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मन के जीते जीत है… स्वामी राम शंकर

 

विचार और ज्ञान की कबड्डी चाहे जितनी खेल ली जाए, पर मन के प्रबल बहाव में बच पाना बेहद मुश्किल होता है. पता है उस सड़क पर चलेंगे तो मंजिल पर पहुँचने की दूरी-अवधि और बढ़ जायेगी. फिर भी हम उसी ओर निकल पड़ते हैं. मालूम है कि उस किरदार की हमारे चलचित्र में कोई जगह नहीं है. फिर भी उसके साथ एक काल्पनिक किरदार में खुद को जोड़ कर ख्यालों की दुनियां में खो जाते हैं. कई बार, कई लोगों से बेवजह की बाते हुई, लंबी बाते हुई. इतनी कि आँख अलसा गयी. थक गई और सो भी गयी. पर मन की प्यास न बुझी. इसमें कोई सन्देह नहीं कि जीवन की प्रत्येक घटना में, प्रत्येक संवाद के मध्य हर बार हम किसी से कुछ न कुछ अवश्य सीखते हैं. ध्यान रहे, ये सीखना अनन्त है. प्रश्न ये है कि केवल सीखते रहेंगे? जानते रहेंगे? या सीखे हुए सार्थक विषय को जीवन में शामिल करेंगे? जानने को बहुत कुछ है. असंख्य विषय वस्तु है जिनमें अनगिनत विषय हमें अपनी ओर आकर्षित करते हैं. हमें सोचना होगा, जिन विषयों से हम आकर्षित हो रहे हैं क्या वो सभी विषय जीवन निर्वाह के अनिवार्य साधन हैं? यदि हैं तो सीखने-जानने को तत्पर रहना चाहिये. कुछ एक विषय हमारी रुचि के होते हैं. उन्हें भी जीवन में अनिवार्य रूप से आत्मसात करना चाहिये. खास तौर पर गायन, वादन, नृत्य, लेखन अर्थात सृजनात्मक क्षेत्र के विषय को अभ्यास में लाते हैं तो जीवन की जीवंतता और बढ़ जाती है. ये विषय खुद को ही नहीं बल्कि औरों को भी सुख प्रदान करते हैं.


ये सब कीजिये. करते रहना चाहिये. साथ-साथ इस बात के लिए भी सतर्क रहना चाहिये कि इन विषयों में ही हम जीवन भर उलझे न रह जाएं. हमें विषयों से निकल कर आत्म केंद्रित भी होना होगा. स्वयं को समझना, जानना होगा. देह और देहि के अंतर को अनुभव करना होगा. यदि ऐसा अनुभव हो जाये तो देहि अर्थात आत्मा के मूल स्वरूप में स्थित होकर जीवन जीना आरम्भ करना होगा. साक्षी भाव से जीवन की घटनाओं से गुजरते हुए जो अनुभव होगा उसमें बंधन से मुक्ति का बोध होगा. जीवन परम् आनंद से परिपूर्ण है इसका एहसास होगा. भूतकाल की घटनाओं और भविष्य की संभावनाओं से प्रभावित हुए बिना वर्तमान को पूर्णतया जी पाने में आप सफल होंगे. यही तो असल जीवन जीने का पूर्ण अनुभव है. जो जहां है, पूर्ण रूप से वहाँ उसमें निमग्न है।

लेखक डिजिटल बाबा के नाम से जाने जाते हैं. हिमाचल प्रदेश के (बैजनाथ) कांगड़ा में साधना करते हैं.
सम्पर्क- 8628054140

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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