारों को भी अपनी कार्य शैली पर विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसे कौन से हालात थे जिसकी वजह से मुरादाबाद में इस कदर पत्रकारों की पिटाई हो गयी। प्रयागराज के वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र का तर्क थोड़ा अलग है। श्री मिश्र पत्रकारों पर हुए हमले को बेहद शर्मनाक बताते हुए उच्च स्तरीय जाँच की मांग करते हैं। वे साफ शब्दों में सवाल करते हैं कि एक दो व्यक्तियों के करतूत का गुनहगार पूरा पत्रकार समूह कैसे हो गया?

भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के संयोजक भगवान प्रसाद उपाध्याय और प्रदेश अध्यक्ष मथुरा प्रसाद धुरिया पत्रकारों पर हुए हमले से बेहद खफा नजर आते हैं। इसी प्रकार प्रतापगढ़ के पत्रकार अजय पांडेय ने घटना को बेहद शर्मनाक बताया है। हाईकोर्ट प्रयागराज के वरिष्ठ अधिवक्ता व कवि जय कृष्ण राय तुषार इस मामले में कुछ अलग ही राय रखते हैं। जिक्र छिड़ने पर वे कहते हैं कि वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन पत्रकार समूह पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान किया गया हमला निश्चित रूप से चौंकाता है। इसका सामाजिक संदेश भी गलत गया है। वे सुझाव देते हैं कि इसकी पुनरावृति ना होने पाए, ऐसी जिम्मेदारी पत्रकार समूह और राज नेताओं दोनों को लेनी चाहिए।

पत्रकारों की पिटाई की बात स्वीकार करने वाले अखिलेश यादव का सुर दो दिन बाद अचानक बदला नजर आया 13 मार्च को रामपुर पहुंचे पूर्व मुख्यमन्त्री व सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पत्रकारों से कहा कि मुरादाबाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनके ऊपर हमले की साजिश थी, जिससे वहाँ अचानक अराजक स्थिति पैदा हो गयी। इसमें कुछ पत्रकार घायल भी हो गए। पत्रकारों के यह पूछने पर कि उस अराजक स्थिति में उनके सुरक्षाकर्मी, कार्यकर्ता व समर्थक क्यों नहीं घायल हुए, सिर्फ पत्रकार ही क्यों? अखिलेश यादव ने बात टाल दी और वे हँस के आगे बढ़ गए। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के यू टर्न लेने या भुक्तभोगी पत्रकारों के कालर को झाड़, धूल हटाने की कोशिश हकीकत को झुंठला नहीं सकती। इस घटना ने राजनेताओं और पत्रकार बिरादरी दोनों को आत्म अवलोकन करने का अवसर प्रदान कर दिया है।

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