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मुनादी

थोड़ी सी राजनीति भी

 

  • किशन कालजयी

 

प्राचीन काल से ही सेवा भारतीय समाज का प्रमुख संस्कार रहा है। इसलिए शासकीय गतिविधियों के अलावा भी समाज में धर्म, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग और सामुदायिक सद्भाव की समृद्ध परम्परा रही है। इसलिए भारत में संस्था और संगठन कोई नयी बात नहीं है, हाँ समय के साथ साथ इसकी कार्य पद्धतियाँ और इसके स्वरूप बदलते रहे हैं। भारत में समाज-सुधार गतिविधियों के साथ 19वीं शताब्दी से सामजिक संस्थाओं और संगठनों की शुरूआत होती है। 1816 में राजाराम मोहनराय द्वारा स्थापित ब्रह्मसमाज,1865 में अमेरिका के मैडम ब्लावत्सकी एवं कर्नल आल्काट द्वारा स्थापित थियोसौफिकल सोसाइटी (ब्रह्म विद्या समिति), 1875 में दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज तथा 1897 में स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन कुछ ऐसी प्रसिद्ध संस्थाएँ थीं,जिन्होंने समाज-सुधार,धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान भी कई संस्थाओं और संगठनों ने उल्लेखनीय सामजिक कार्य किया है। 1947 में भारत की स्वतन्त्रता के बाद महात्मा गाँधी ने सुझाया था कि भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस को भंग करके इसे लोक सेवा संगठन के रूप में चलाया जाए। लेकिन सत्ता और स्वार्थ की राजनीति में जिन लोगों की ज्यादा दिलचस्पी थी,उन्होंने गाँधी के इस सुझाव की बुरी तरह अनदेखी की। लेकिन आजादी के बाद गाँधी के विचार से प्रभावित संस्थाओं और संगठनों की सामाजिक गतिविधियाँ काफी सार्थक रहीं। इस सिलसिले में बिनोबा का भूदान आन्दोलन और जयप्रकाश नारायण का सर्वोदय आन्दोलन अत्यन्त उल्लेखनीय हैं।1974 के देशव्यापी जयप्रकाश आन्दोलन के कई कार्यकर्त्ता जिन्हें संसदीय राजनीति रास नहीं आयी, संस्थाओं और संगठन के माध्यम से रचना और संघर्ष के काम में लग गये।

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स्वयंसेवी संस्थाओं ने प्रायः कठिन समय में और खासकर दुर्गम क्षेत्रों में लोगों की मदद की है।सूखे की मार हो या बाढ़ की भयावहता, भूकम्प हो या दंगा, किसी भी तरह के आपातकाल में बहुत सी संस्थाओं ने अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हुए मनुष्यता का उदहारण पेश किया है। उन्होंने ऐसे समय में आपदा पीड़ितों की जान की रक्षा की है जब मृत्यु आसन्न संकट की तरह उनके सामने होती है। ऐसे विकट समय में कोई भोजन,पानी,चिकित्सा,वस्त्र और आवास की व्यवस्था कर दे तो मानवता की इससे बड़ी सेवा और क्या हो सकती है?

लेकिन बदलते वक्त के साथ संस्थाओं का यह मानवीय चेहरा बदल गया। समाज को स्वाबलम्बन का सिद्धान्त समझाने वाली संस्थाएँ स्वयं दाता एजेंसियों पर निर्भर हो गयीं। दाता एजेंसियों के अर्थदान और अनुदान शर्तों के साथ आने लगे। अर्थात संस्थाओं की नीतियाँ और विचारधाराएँ अब महत्त्वपूर्ण नहीं रहीं,वे कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण हो गये,जिनका निर्धारण ऊपर से होता है। दूसरी तरफ एफसीआरए (फौरन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट,2010) के बहाने इन संस्थाओं पर देशी सरकार का भी शिकंजा कसा जाने लगा।कई संस्थाओं के पंजीयन रद्द कर दिये गये।दरअसल किसी सरकार या संगठन की गतिविधियाँ जब सरकार की अपनी नजर में गड़ने लगती हैं,तब सरकार भी उनके ‘उपचार’ में लग जाती है।और सरकारें इस तरह का काम पहले भी करती रही हैं। 1980 में जब इन्दिरा गाँधी दोबारा सत्ता में आयी तो पुरुषोत्तम दास कुदाल की अध्यक्षता में उन्होंने 1982 में जो कमीशन (कुदाल कमीशन के नाम से मशहूर) बनवाया,उसका उद्देश्य चार गाँधीवादी संस्थाओं (गांधी स्मारक निधि,गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, अवार्ड-‘एसोसिएशन ऑफ़ वोलंटरी एजेंसीज फॉर रूरल डेवलपमेंट’ तथा सर्व सेवा संघ) को ‘सबक’ सिखाना ही था।

