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	Comments on: ‘हिन्दुत्ववादी अथवा संघवादी आलोचना’ विशेषोक्ति के विरुद्ध एक ज़िरह	</title>
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	<description>सच के साथ, सब के साथ</description>
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		<title>
		By: विप्लव विकास		</title>
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		<dc:creator><![CDATA[विप्लव विकास]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Mar 2022 11:30:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[डॉ आनंद पाटिल ने उपरोक्त लेख के माध्यम से हिन्दी साहित्य की आलोचना के स्वघोषित मठाधीशों के समक्ष एक चुनौती पेश करने के साथ-साथ आलोचक के धर्म (कृपया उपासना पद्धति से इसे न जोड़ें) को भी सबके समक्ष रखा है।

 हिन्दू संस्कृति दर्शनों में विश्वास रखती है और दर्शन आपको मुक्त करते हैं। बांधते नहीं है। वहीं &#039;वाद&#039; आपकी चिंतन मनन और लेखन प्रक्रिया को सीमित करता है। संकुचित करता है। फिर प्रश्न उठता है ऐसे &#039;वादों&#039;  को कौन से लोग जबरदस्ती नवागत शोधार्थियों के मस्तिष्क में ठुंसे जा रहा है? इस प्रश्न का बहुत ही समीचीन उत्तर उपर्युक्त लेख में है।

मैं तो चौंक जाता हूं कि साहित्य की भी जाति दे दी गई है इन वामपंथी एक्टिविस्टों के द्वारा, दलित साहित्य...कमाल है। साहित्य में वर्ग संघर्ष खोजने के लिए विभिन्न वर्गों का निर्माण आवश्यक है। वही काम ये कर रहे हैं। इन आलोचकों से साहित्यिक एवं शैक्षणिक संस्थानों को बचाने के लिए डॉ आनंद पाटिल जैसे मुखर लेखकों की सक्रियता का स्वागत किजिए और मुक्त भाव से सभी प्रकार के विचारों को मंच देने के लिए &#039;सबलोग&#039; की टीम साधुवाद की पात्र है। साधुवाद 🙏

विप्लव विकास
कोलकाता]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>डॉ आनंद पाटिल ने उपरोक्त लेख के माध्यम से हिन्दी साहित्य की आलोचना के स्वघोषित मठाधीशों के समक्ष एक चुनौती पेश करने के साथ-साथ आलोचक के धर्म (कृपया उपासना पद्धति से इसे न जोड़ें) को भी सबके समक्ष रखा है।</p>
<p> हिन्दू संस्कृति दर्शनों में विश्वास रखती है और दर्शन आपको मुक्त करते हैं। बांधते नहीं है। वहीं &#8216;वाद&#8217; आपकी चिंतन मनन और लेखन प्रक्रिया को सीमित करता है। संकुचित करता है। फिर प्रश्न उठता है ऐसे &#8216;वादों&#8217;  को कौन से लोग जबरदस्ती नवागत शोधार्थियों के मस्तिष्क में ठुंसे जा रहा है? इस प्रश्न का बहुत ही समीचीन उत्तर उपर्युक्त लेख में है।</p>
<p>मैं तो चौंक जाता हूं कि साहित्य की भी जाति दे दी गई है इन वामपंथी एक्टिविस्टों के द्वारा, दलित साहित्य&#8230;कमाल है। साहित्य में वर्ग संघर्ष खोजने के लिए विभिन्न वर्गों का निर्माण आवश्यक है। वही काम ये कर रहे हैं। इन आलोचकों से साहित्यिक एवं शैक्षणिक संस्थानों को बचाने के लिए डॉ आनंद पाटिल जैसे मुखर लेखकों की सक्रियता का स्वागत किजिए और मुक्त भाव से सभी प्रकार के विचारों को मंच देने के लिए &#8216;सबलोग&#8217; की टीम साधुवाद की पात्र है। साधुवाद 🙏</p>
<p>विप्लव विकास<br />
कोलकाता</p>
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			</item>
		<item>
		<title>
		By: डॉ.राजीव कुमार रावत		</title>
		<link>https://sablog.in/a-decree-against-the-hindutvaist-or-unionist-criticism-discordance-june-2019/6335/#comment-243</link>

		<dc:creator><![CDATA[डॉ.राजीव कुमार रावत]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 22 Jun 2019 02:30:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बहुत खूब आनंद...
आनंद आ गया
मुझे सदैव से ही यह लगता रहा है कि 1947 की आजादी सत्ता का ह्स्तांतरण ही रही है और बहुत से मुद्दे शायद 2047 तक साफ हो पाएंगे। संघ के विरुद्ध जो वैचारिक षणयंत्र चला आया है वह सत्ता के प्रश्रय के बिना संभव नहीं था। सत्ता बदलने से कुछ संतुलन वैचारिक बौद्धिकों में बना है और बुद्धि के दलालों का छपना, दिखना चलते हुए भी जन मानस का रुझान इस षणयंत्र को समझने की ओर बढ़ा है।

