अंतरराष्ट्रीयमुद्दासमाज

विश्व बाज़ार की सांस्कृतिक बर्बरता

  • राजीव रंजन प्रसाद

जब हम कोई बात कहते हैं या कि किसी पक्ष पर विचार करते हैं, तो राष्ट्र और राष्ट्रीयता का भाव सर्वोपरि होता है। लेकिन इस राह का पथिक होने पर कई बार हमें आधुनिक विश्व के तौर-तरीकों से असहमत होना पड़ता है या कि उनकी गैर-जरूरी कारस्तानियों का सीधे विरोध करना पड़ता है। इस तरह की कार्रवाई में आप उनके दुश्मन बन जाते हैं जिनके आक्रमण से पूरा विश्व त्रस्त है और राष्ट्रीय सम्प्रभुता खतरे में है। पर यह भी है कि ये ही वे लोग हैं जो सबसे अधिक मदद करते हैं; बिना शर्त आपको बहुत सारी सहूलियते प्रदान करते हैं; किन्तु इस दरियादिली के पीछे छुपी हुई उनकी मंशा बेहद खतरनाक होती है। दरअसल, भूमंडलीकृत विश्व में देशी, स्थानीय, लोक-स्थापित मूल्यों को छोड़ना मानों हम सबकी अनिवार्य विवशता घोषित की जा चुकी है। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि अब अपना सबकुछ बाज़ार-पूँजीकरण के हवाले है। सहस्त्राब्दी की दहलीज़ पर खड़ी दुनिया हर रोज बदल रही है, किन्तु जिस बदलाव को हम खुले तौर पर स्वीकार करते हैं, वह हैं-‘शक्ति अधिग्रहण के पश्चात पूँजी-निवेश द्वारा आधारभूत संरचना तथा स्वरूप में आए मूलभूत परिवर्तन।‘ यह परिवर्तन सायास और इरादतन जारी हैं-निर्बाध, निद्र्वंद्व, निरन्तर। यह कब का घोषित किया जा चुका है कि पश्चिमी तकनीकी संचार-क्रांति को आज़माना है, तो उनकी शर्तों पर जीना हमारी मजबूरी और बाध्यता दोनों है। उत्तर आधुनिक परिभाषा में ‘अच्छी तरह’ जीने के लिए कुछ चीजों को बर्दाश्त करना पड़ेगा, वह चाहे गुलामी हो या फिर बाज़ार।  लेकिन मनोविज्ञानियों के अनुसार, ‘जब खतरा लगातार एक ही तीव्रता के साथ आदमी को धर लेता है तब आदमी के पास खतरे से बचने का एक ही उपाय होता है और वह है खतरे की उपेक्षा।‘  यह उपेक्षा भी सायास घटित न होकर प्रायोजित तथा इरादतन हुआ करता है। यह भी होता है कि यह बाद में जाकर हमारे स्वभाव और आचरण का अंग बन जाता है। ऐसे में विचार-प्रणाली अथवा मूल्य-बोध को सुविधानुसार टरकाया जाने लगता है। भीतर का प्रतिरोध जब तक जाग्रत होता है वह हस्तक्षेप का साहस जुटाता है; अपनी असहमति को लेकर सारा बल कूटता है; और  आखिरकार वह टूट जाता है; उसकी समस्त कवायद नाक़ाफी साबित होती हैं। अर्थात सम्यक् साधना की कमी और उपयुक्त संयम के अभाव के कारण बाज़ार से घिरा भारतीय-मानस अधुनातन तर्कों, दलीलों, उदाहरणों, मंतव्यों इत्यादि के आगे अपनी हार मान लेता है। इसके बाद सबकुछ वही घटित होता है जो पूँजीवादी इजारदारों की पहुँच और पराक्रम में है।