1970 के दशक में जो संस्थाएँ और संगठन सक्रिय थे उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि गाँधीवाद,समाजवाद,सर्वोदय और साम्यवाद से प्रभावित थी,जाहिर है रचना और संघर्ष उनके काम-काज के केन्द्र में थे। लेकिन जैसे जैसे समय नयी आर्थिक नीति,उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के करीब आने लगा,संस्थाओं के स्वभाव में भी परिवर्तन आने लगा। संस्थाओं को इस बात के लिए भी बार-बार कोसा गया कि विदेशी आर्थिक अनुदान लेने की वजह से ही इन संस्थाओं की परजीविता बढ़ी और कार्यकर्ताओं की प्रखरता भी कुन्द हुई। बाजार के वैभव ने संस्थाओं का भी कारपोरेटीकरण कर दिया है। अब तो दाता संस्थाएँ बकायदा अपने विकास कार्यक्रमों का टेन्डर निकालती हैं,और उस टेन्डर के सन्दर्भ में संस्थाएँ आवेदन करती हैं। इसलिए यह अकारण नहीं कि संस्थाओं के जो ‘दीवाने’ दुनिया को बदलने की बात करते थे,वे अभी मार्केट का सर्वे करने में लग गये हैं।

योजना आयोग के एक आँकड़े के अनुसार भारत में 15 लाख स्कूल और 11993 अस्पताल हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई द्वारा की गयी एक एक जाँच के अनुसार भारत में 31 लाख से ज्यादा एनजीओ पंजीकृत हैं और उनमें से बहुतों का लेखा-बही अद्यतन नहीं है।कोई आश्चर्य की बात नहीं कि किसी पहलवान का अखाड़ा,किसी मास्टर का कोचिंग सेन्टर,किसी डॉक्टर का क्लिनिक और किसी सुन्दरी का ब्यूटी पार्लर सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हो। ये आँकड़े सेवा,शिक्षा और धन्धे के फर्क को बताने के लिए पर्याप्त हैं।

कुकुरमुत्ते की तरह उग आई संस्थाओं की भीड़ के बावजूद यह बात निःसंकोच कही जा सकती है कि भारतीय लोकतन्त्र को मजबूत करने की दिशा में कुछ संस्थाओं ने ऐतिहासिक महत्त्व का योगदान दिया है। उत्तराखण्ड (तब उत्तर प्रदेश) के ग्राम स्वराज संघ ने ही चिपको आन्दोलन की बुनियाद बनायी। कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डी-एस 4) का गठन किया और नारा दिया-ब्राह्मण,ठाकुर,बनिया छोड़ बाकी सब है डी-एस 4,बाद में इसी डी-एस 4 ने लोकप्रिय राजनीतिक पार्टी बहुजन समाज पार्टी को जन्म दिया जो कई बार उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी बनी। लोकपाल विधेयक, सूचना का अधिकार अधिनियम,दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के पीछे भी गैरसरकारी संगठनों की महत्त्वपूर्ण और निर्णयकारी भूमिका रही है।संसदीय राजनीति का विपक्ष यदि अपनी भूमिका के निर्वाह में असफल रहता है तो क्या हर्ज है कुछ गैरसरकारी संगठन चेतना और जन जागरण के माध्यम से थोड़ी रचनात्मक और सकारात्मक राजनीति की भूमिका का निर्वाह कर ले!

लेखक ‘सबलोग’ पत्रिका के संपादक हैं|
सम्पर्क- +918340436365, kishankaljayee@gmail.com
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