जम्मू-कश्मीर

‘जन्नत’ की हंसी वादियों में क्यों दब गईं मासूम आवाज़ें ?

 

  • फिज़ा काज़मी

 

सन्नाटा, हाथों में पत्थर, दिल में डर, चारों तरफ से गोलियों की आवाजें, और हर पल मन में अपनो को खौने का खौफ़, घर की खिड़की से छुपके से झांकती और इस पूरे नजारे को निहारती वो नन्हीं निगाहें, जिन्हें इंतजार है कि कब दीवारों को पार करती गोलियों की तेज़ आवाजें थम जाएंगी? कब घर के दरवाजें पर लगी कुंडी खुल खुलेगी? कब सड़क किनारे लगी चीज़ की दुकानों के शटर खुल जाएंगे और कब घर की चौखट पर खड़े लंबी- लंबी बंदूकों को ताने जवान हट जाएंगे ?


इन आंखों में बस इंतजार है और वो इंतजार कब पूरा होगा ना उन्हें इस बात का कोई अंदाजा है और ना ही कोई खबर ?
आज मेरी कोशिश अपने शब्दों के सहारे उन बच्चों के जीवन की तस्वीर को बयां करने की है, जिनकी आंखों में महज इंतजार है. जिनका बच्चपन घर की चार दीवारी में कैद हो रहा है. जो मजबूर और बेबस हैं घर की चौखट को लांघने के लिए जिन्हें नहीं पता आर्टिकल 370 क्या है? जो नहीं जानते आतंकवाद क्या है? जो अनजान हैं पाकिस्तान की कायराना हरकतों से ? जो बेखबर हैं घाटी में घटती घटनाओं से ? जो अंजान हैं आज़ाद कश्मीर के नारे से और कुर्सी पर बैठे सत्ता के सियासतदारों से ये नन्हीं आंखे कभी सड़कों पर ढेर सारे लोगों को देखती हैं तो कभी सड़क के चारों ओर सन्नाटे को महसूस करती हैं, वो नन्हीं सी आंखें घर में मौजूद अम्मी अब्बू से सवाल तो कई पूछना चाहती हैं लेकिन जुबां तक लफ्ज नहीं आ पाते ।


ऐसा नहीं है कि यहां की शांति की नुमाईश नहीं होती यहां कभी सफ़ेद और लंबी सी गाड़ी में सवार होकर कई नेता आते हैं, तो कभी विदेशी मंडली को यहां की शांति की नुमाइंदगी कराई जाती है, वो कश्मीर की खूबसूरती को तो बखूबी निहार लेते हैं लेकिन वहां के लोगों के दर्द की आवाजें शायद उनके कानों तक नहीं पहुंच पाती….


बहरहाल, जन्नत जैसी जगह पर कई मासूम बच्चों का बचपन तो गुजर चुका और कई आज भी आस और उम्मीदों के सहारे खुशियों को त्यागते घर की चाहर दिवारी में बचपन गुजारने के लिए मजबूर हैं, लेकिन अफसोस इन बच्चों के दर्द को समझने वाले ना सियासतदार हैं और ना ही आजाद कश्मीर का नारा देने वाले लोग !

लेखिका एक निजी चैनल में एंकर के पद पर कार्यरत हैं|

सम्पर्क- sayyadfiza.k@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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