इस तरह की स्वीकारोक्ति निर्लज्ज लग सकती है किन्तु सचाई यही है कि अधिसंख्य भारतीयों की चित्तवृत्ति पश्चिमी मनोवृत्ति से ग्रस्त तथा उनकी ही मानसिकता से चालित है। नतीजतन, हम अपना निज-मन खो चुके हैं तथा अब  हमारे ऊपर अंकुश और एकाधिकार दूसरों का है। बाज़ार की चपेट में बझे भारतीयों की स्थिति यह है कि उनका आन्तरिक मन जो कह रहा है उससे उनका अपना ही दिमाग दिल्लगी कर बैठता है; धोखा दे देता है। आदिवासी-जनों तथा किसानों के विरोध-प्रतिरोध में समानता एक-सी है, इसलिए आज दोनों बिरादरी सर्वाधिक विपदाग्रस्त है। उनके युवाओं की हालत तो बद से बदतर है। उनके सुरक्षित भविष्य वास्ते राजनीतिज्ञ मनगढंत महावाक्यों की रचना चाहे जितनी भी कर रहे हों, लेकिन उनकी बुनियादी जरूरतों की न तो पूर्ति हो पा रही है और न ही उन्हें ‘जैनुइन’ सुविधा-सहूलियत मिल पा रहा है। ऐसे में इन दोनों ज़मातों की दशा एकसम है। हालत और हालात दोनों ख़राब हो चले हैं। चुप्पी एक निष्ठुर बर्बरता है जिसके हम गवाह हैं। मध्य-वर्ग इस प्रकार के बाज़ारू समझौते करने का अभ्यस्त है। इसलिए पूँजी और मुनाफे के फेर में फँसे भारतीय राजनीति को इस वर्ग से खतरा नहीं है। काॅरपोरेट-विकास समर्थित सरकार को जिनसे खतरा है वह उनको अपने तरीके से निपटा रही है। सरकारी-तंत्र द्वारा जो लोग नहीं निपटाया जाना चाहते हैं, उनका चुप रहना काफी है। मूल्यहीन ऐसे लोगों के बीच संचार का एक बढ़िया सिद्धान्त काम करता है और वह है-‘स्पाइरल आॅफ साइलेंस’। विरोध-प्रतिरोध को भी पूँजीवादी खेमे ने अपने ही खि़लाफ बड़ी चालाकीपूर्वक खड़ा किया है जिसके ढंडे-बैनर तले समझौतापरस्त, अवसरवादी, चाटुकार बौद्धिक-वर्ग एकजुट है। इनकी एकजुटता बाहरी तौर पर पूँजीवाद और काॅरपोरेट विकास  कौन है और किसको पड़ी है कि वह आत्महत्या कर अपनी जान गवाँ चुके किसान, मजदूर, युवा, लेखक आदि की सुध ले, उनकी समस्या का स्थायी समाधान ढूँढ निकाले। कोई काॅरपोरेट अपनी अन्तरात्मा को टटोले और एकबारगी जन-मूल्य के प्रति  ईमानदार और प्रतिबद्ध हो जाए। ऐसा होना कौन चाहेगा; क्योंकि ऐसे व्यक्तियों को ‘फोब्र्स’, ‘न्यूज़वीक’, ‘टाइम’ आदि ‘पाॅपुलर मैग्ज़ीनों’ में जगह नहीं मिल सकता है, इनके आवरण पर उनकी छवियों का पदार्पण संभव नहीं है। हम में से अधिसंख्य मुल्क की मर्यादा और जन-मूल्य खोने की हद तक इस ‘पाॅपुलिरिटी’ के दिवाने होते हैं; इसलिए उनका मुक्त-बाज़ार का समर्थक होना जरूरी है, स्वाभाविक है। जहाँ तक मुक्त व्यापार का सवाल है, तो ईमान-ओ-धर्म से च्यूत व्यक्ति मुक्त व्यापार का समर्थक होता है। इस असंगत सहमति से चरित्र और आचरण के स्तर पर मूल्यगत ह्रास पैदा होते हैं जिसमें अपने तात्कालिक निर्णय को सही ठहराने का एक फौरी रवैया आरोपित अपनाया जाता है। दरअसल, उपभोक्ता-संस्कृति इरादतन किन्तु चालाकीपूर्वक अर्थव्यवस्था में अपना एकाधिकार जमाने खातिर लोगों के मानस को विकृत तथा उनकी भाषा को विरूपित कर देता है। इस अवस्था में अक्सर नये-नये  मुद्दे आयातीत किए जाते हैं, उन्हें एक एजेण्डे के तहत ‘डिबेटबल’ बनाया जाता है। जनसंचार माध्यमों की बुर्जुआ संस्कृति जिसके ‘कोर स्ट्रक्चर’ का निर्माण ही ‘अन्याय’ को जायज़ तथा संगत सिद्ध करने के लिए हुआ है; इस एजेण्डे को आगे बढ़ाती है; इसके लिए प्रवाद पैदा करती है। अक्सर बौद्धिक संवाद के नाम पर वह एक टुच्चेपन को सामाजिक-सांस्कृतिक ‘पैटर्न’ मुहैया कराती है; ताकि वह सबकुछ कहता हुआ अवश्य दिखे, पर अपनी ज़ाहिर बातों में मूल्य-सम्प्रेषण से जुड़ी अनिवार्य तत्त्वों को शामिल होने न दे।

