मुद्दा

आत्महत्या की राह पर युवा वर्ग

 

  • देवेन्द्रराज सुथार 

 

विश्वभर में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेज गति से बढ़ रही है। खुद की जान खुद लेने का यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। जीवन की कठिनाइयों से घबराकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेना सबसे घटिया विकल्प है। लेकिन फिर भी आत्महत्या करना एक फैशन बनता जा रहा है। लोगों में समस्याओं से लड़ने की शक्ति क्षीण होती जा रही है। आत्ममुग्धता के दौर में लोगों पर अहम हावी होता जा रहा है। कुछ लोग तो महज अपनी इज्जत बचाने के खातिर मौत का रास्ता चुन रहे हैं।क्षणिक भावावेश में उठाया गया गलत कदम मृतक के परिवार के लिए पीड़ा का सबब बन रहा है। यह लाइलाज बीमारी दिनोंदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। दुनिया में प्रतिवर्ष 8 लाख से अधिक और प्रति 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या के कारण अपनी जिंदगी खो रहा है। यही नहीं 15 से 29 वर्ष की अवस्था के युवाओं के बीच आत्महत्या मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है।

आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह तनाव है। तनाव व्यक्ति को निराश करके शक्तिहीन बना देता है। जिसके चलते वह मौत के रास्ते की ओर बढ़ने लगता है। कुछ लोग आवेग में आकर तो कुछ गहरे अवसाद या विषाद की चपेट में आकर आत्महत्या की राह चुनते हैं। गौर करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार अवसाद के मामले में भारत दुनिया में सबसे आगे है। वर्तमान में पूरी दुनिया में 30 करोड़ लोग अवसाद की समस्या से जूझ रहे हैं। भारत में 6.5 प्रतिशत लोग गंभीर मानसिक बीमारियों से ग्रस्त है, जिसकी संख्या 2020 तक 20 प्रतिशत तक बढ़ जाने की आशंका है। 80 प्रतिशत मानसिक विकार से जूझ रहे लोग इससे निपटने के लिए किसी भी प्रकार का उपचार नहीं लेते हैं। 10.9 लोग प्रति 1 लाख पर औसतन आत्महत्या करते हैं। विश्व के अधिकांश देशों में जहां उम्रदराज लोगों में आत्महत्या के मामले अधिक मिलते हैं, वहीं भारत के युवाओं में ऐसी प्रवृत्ति अधिक है। 15-29 वर्ष की आयु में होने वाली आत्महत्याओं का औसत, देश की कुल आत्महत्याओं के औसत से तीन गुना अधिक है। इसके कारण पूरे विश्व की तुलना में भारत के युवाओं में आत्महत्या के सबसे अधिक मामले मिलते हैं।

