मैं कहता आँखन देखी

क्यों है संघ सिर के बल खड़ा?

 

  • नवल किशोर कुमार

भारत ही आरएसएस है और आरएसएस ही भारत। ऐसा कहकर इमरान खान ने आरएसएस की दिलीतमन्ना पूरी कर दी। यह मानना है आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल का। यानी अब पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री जो कि मुस्लिम धर्म के हैं, उनका सर्टिफिकेट भी आरएसएस को मिल गया है और वह भी संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में जहां विश्व भर के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे। आरएसएस की ओर से डॉ. कृष्ण गोपाल ने इमरान के प्रति आभार प्रकट किया है कि उन्होंने बिना कुछ किए धरे ही संघ का नाम पूरे विश्व में पहुंचा दिया है और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे ऐसे ही बोलते रहें।

यह तो हुई आरएसएस के मन में घुमड़ रहे खुशियों के बादल की बात। आरएसएस को इस बात का मलाल भी होगा कि उनके अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में न तो हिन्दू धर्म का नाम लिया और न ही संघ का। मोदी ने नाम लिया भी तो बुद्ध का। उनका कहना था कि भारत ने विश्व को युद्ध नहीं, बुद्ध दिया है।

खैर, यह सब अनौपचारिक बातें हैं। पश्चिम के लोग भले ही इस बात को समझें अथवा नहीं समझें लेकिन भारत में रहने वाला हर समझदार इंसान यह समझता है कि आखिर क्या वजह रही कि जिस देश में बुद्ध हुए, उसी देश ने बौद्ध धर्म को अपना धर्म क्यों नहीं माना। संघ के पास जाहिर तौर पर इसका जवाब है लेकिन उसके पास नैतिक साहस नहीं है कि वह सच को कबूल करे।

सच की बात हो रही है तो कल डॉ. कृष्ण गोपाल ने इमरान खान के संबोधन से गदगद होने के अलावा कुछ और बातें कही। दरअसल, वे एक कार्यक्रम में बोल रहे थे जिसका विषय था – धर्म की ग्लानि। उनके मुताबिक भारतीय सामाजिक व्यवस्था जिसको कि संघ हिन्दू सामाजिक व्यवस्था मानता है, में जाति व्यवस्था थी ही नहीं। यह व्यवस्था इसलिए लाई गयी क्योंकि गुलामी युग में लोगों को मांसाहार से दूर रखा जाय। यह धर्म को बचाए रखने के लिए जरूरी था। डॉ. गोपाल ने कुछ और बातें कही हैं। मसलन, हिन्दू धर्म में महिलाओं को उच्च स्थान हासिल था। उन्हें वेद लिखने से लेकर पढ़ने तक का अधिकार था। पर्दा प्रथा भी गुलामी युग की ही देन रही।

चलिए पड़ताल करते हैं संघ के इन बातों की। इमरान खान वाली बात कोई मायने नहीं रखती है। संघ यदि धर्म निरपेक्ष भारत के बदले जा रहे स्वरूप की आलोचना को अपनी बड़ाई समझता है तो यह उसकी बुद्धिमानी अथवा बेवकूफी है। लेकिन भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बारे में जो कुछ उन्होंने कहा है, वह सरासर झूठ है। एक ऐसा झूठ जो उनकी ही मान्यताओं को सिर के बल खड़ा कर देता है।

सबसे पहले गुलामी प्रथा की बात करते हैं। संघ के मुताबिक गुलामी युग से उनका सबसे अधिक मतलब मुसलमानों और अंग्रेजों के शासनकाल से कम है। यही वजह रही है कि अंग्रेजों के प्रति संघ वफादार रहा। आज भी संघ अपने इसी ढर्रे पर सोच और व्यवहार कर रहा है। वह मुसलमानों को अपना दुश्मन मानता है। लेकिन सच क्या है? क्या वाकई गुलामी युग का संबंध मुसलमान शासकों से रहा है?
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जाने-माने साहित्यकार और चिंतक प्रेमकुमार मणि  फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘आर्य बनाम हिन्दू : एक विश्लेषण’ शीर्षक लेख में इसका खुलासा करते हैं।  वे लिखते हैं कि “सावरकर का हिंदुत्व आर्यों और हिन्दुओं की इस एकमेवता को स्वीकारता है, लेकिन उनकी चितपावन मनोवृत्ति (सावरकर चितपावन ब्राह्मण थे) समरसता की जगह वर्चस्ववादी व्याख्या कर जाती है। सावरकर के अनुसार अनार्यों अथवा हिन्दुओं ने आर्यों की अधीनता स्वीकार की। आर्यों की हिन्दुओं पर इस विजय की घोषणा रामचंद्र ने की। इसलिए सावरकर रामचंद्र के राज्यारोहण समारोह को हिन्दू राष्ट्र का स्थापना दिवस मानते हैं। यदि सावरकर की स्थापना स्वीकार ली जाय, तो यह आर्यों का राष्ट्र-दिवस हो जाएगा क्योंकि उन्ही के अनुसार, हिन्दू यानि यहां के अनार्य-वासी तो हार चुके थे। सावरकर के अनुसार ही उन्होंने अधीनता अथवा गुलामी स्वीकार की थी। उनके विचारों पर काम करने वाली संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसीलिए रामजन्मभूमि के लिए हुए संघर्ष को इतना तूल दिया और उसे राजनैतिक अर्थों से भर दिया। दरअसल सावरकर ने बड़ी होशियारी से अपने आर्यत्व के विजय की घोषणा कर दी। उनके हिन्दुस्थान का रूपक अपने वास्तविक रूप में आर्यावर्त है। यह वास्तविक हिन्दुओं की पराजय की गाथा गढ़ता है। कुल मिला कर यह एक बड़ा सांस्कृतिक छल है, जिसकी व्याख्या अभी होनी है।”