खुले तौर पर उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रस्तावक अथवा समर्थक लोग अपनी अस्मितामूलक पहचान तथा सांस्कृतिक इतिहास-बोध के लिए लड़े बगैर समर्पण कर दे रहे हैं। यह चाहे दबाव में हो या स्वेच्छापूर्वक; लेकिन इसमें व्यक्ति-विशेष का अपना हित-लाभ जुड़ा होता है। इस प्रक्रिया में शामिल लोग राष्ट्र से पहले अपनी पहचान और भूमिका को प्राथमिकता देते हैं; वे अपनी लोकप्रियता को ‘कैश’ कराने के लिए साम्राज्यवादी नीतियों का अनुसरण ही नहीं करते; बल्कि वे पश्चिम की असमान-अराजक बँटवारे पर टिकी अर्थव्यवस्था को जानते-समझते हुए भी; अपना लोभ-संवरण नहीं कर पाते। चूँकि ऐसे लोगों को मूल्य-नीति से अधिक माल और पूँजी का केन्द्रीकरण लुभाता है; इस कारण वे इसके ख़िलाफ जाने की नहीं सोचते है। अतएव, राजनीति जिसका भारतीय समाज पर अंकुश या दबदबा सबसे ज्यादा है; वह खुद इसी राह पर चलते हुए सत्ता और शक्ति-प्रदर्शन का षड़यंत्र करती है। वह बाज़ार की भाषा में अपने लिए जनादेश जुटाने का विज्ञापनी नज़रिया अपनाती है जिसमें राजनेता के छवि-निर्माण का तकनीकी-प्रौद्यौगिकी आधारित खुला खेल चलता रहता है। हास्यास्पद यह है कि अब तो विज्ञापन से हमें यह पता चलता है कि कौन-सा राजनेता सही है और उसके पक्ष में मतदान करना उचित है। विज्ञापन ही उसके बारे में ‘ओपीनियन लिडर’ की भूमिका में है।

