चर्चा में

वर्ल्ड चैम्पियन सिन्धु ने रोने वालों को खुश होने का मौका दिया है….

 

  • राजीव कटारा

 

अपनी पीवी सिंधु वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियन हो गई। वह भी पहली हिंदुस्तानी। जिस देश में वर्ल्ड चैंपियन ‘हजारों सालों’ में बनते हों, वहां सेलीब्रेट करने का इससे बेहतर मौका क्या होगा? लेकिन हमें सेलीब्रेट करना नहीं आता। हमें जिन मौकों पर सेलीब्रेट करना होता है, वहां भी हम गमगीन होने का बहाना ढूंढ़ लेते हैं। ‘शामे ग़म की कसम’ हट ही नहीं पाती हमारी। एक लंबे समय से मैं इसी तरह माहौल अपनी खेल की दुनिया में देख रहा हूं।
ऐसा नहीं है कि लोग सेलीब्रेट नहीं कर रहे हैं। लेकिन अच्छे खासे लोग हैं जो आनेवाले कल को लेकर गमगीन हैं। आज सेलीब्रेट नहीं हो रहा और कल के लिए गमगीन हो रहे हैं। कुछ लोगों को सिंधु की ‘कन्सिस्टेन्सी’ को लेकर परेशानी है। अब वह चैंपियन हो गई। आगे वह हो पाएगी या नहीं! उन्हें परेशानी है कि अपने यहां खिलाड़ी एकाध चैंपियनशिप तो जीत लेते हैं, लेकिन बाद में कुछ नहीं कर पाते। यह बात ऐसे खिलाड़ी के लिए की जा रही है, जो वर्ल्ड चैंपियनशिप में पांच मेडल जीत चुकी है। अब तक देश को कुल मिले 10 मेडल में से पांच। और पिछले नौ महीने में दो सबसे बड़े खिताब उसके नाम हैं। अगर कोई खिलाड़ी इतने कम समय में दो बड़े भारी खिताब जीत सकता है, तब तो ये सवाल नहीं उठने चाहिए। रही बात कुछ फाइनल हार जाने की! भाई, फाइनल तक पहुंचना क्या मामूली बात है? यह भी देखना चाहिए कि इस बीच अपने कितने खिलाड़ी फाइनल तक पहुंचे। फिर हम देख रहे हैं कि एक खिलाड़ी लगातार बेहतर हो रहा है। अपनी फिटनेस में, अपने स्ट्रोक में, अपनी स्पीड में, अपनी प्लैनिंग में, अपने ओवरऑल गेम में। वह अपनी गलतियों से सीख रहा है। अपनी कमजोरियों पर काम कर रहा है। वह साफतौर पर आगे बढ़ता दिख रहा है। असल में हमें अपना ही भरोसा नहीं है। अपने खिलाड़ियों में भरोसा कैसे होगा? यों भी एक गुलाम मन को अपने पर ही सबसे कम भरोसा होता है। जब तक दूसरा न कह दे, उसे कैसे भरोसा हो सकता है। अपने भरोसे की दिक्कत को सिंधु पर थोप रहे हैं हम।

हान फेडरर के शहर में कितनी बड़ी उपलब्धि है ये। प्रकाश और गोपीचंद तक वर्ल्ड चैपिंयन नहीं हो पाए। प्रकाश के 36 साल बाद एक कांसा अब जाकर प्रणीत को मिला है। जब सिंधु वर्ल्ड चैंपियन के तौर पर खड़ी थीं तब उस तरह के कितने लम्हे हमें याद आ रहे थे? टीम खेलों में हॉकी के आठ ओलिंपिक गोल्ड, क्रिकट के तीन वर्ल्ड कप छोड़ दें तो…! मुझे तो अभिनव बिंद्रा का ओलिंपिक गोल्ड और विश्वनाथन आनंद का वर्ल्ड चेस चैंपियन होना ही याद आ रहा था। यों कुछ और शूटर्स हैं जिन्होंने वर्ल्ड चैँपियनशिप जीती है। पंकज आडवाणी के खाते भी बहुत कुछ है। उन्हें हाशिए पर डालने का मेरा कोई इरादा नहीं है। लेकिन…
हम रोतुओं का देश हैं। रुदाली में हम रमे रहते हैं। एक दौर था। पहले ओलिंपिक होते थे और कोई मेडल नहीं मिला। तब हम कितनी शान से लिखते थे कि झंडा बंधा ही रह गया। हॉकी में जब मेडल का सिलसिला थमा था, तो हमें मेडल के लाले पड़ गए थे। कई ओलिंपिक हम बिना मेडल लिए ही लौट आए थे। लेकिन फिर जब मेडल का सिलसिला शुरू हुआ, तो रुका नहीं। यह अलग बात है कि गोल्ड एक ही मिला।
यह देश धीरे-धीरे ‘कंपीट’ करना सीख रहा है। हम जब आजाद हुए थे, तब खेल में हिस्सेदारी करना ही सब कुछ था। कभी हॉकी तो कभी क्रिकेट हमें कुछ दिलासा दे जाते थे। इधर टीम खेलों से अलग भी चैंपियन मिलने लगे हैं। चैंपियन होने की उम्मीदें अच्छी-खासी बढ़ गई हैं। हमें अपने चैंपियन खिलाड़ियों की हौसला अफजाई करनी चाहिए। उन्हें ठीक से समझना चाहिए। लेकिन हम अब भी पचास साल पीछे जी रहे हैं। और उसी दौर की भाषा में रो रहे हैं।

लेखक कादम्बिनी के सहयोगी सम्पादक हैं|

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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