मेरे परम प्रिय आनंद का यह लेख बहुत सी मानसिक दासता की वर्जनाओं के काष्ठ द्वारों पर एक दस्तक के रुप में बहुत समय तक सहेज के पढ़ा जाएगा। अतीव प्रसन्नता है कि आनंद अपने शैक्षणिक दायित्वों से इतर जागरुक एवं संवेदनशील नागरिक एवं चैतन्य लेखक धर्म की साधना में प्रगतिशील हैं एवं शिखरोन्मुख हैं। 

आनंद को बधाई आशीष

सप्रेम

डॉ. राजीव रावत
वरिष्ठ हिन्दी अधिकारी
आईआईटी खड़गपुर
9564156315]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत खूब आनंद&#8230;<br />
आनंद आ गया<br />
मुझे सदैव से ही यह लगता रहा है कि 1947 की आजादी सत्ता का ह्स्तांतरण ही रही है और बहुत से मुद्दे शायद 2047 तक साफ हो पाएंगे। संघ के विरुद्ध जो वैचारिक षणयंत्र चला आया है वह सत्ता के प्रश्रय के बिना संभव नहीं था। सत्ता बदलने से कुछ संतुलन वैचारिक बौद्धिकों में बना है और बुद्धि के दलालों का छपना, दिखना चलते हुए भी जन मानस का रुझान इस षणयंत्र को समझने की ओर बढ़ा है।</p>
<p>मेरे परम प्रिय आनंद का यह लेख बहुत सी मानसिक दासता की वर्जनाओं के काष्ठ द्वारों पर एक दस्तक के रुप में बहुत समय तक सहेज के पढ़ा जाएगा। अतीव प्रसन्नता है कि आनंद अपने शैक्षणिक दायित्वों से इतर जागरुक एवं संवेदनशील नागरिक एवं चैतन्य लेखक धर्म की साधना में प्रगतिशील हैं एवं शिखरोन्मुख हैं। </p>
<p>आनंद को बधाई आशीष</p>
<p>सप्रेम</p>
<p>डॉ. राजीव रावत<br />
वरिष्ठ हिन्दी अधिकारी<br />
आईआईटी खड़गपुर<br />
9564156315</p>
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		<item>
		<title>
		By: रोशन पाण्डेय		</title>
		<link>https://sablog.in/a-decree-against-the-hindutvaist-or-unionist-criticism-discordance-june-2019/6335/#comment-240</link>

		<dc:creator><![CDATA[रोशन पाण्डेय]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Jun 2019 12:54:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आलोचना नए विचार को जन्म देती है, बशर्ते की दुर्भावना से ग्रसित न हो ! आलोचना का वर्तमान संदर्भ आलोचना कम व्यक्तिगत् कसक ज्यादा प्रतीत हो रही है । हिंदु की हिंदुत्ववादी परख को फिर से समझने उसे परत दर परत बिना किसी पुर्वाभाव के मूल लेखक को देखने और समझने की भी जरूरत है ! जिरह लेखक के समीकरण में हिंदू, संघ, हिंदुत्ववाद का स्पष्ट बहुआयामी सच्चा कलेवर प्रकट हुआ है, या यूं कहें कि, अवतरित हुआ है । तो ज्यादा सही होगा । कलम के सिपाही जब विचार का सौदा और अपनी टीआरपी के मखौल में जीने लगते हैं, तो ऐसी जिरह के लिए स्थान भी बनता है और लोगों को आइना भी मिलता है  । 
अच्छा है , ऐसे जिरह से ही टीआरपी का भ्रम भी जाता रहेगा और हिंदुत्व पुनः &quot;अरूण&quot; की लालिमा के साथ उद्भुत होकर सभी को चौधियाएगा ।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आलोचना नए विचार को जन्म देती है, बशर्ते की दुर्भावना से ग्रसित न हो ! आलोचना का वर्तमान संदर्भ आलोचना कम व्यक्तिगत् कसक ज्यादा प्रतीत हो रही है । हिंदु की हिंदुत्ववादी परख को फिर से समझने उसे परत दर परत बिना किसी पुर्वाभाव के मूल लेखक को देखने और समझने की भी जरूरत है ! जिरह लेखक के समीकरण में हिंदू, संघ, हिंदुत्ववाद का स्पष्ट बहुआयामी सच्चा कलेवर प्रकट हुआ है, या यूं कहें कि, अवतरित हुआ है । तो ज्यादा सही होगा । कलम के सिपाही जब विचार का सौदा और अपनी टीआरपी के मखौल में जीने लगते हैं, तो ऐसी जिरह के लिए स्थान भी बनता है और लोगों को आइना भी मिलता है  ।<br />
अच्छा है , ऐसे जिरह से ही टीआरपी का भ्रम भी जाता रहेगा और हिंदुत्व पुनः &#8220;अरूण&#8221; की लालिमा के साथ उद्भुत होकर सभी को चौधियाएगा ।</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: रोशन		</title>
		<link>https://sablog.in/a-decree-against-the-hindutvaist-or-unionist-criticism-discordance-june-2019/6335/#comment-239</link>