अचरज नहीं कि आजकल जनसंचार माध्यम अर्थात् समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, टेलीविज़न चैनल्स, रेडियो, सोशल मीडिया, अन्यन्य वेबसाइट आदि इसी समिधा में खेत हैं। हमारा विवेक उनके ही कहे से परिचालित हैं, तो हमारा निर्णय दिखाई जा रही दृश्यछवियों के अनुसार शत-प्रतिशत नकल करने ख़ातिर अभिशप्त। अब मीडिया जन-प्रहरी नहीं बाज़ार-गुरु है जिसके ज्ञान से हम यह देखते हैं कि क्या होना चाहिए; उसके इशारे पर हम कुछ नया करने को तत्पर हैं। सोशल मीडिया तो आजकल ‘मास्टर-माइंड’ बन चुका है जिसकी गिरफ़्त में एक बड़ी ज़मात या कह लें तादाद मौजूद है। इस तरह के बिकाऊ आदमी तब और खतरनाक हो जाते हैं जब वे अपने मताधिकार का प्रयोग भी विज्ञापन देखकर या किसी बहकावे में आकर करने लग जाते हैं। यह मामला गंभीर है क्योंकि यह सीधे हमारे ज्ञान-विवेक के अपहरण का मामला है। क्योंकि विज्ञापन जिन छवियों-प्रतिछवियों का निर्माण कर रहा होता है वह सदैव ‘पेडेड’ होती हैं; एक एजेण्डा के तहत अपनी बात को रख अथवा दूसरे की बात को काटती हैं। विज्ञापन अपनी मूल-प्रकृति और व्यावसायिक उद्देश्य में ग़लत नहीं है; किन्तु जब वह हर नागरिक को उपभोक्ता मान लेने की भूल करता है तो वह अपना वास्तविक अर्थ-मूल्य खो देता है। खासकर यह बात उस समय सबसे अधिक लागू होती है जब विज्ञापन किसी राजनीतिक-व्यक्तित्व को वस्तु मानते हुए उसके पक्ष-प्रतिपक्ष में जनमत-निर्माण करने में जुट जाता है, तो यहाँ उसका सम्प्रेषण-मूल्य नकारात्मक अभिवृत्ति को दर्शाता है न कि जनतांत्रिक चेतना या कि सामाजिक  नीतिगत-आदर्श का वह द्योतक होता है। इस तरह के घालमेल का परिणाम ख़तरनाक होते हैं। अर्थात् जनादेश आधारित राजनीतिक ताकत एक ग़लत आदमी को सौंप दी जाती है जिसके लच्छेदार भाषण, जुमले, नारे, मुहावरे आदि भले सम्मोहक लगते हों, लेकिन परिणाम में बहुसंख्यक जनता के हिस्से में हासिल होता है-नील बट्टा सन्नाटा।

वास्तव में बाज़ार का एकमात्र लक्ष्य मुनाफे पर टिका होता है। इसलिए वह अपने हित-लाभ हेतु किसी भी हद तक अपने अधीनस्थों (फॉलोवर) का इस्तेमाल करता है। भारतीय लोकतंत्र को सर्वाधिक खतरा इन्हीं ‘मुगल मार्केटों’ से है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि साम्राज्यवादी शक्तियाँ हमारी चुप्पी की सोहबत में ताकतवर बनती हैं और हमारे ही समर्थन द्वारा वैश्विक अर्थव्यवस्था के बर्बर नीति को हम पर लागू करती हैं।

भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी अंतःप्रकृति तार्किक-दार्शनिक स्वतन्त्रचेत्ता की है। तत्त्वतः भारत का स्वधर्म मूल्य-विस्तारक है, मुनाफ़ाखोर हरग़िज नहीं। इसीलिए भारतीय उपनिषद् में कहा गया है-‘यो वै भूमा तत्सुखम’। अर्थात् विस्तार में ही आनन्द है। यह विस्तार जनतांत्रिक चेतना का है, सामूहिक आकांक्षा का है जिसमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना सन्निहित है। वहीं साम्राज्यवाद-पोषक नवशिक्षित वर्ग पश्चिमीकरण का अनुयायी है, प्रश्नकर्ता नहीं। यह कितना विडम्बनापूर्ण है कि भारत अपने अधिसंख्य निर्णय सीधे अमेरिकी निगाहबानी में ले रहा है; विकास आधारित पश्चिमी माॅडल को बिना किसी दूरदर्शिता के अपना रहा है। है। बाज़ार पूँजीकरण द्वारा चालित यह ‘मुक्त व्यापार’ आज एक महामारी का रूप ले चुका है जिससे फ़िलवक्त सर्वसाधारण का सामना है। भूमंडलीकृत त्रासदियों के ख़िलाफ गला बुलन्द करने वाले वास्तव में  वे लोग हैं जिन्हें किसानी पसंद है; अपनी भारतीय शिक्षा-पद्धति पसंद है, अपन का जल-जंगल-ज़मीन प्यारा है।  अपनी भाषा तथा बोली-वाणी में संवाद-बातचीत करते ये सब के सब भारतीय हैं; किन्तु ‘इंडियन’ नहीं है। इंडियन लोगों को तो ‘वीकेंड’ पसंद है। इंडियन लोगों को तो ‘बुलेट ट्रेन’ की सवारी पसंद है। उन्हें रिलाइबल रेट पर ‘5 स्टार’ मार्का होटलबाज़ी पसंद है। रेस्तरां डिनर, रिहायशी ड्रिंक और लेट नाइट डांस के आदी ऐसे ही लोगों को ‘मुक्त व्यापार’ पसंद है। ‘मुक्त व्यापार’ के सर्जक और प्रबन्धक जो लोग हैं उनकी संस्था का नाम बकायदा सब को याद है। यथा-‘विश्व व्यापार संगठन’, ‘विश्व बैंक’, ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोश’ आदि। कई सारे दर्शनहीन ‘एनजीओ’ भी इस समिधा में खेत हैं जिनकी अँगुली पकड़ ये ‘मार्केट मुगल’ भारत की स्थायी एवं टिकाऊ बाज़ार-व्यवस्था का पहुँचा पकड़ना चाह रहे हैं और सफल भी होते दिख रहे हैं।

इन दिनों भारतीय बौद्धिकी के स्तर पर घिसी-पिटी बातें ही अधिक दुहरायी जाती हैं। नई बातों के लिए जनपक्षधर नेतृत्व का सरासर अभाव है। अकादमिक-साहित्यिक लेखन-वक्तव्य में ईमानदारी और प्रतिबद्धता के मूल्य नदारद हैं, तो विवेक आधारित विश्वसनियता लगभग पलायित हो चुकी है। यानी जो सामने है वही इतना चमात्कारिक, सम्मोहक और ‘लार्जर एण्ड ग्रेटर दैन लाइफ’ है कि हम यह मान चुके हैं कि बाज़ार की खुशहाली ही सच है, कैमरे की छवि ही प्रसन्नता का सूचकांक है। इस तरह एक मदहोशी तारी है जिसका असर इतना गहरा है कि राजनीति की दिशा और विवेक तक इससे तय हो रहे हैं। आज ‘सत्यमेव जयते’ का अभिप्राय है-‘विजय सदैव सत्य की होती है’। अर्थात जो जीता वही सिकन्दर। यह धारणा राष्ट्रीयता को खण्डित करने के लिए काफी है, क्योंकि यह अंततः राष्ट्रीय स्वाभिमान को ही मटियामेट करती हैं। बावजूद इसके बिकने की शर्त पर बिक जाना तय है। सचाई यही है कि बिना बिके बने रहने में तकलीफ बेतरह है। आज की तारीख़ में जो बिकने को तैयार नहीं है और दूसरों के लिए राह का रोड़ा है उसे फौरन मौत के घाट उतारा जाने लगा है। अतएव, बिकाऊ मानस हमारी नियति बन चुकी है जिसमें हम हम ही होते हैं; बस अपने ऊपर अधिकार दूसरों का हो जाता है। राजनीतिक कार्यकर्ता हों या कॉरपोरेट एजेण्ट अथवा एनजीओ मार्का सेवादल; लगभग सभी अपने जिंदा होने की शर्त पर किसी व्यक्ति-विशेष से लेकर किसी उत्पाद-विशेष तक का गुणगान कर रहे हैं; उनके पक्ष में नाच-कूद, बोल-कह आदि रहे हैं। आज की नई बनती दुनिया में विकास की छलांग चाहे कितना भी अप्रत्याशित या अटपटा लगे; पर इनसे बरी होना आसान नहीं रहा। भुक्तभोगी कमोबेश सभी हैं , क्योंकि हमारे घर की ‘विंडो’ बाज़ार के आँगन में ही खुलती है। अब यह मान लिया गया है कि मुकम्मल जहां इसी के बरास्ते संभव है।