असल में जिसको संघ हिन्दू कह रहे हैं, वे भारत के मूलनिवासी हैं, जिनकी सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्था को आर्यों ने छिन्न-भिन्न कर दिया। अब यदि संघ यह मानता है कि गुलामी युग का मतलब मुसलमानों का आना है तो यह महज उसका खुद को सिर के बल खड़ा करना ही है।

डॉ. गोपाल कृष्ण ने कहा है कि कथित तौर पर उनके हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था नहीं थी। लेकिन उनकी ही मनुस्मृति में क्या कुछ लिखा है, यहां देखिए –
– नीच वर्ण का जो मनुष्य अपने से ऊँचे वर्ण के मनुष्य की वृत्ति को लोभवश ग्रहण कर जीविका – यापन करे तो राजा उसकी सब सम्पत्ति छीनकर उसे तत्काल निष्कासित कर दे।10/95-98
– ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है । इसके अतिरक्त वह शूद्र जो कुछ करता है , उसका कर्म निष्फल होता है।10/123-124
– शूद्र धन संचय करने में समर्थ होता हुआ भी शूद्र धन का संग्रह न करें क्योंकि धन पाकर शूद्र ब्राह्मण को ही सताता है। 10/129-130
-जिस देश का राजा शूद्र अर्थात पिछड़े वर्ग का हो , उस देश में ब्राह्मण निवास न करें क्योंकि शूद्रों को राजा बनने का अधिकार नही है। 4/61-62
– राजा प्रातःकाल उठकर तीनों वेदों के ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करें। 7/37-38
– जिस राजा के यहां शूद्र न्यायाधीश होता है उस राजा का देश कीचड़ में धँसी हुई गाय की भांति दुःख पाता है। 8/22-23
– ब्राह्मण की सम्पत्ति राजा द्वारा कभी भी नही ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, मर्यादा है, लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है। 9/189-190