		<dc:creator><![CDATA[रोशन]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Jun 2019 12:15:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आलोचना के इस दौर में सिद्धांत-वादी आलोचना और व्यक्तिगत सैद्धान्तिक आलोचना में फर्क करना मुश्किल तो नहीं हुआ पर इसकी कमोबेश संरचना में दोष जरूर आ गया है । हिन्दू, हिंदुत्व, संघ, और भारतीय संस्कृति की सदोष आलोचना स्थापित करने (?) और तथाकथित मुखरता का मुखौटा पहनने की फिराक सी है । इस स्थान पर यह कहना अति समीचीन है कि- जिरह (प्रतिवाद पोषक कलम) करने वाले व्यक्तित्व की आस्था और सही हिंदुत्व की परिभाषा सभी के लिए दृष्टिकोण के परिमार्जन और अपेक्षित सुधार का एक अवसर है । संघ विरोध से टी आर पी की ललक और हिन्दुत्व की समझ ? का सिरमौर दोयम दर्जे का दिख रहा है । जिरह लेखक को अपनी अभिव्यक्ति के साथ हिंदुत्व को प्रस्तुत करने के लिए , परिभाषित करने और देश को फ्रंटफूट पर आमंत्रित कर प्रोत्साहित करने हेतु साधुवाद ।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आलोचना के इस दौर में सिद्धांत-वादी आलोचना और व्यक्तिगत सैद्धान्तिक आलोचना में फर्क करना मुश्किल तो नहीं हुआ पर इसकी कमोबेश संरचना में दोष जरूर आ गया है । हिन्दू, हिंदुत्व, संघ, और भारतीय संस्कृति की सदोष आलोचना स्थापित करने (?) और तथाकथित मुखरता का मुखौटा पहनने की फिराक सी है । इस स्थान पर यह कहना अति समीचीन है कि- जिरह (प्रतिवाद पोषक कलम) करने वाले व्यक्तित्व की आस्था और सही हिंदुत्व की परिभाषा सभी के लिए दृष्टिकोण के परिमार्जन और अपेक्षित सुधार का एक अवसर है । संघ विरोध से टी आर पी की ललक और हिन्दुत्व की समझ ? का सिरमौर दोयम दर्जे का दिख रहा है । जिरह लेखक को अपनी अभिव्यक्ति के साथ हिंदुत्व को प्रस्तुत करने के लिए , परिभाषित करने और देश को फ्रंटफूट पर आमंत्रित कर प्रोत्साहित करने हेतु साधुवाद ।</p>
]]></content:encoded>
		
			</item>
		<item>
		<title>
		By: Dr. Arale Shrikant Laxmanrao		</title>
		<link>https://sablog.in/a-decree-against-the-hindutvaist-or-unionist-criticism-discordance-june-2019/6335/#comment-238</link>

		<dc:creator><![CDATA[Dr. Arale Shrikant Laxmanrao]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Jun 2019 05:20:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[&#039;हिन्दुत्ववादी अथवा संघवादी आलोचना&#039; विशेषोक्ति के विरूद्ध एक ज़िरह - शीर्षक लेख के लेखक को और इससे भी अधिक इसे प्रकाशित करने के लिए &#039;सबलोग&#039; पत्रिका को धन्यवाद। लेख में जिस प्रकार &#039;संघ&#039;, &#039;हिन्दू&#039; तथा &#039;हिन्दूत्व&#039; की संकल्पनाओं को स्पष्ट किया गया है, यह समय की माँग ही है। इस समग्र आलोचना की सीख को एकांगी वैचारिक आलोचकों (मार्क्सवादी, दलित, अल्पसंख्यक, कांग्रेसी चोला धारी) तक पहुँचाना बहुत आवश्यक था। लेखक ने सही ही कहा कि हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी आलोचक और मीडिया ही हिन्दुत्व को केंद्र में लाने और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे हैंं। लेख बहुत ही उम्दा बन पड़ा है। पुनश्च साधुवाद...]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;हिन्दुत्ववादी अथवा संघवादी आलोचना&#8217; विशेषोक्ति के विरूद्ध एक ज़िरह &#8211; शीर्षक लेख के लेखक को और इससे भी अधिक इसे प्रकाशित करने के लिए &#8216;सबलोग&#8217; पत्रिका को धन्यवाद। लेख में जिस प्रकार &#8216;संघ&#8217;, &#8216;हिन्दू&#8217; तथा &#8216;हिन्दूत्व&#8217; की संकल्पनाओं को स्पष्ट किया गया है, यह समय की माँग ही है। इस समग्र आलोचना की सीख को एकांगी वैचारिक आलोचकों (मार्क्सवादी, दलित, अल्पसंख्यक, कांग्रेसी चोला धारी) तक पहुँचाना बहुत आवश्यक था। लेखक ने सही ही कहा कि हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी आलोचक और मीडिया ही हिन्दुत्व को केंद्र में लाने और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे हैंं। लेख बहुत ही उम्दा बन पड़ा है। पुनश्च साधुवाद&#8230;</p>
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