भारतीय स्वधर्म का विरूपण अथवा विघटन एकदम अचानक से नहीं हुआ है। भारत स्वाधीनता  आन्दोलन के दिनों से ही इन प्रवृत्तियों का शिकार हो चला था। स्वार्थलोलुप यह प्रवृत्ति गहरे तक फैली-पसरी हुई है। यह सब इस कारण हुआ है कि-‘‘भारत में चूँकि साम्राज्यवादी शासन एक लम्बे काल तक रहा था, इसलिए यहाँ एक काफ़ी विकसित पूँजीपति वर्ग, और यहाँ तक कि बड़े पूँजीपतियों का वर्ग भी तैयार हो गया था।…इसकी देश में बड़ी मजबूत जड़ें थीं और इसका जनता पर प्रभाव था और यह राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता था। साथ ही, उसने, विशेषकर इजारेदारी अवस्था में, साम्राज्यवादी आर्थिक हितों के साथ घनिष्ठ आर्थिक सम्बन्ध स्थापित कर लिये थे।” कांग्रेस के साथ आजादी के बाद से ही चिपकी-लिपटी इस आयातीत मानसिकता को नब्बे के बाद आए बाज़ार ने सर्वाधिक ‘लिफ्ट’ देना शुरू किया। इस नए ‘फिनोमिना’ में बाज़ार ही हमारा मार्गदर्शक बन गया और उपदेष्टा भी। तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने  इस अप्रत्याशित हेरफेर को अर्थव्यवस्था सुधार के मुलम्मे में परिभाषित किया। लेकिन यह सब करते समय हमने अपने विशिष्ट मूल्यों को न सिफ भूला दिया, बल्कि हमने स्वधर्म का अपना पारम्परिक मार्ग भी खो दिया, जिसमें समाज प्राथमिक और बाज़ार पूरक सामाजिक-विधान के रूप् में विद्यमान था। तब का बाज़ार कुछ और था जिसमें दाम वस्तु के लगाए जाते थे, जबकि आज व्यक्ति खुद ही बिकाऊ हो चला है। बहरहाल, भारतीय मानुष को ‘मुक्त व्यापार’ की खुली संस्कृति से चेतने की आवश्यकता है जो सबकुछ लील जाने पर आमादा है। हम उसकी चंगुल में हैं। अगर समय रहते नहीं चेते तो इस बार हम वैध-गुलामी का मोहरा बन जाएँगे जो लोकतंत्र और चुनी हुई सरकार के बरास्ते हमारे ऊपर कब्जा करेगी। इसका जवाब अथवा विकल्प कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी  या आम आदमी पार्टी कतई नहीं है। लेकिन जो है उनकी तलाश तो हमें करना ही होगा! अन्यथा आधुनिक बाज़ारवृत्ति अपनी करतूत की घानी में क्या-क्या पेरती है या पेर सकती है, यह समूची भारतीय अस्मिता के लिए ख़तरनाक होगा। अतः मौन रहने की बजाय भारतीय बाज़ार को सारे जहां से अच्छा साबित करने पर तुले हुक्मरानों को यह संदेश देना आवश्यक है कि लोक-लुभावन विकास की शर्त पर भारतीय चेतना की गुलामी और उसकी ख़रीद-फ़रोख़्त कदापि बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

 

डॉ. राजीव रंजन प्रसाद

लेखक राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, रोनो हिल्स, दोईमुख, अरुणाचल प्रदेश के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.

मो. : 9436848281

ई-मेल : rrprgu@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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