यदि शूद्र तिरस्कार पूर्वक उनके नाम और वर्ण का उच्चारण करता है, जैसे वह यह कहे देवदत्त तू नीच ब्राह्मण है, तब दस अंगुल लम्बी लोहे की छड़ उसके मुख में कील दी जाए। 8/271-272
– यदि शूद्र गर्व से ब्राह्मण पर थूक दे, उसके ऊपर पेशाब कर दे तब उसके होठों को और लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे।  8/281-282
– यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए, तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर शूद्र गुस्से में ब्राह्मण को लात से मारे, तब उसका पैर कटवा दिया जाए। 8/279-280
– इस पृथ्वी पर ब्राह्मण–वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नही है। अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी लाए। 8/381
– शूद्र यदि अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश करे तो उस शूद्र के मुँह और कान में राजा गर्म तेल डलवा दें। 8/271-272
– शूद्र को भोजन के लिए झूठा अन्न, पहनने को पुराने वस्त्र, बिछाने के लिए धान का पुआल और फ़टे पुराने वस्त्र देना चाहिए ।10/125-126
– बिल्ली, नेवला, नीलकण्ठ, मेंढक, कुत्ता, गोह, उल्लू, कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है। 11/131-132
– यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देता है तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि वह ब्रह्मा के निम्नतम अंग से पैदा हुआ है।
– निम्न कुल में पैदा कोई भी व्यक्ति यदि अपने से श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति के साथ मारपीट करे और उसे क्षति पहुंचाए, तब उसका क्षति के अनुपात में अंग कटवा दिया जाए।
– ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक मात्र कर्म निश्चित किया है, वह है – गुणगान करते हुए ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना।
– शूद्र यदि ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे, तब राजा उसकी पीठ को तपाए गए लोहे से दगवा कर अपने राज्य से निष्कासित कर दे।
– राजा बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञ करें और धर्म के लिए ब्राह्मणों को स्त्री, गृह शय्या, वाहन आदि भोग साधक पदार्थ तथा धन दे।
– जान बूझकर क्रोध से यदि शूद्र ब्राह्मण को एक तिनके से भी मारता है, वह 21 जन्मों तक कुत्ते-बिल्ली आदि पाप श्रेणियों में जन्म लेता है।
– ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है।
– शूद्र लोग बस्ती के बीच में मकान नही बना सकते। गांव या नगर के समीप किसी वृक्ष के नीचे अथवा श्मशान पहाड़ या उपवन के पास बसकर अपने कर्मों द्वारा जीविका चलावें ।
ब्राह्मण को चाहिए कि वह शूद्र का धन बिना किसी संकोच के छीन ले क्योंकि शूद्र का उसका अपना कुछ नही है। उसका धन उसके मालिक ब्राह्मण को छीनने योग्य है।
– राजा वैश्यों और शूद्रों को अपना अपना कार्य करने के लिए बाध्य करने के बारे में सावधान रहें, क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्य से विचलित हो जाते हैं तब वे इस संसार को अव्यवस्थित कर देते हैं ।
– शूद्रों का धन कुत्ता और गदहा ही है। मुर्दों से उतरे हुए इनके वस्त्र हैं। शूद्र टूटे-फूटे बर्तनों में भोजन करें। शूद्र महिलाएं लोहे के ही गहने पहने।
– यदि यज्ञ अपूर्ण रह जाये तो वैश्य की असमर्थता में शूद्र का धन यज्ञ करने के लिए छीन लेना चाहिए ।
– दूसरे ग्रामवासी पुरुष जो पतित, चाण्डाल, मूर्ख और धोबी आदि अंत्यवासी हो, उनके साथ द्विज न रहें। लोहार, निषाद, नट, गायक के अतिरिक्त सुनार और शस्त्र बेचने वाले का अन्न वर्जित है।
– शूद्रों के साथ ब्राह्मण वेदाध्ययन के समय कोई सम्बन्ध नही रखें, चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए।


डॉ. कृष्ण गोपाल का कहना कि हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में कभी महिलाओं को उच्च सम्मान हासिल था और उन्हें वेद लिखने तक का अधिकार था। जबकि उनके ही मनुस्मृति में लिखा गया है – स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नही होता। यह शास्त्र द्वारा निश्चित है। अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं, वे पापयुक्त हैं और असत्य के समान अपवित्र हैं, यह शाश्वत नियम है। तुलसीदास जिसने उनके राम को पुनर्स्थापित किया, उनके मुताबिक – शूद्र ढोल गंवार पशु नारी, ये सब हैं ताड़न के अधिकारी।

दरअसल, संघ को कोई ग्लानि नहीं है और न ही उसे कोई पश्चाताप है। वह हर परिस्थिति में ऊंची जातियों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वर्चस्व को कायम रखना चाहता है। यदि ऐसा नहीं होता तो महिलाओं को शीर्ष दर्जा की बात कहने वाले डॉ. गोपाल कृष्ण मनुस्मृति में उल्लेखित इन बातों को जरूर स्वीकार करते।

“अस्वतंत्रता: स्त्रियः  कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम
विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे
पिता  रक्षति कौमारे भर्ता यौवने
रक्षन्ति  स्थाविरे पुत्र,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति
सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:
द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:
इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो  धर्ममुत्तमम
यतन्ते भार्या भर्तारो  दुर्बला अपि”

यानी पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति  तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल-ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करनी चाहिये! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती है! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते है! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करता है!

बहरहाल, संघ की खासियत यही है कि उसने अपना चरित्र नहीं बदला है। वह पहले भी उंची जातियों का हितैषी था, आज भी है। आने वाले समय में भी उसकी यही मंशा है। इसलिए वह आज सिर के बल खड़ा है। कबीर से लेकर आंबेडकर तक ने हिन्दुत्व में निहित सामाजिक बुराइयों का पर्दाफाश कर दिया है। इसे अब दलित-बहुजन जनता समझने लगी है। इसका प्रभाव भी दिखता है।  लेकिन संघ की बदमाशियों का निवारण तभी संभव है जब भारत की बहुसंख्यक जनता हिन्दुत्व में निहित भेदभाव और वर्चस्वकारी नीतियों को समझे और उनका परित्याग करे। मतलब हिन्दू धर्म को डायनामाइट से उड़ा दे। जैसा कि डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब जाति का विनाश में कहा है।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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