देश में युवाओं की आत्महत्या के आंकड़े बेहद डरावने हैं। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 में आत्महत्या से जुड़े आंकड़े दिए गए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्या की घटनाओं में 15 साल में 23 प्रतिशत का इजाफा हुआ। रिपोर्ट के अनुसार 2015 में 1 लाख 33 हजार से ज्यादा लोगों ने आत्महत्या की, जबकि 2000 में ये आंकड़ा केवल 1 लाख 8 हजार के करीब था। आत्महत्या करने वालों में 33 प्रतिशत की उम्र 30 से 45 साल के बीच थी, जबकि आत्महत्या करने वाले करीब 32 प्रतिशत लोगों की उम्र 18 साल से 30 साल के बीच थी। आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की गिनती महिलाओं से कहीं ज्यादा है। 2015 में 91,500 से ज्यादा पुरुषों ने आत्महत्या की। ये आंकड़ा आत्महत्या करने वालों के कुल आंकड़े का 68 प्रतिशत से भी ज्यादा है, जबकि आत्महत्या  करने वाली महिलाओं की गिनती 42 हजार से कुछ ज्यादा रही। ये आंकड़ा आत्महत्या करने वालों की कुल गिनती का साढ़े 31 प्रतिशत है। सबसे नए 2015 के आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र राज्य में सबसे ज्यादा 1230 युवाओं ने आत्महत्या की थी, जो कुल आंकड़े (8934) का 14 प्रतिशत है। इसके बाद दूसरे नंबर पर तमिलनाडु (955) और तीसरे पर छत्तीसगढ़ (625) आता है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु दो ऐसे राज्य हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों की श्रेणी में आते हैं, जो आर्थिक प्रगति के दवाब को दिखाता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक युवाओं में आत्महत्या करने की बड़ी वजह बेरोजगारी भी है। साल 2015 में हुई आत्महत्या के कारणों पर नजर डालें तो परीक्षाओं में फेल होने के कारण 2646 लोगों ने आत्महत्या की थी। इसके अलावा प्रेम प्रसंग के कारण भी 4476 लोगों ने अपनी जिंदगी को खत्म कर लिया। बेरोजगारी के कारण देश में करीब 2723 और प्रोफेशनल जिंदगी में हताशा के चलते 1590 लोगों ने अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लिया था। आत्महत्याओं को कम करने के प्रयास में चीन ने बाजी मारी है। 1990 के मध्य के दौर में चीन की युवा महिलाओं में भी आत्महत्या की दर बहुत अधिक थी, जिसे 90 प्रतिशत कम कर लिया गया। इसमें बढ़ते शहरीकरण ने अहम भूमिका निभाई है। इससे महिलाओं के लिए काम करने और स्वतंत्र रूप से रहने के अवसर बढ़ गए हैं। आत्महत्या के साधनों को सीमित और प्रतिबंधित करके भी इसे कम किया जा सकता है। ब्रिटेन में पेनकिलर के पैकेट को बोतल की जगह ब्लिस्टर पैकेट में बदलने से ही आत्महत्या की दर 44 प्रतिशत कम हो गई। आस्ट्रेलिया में बंदूकों और रशिया में शराब को सीमित करके आत्महत्या दर को कम किया गया। भारत में आत्महत्या करने के लिए अक्सर कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है। भारत के अनेक हिस्सों, अधिकतर ग्रामों में, इनकी उपलब्धता को सीमित करके दर को कम किया जा सकता है।

विश्व के अनेक भागों में मानसिक बीमारियों को जल्दी पहचान कर समय पर उनका इलाज करके भी आत्महत्या की दर को कम किया गया है। अवसाद रोधी दवाओं के इस्तेमाल, मनोचिकित्सक की मदद, हमराज होने और प्रेम व करूणा से आत्महत्याओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है। आत्महत्याओं को रोकना एक सामाजिक प्रयास होना चाहिए। इसके लिए धन की अपेक्षा प्रेम एवं करूणा से लिप्त स्वयंसेवकों की अधिक आवश्यकता है। इसके लिए सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होते। हमारे देश में भी किसानों की आत्महत्या को देखते हुए सरकार द्वारा की जाने वाली ऋण माफी की घोषणा क्या इनमें कमी ला पा रही है? अतः आत्महत्याओं को रोकने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है। अवसाद में जितनी आवश्यकता चिकित्सकीय परामर्श की है, उतनी ही सामाजिक जीवन में सहभागिता निभाने की है। किसी से अपनी तुलना करने से बचना चाहिए क्योंकि तुलना सदैव तनाव का कारण बनती है। नशे से दूर रहकर प्रेरणादायी किताबों को पढ़ने के साथ नियमित व्यायाम करके हम काफी हद तक नकारात्मकता से दूर रह सकते हैं। बच्चों व किशोरों में समझ की कमी होती हैं इसलिए वे जरा-सा कष्ट पड़ने पर आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं। अभिभावकों को बच्चों की समय-समय पर काउंसलिंग करते रहना चाहिए। ‘जीवन अनमोल है व अवसाद का समाधान आत्महत्या नहीं है‘ यही सोच हमें हताशा के इस वीभत्स संसार से वापस लाकर अपनों के खूबसूरत संसार का आभास करा सकती है।

 

लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार है|

सम्पर्क- +91810717719, devendrakavi1@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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