मुद्दा

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी – राहुल सिंह

 

  • राहुल सिंह

 

अभी एकाध सप्ताह पहले किसी ने फेसबुक के अपने पोस्ट में एक सवाल पूछा कि आखिर 2014 के बाद के भारत में ऐसा क्या मिल रहा है जो 2014 के पहले के भारत में नहीं मिल रहा था। बहुत से अतरंगी जवाब आये। लेकिन जिस एक जवाब की बारंबारता ने ध्यान खींचा, वह था, जियो और उसके द्वारा दिया जानेवाला प्रतिदिन का 1 जीबी डाटा। बात सच है। इसकी आसानी से अनदेखी नहीं की जा सकती है। 2014 के बाद टेलीकॉम सेक्टर का नक्शा बदल गया है। वोडाफोन, एयरसेल की तो बात क्या करें खुद रिलायंस के सीडीएमए सेट और जीएसएम के सिम अब बीते जमाने की बातें हैं। अभी टेलीकॉम सेक्टर के खिलाड़ियों में से एयरटेल समेत कई कंपनियों ने सीधे-सीधे भारत सरकार पर यह आरोप लगाया है कि जियो के लिए खेल के मैदान को एक तरफ झुकाया गया है, जिससे उसे ज्यादा लाभ मिल सके। अध्ययन बताते हैं कि एयरटेल ने 15 साल में जितने उपभोक्ता बनाये थे, उतने पिछले तीन साल में जियो ने बना लिये हैं। और अब जिस तेजी से जियो के फाईबर के जाल शहरों में बिछाये जा रहे हैं। आनेवाले समय में जियो का भारत में एकछत्र राज्य होगा। टेलीकॉम सेक्टर की वह सबसे बड़ी सेवा प्रदाता कंपनी होगी। खैर जैसे भी यह संभव हुआ हो, सच्चाई यह है कि इंटरनेट के इस्तेमाल में भारत ने एक लंबी छलांग लगा दी है। इसके कारण प्रत्येक भारतीय के व्यक्तिगत और सामाजिक आचरण पर असर पड़ा है। लेकिन यहाँ इंटरनेट के अत्यधिक इस्तेमाल से उसके राजनीतिक चाल-चलन पर क्या असर पड़ा है, इसकी ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की जा रही है।

पहले जिस कीमत पर आप 1 जीबी डाटा महीने भर के लिए पाते थे, आज उसमें सौ रूपये और अदा करने पर प्रतिदिन 1 जीबी डाटा 4 जी रफ्तार के साथ 84 दिनों तक इस्तेमाल कर सकते हैं। दरअसल इस मुफ्त के डाटा के सुनियोजित इस्तेमाल की तैयारी जिस एक राजनीतिक दल ने कर रखी थी, वह भाजपा थी। इसमें कोई दो मत नहीं है कि देश के दूसरे राजनीतिक दल जब तक यह बात समझ पाते तब तक बाजी उनके हाथ से निकल चुकी थी। भाजपा इस मामले में इतनी बड़ी बढ़त बना चुकी है कि इसे पाट पाना किसी राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजनीतिक दल के लिए अब संभव नहीं है। भाजपा के आईटी सेल से निकले लोगों के जो विडियोज यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं, उससे उनकी सुचिंतित, सुनियोजित और संगठित तैयारी का पता चलता है। आई टी सेल के लोगों को भाजपा अध्यक्ष के द्वारा दिये गये टिप्स अगर आपको याद है तो इस माध्यम के राजनीतिक इस्तेमाल के उनकी मंशा और तैयारी को लेकर कोई संदेह नहीं रह जाता है। आज तो आलम यह है कि किसी सूचना या खबर को फैलाने का जो आधारतंत्र भाजपा ने देश भर में तैयार कर लिया है, वह दूसरे राजनीतिक दलों के लिए अकल्पनीय है। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया की वस्तुस्थिति से देश अवगत है। आखिरकार ‘गोदी मीडिया’ की अवधारणा यूं ही नहीं आकार ले सकी। इसके बाद जो एक अल्टरनेटिव मीडिया के बतौर सोशल मीडिया का जो स्पेस बचता था, उसे नियंत्रित कर पाना भाजपा के लिए खासा चुनौतिपूर्ण रहा। उसे नियंत्रित करने के लिए ‘ट्रोल्स’ की परिकल्पना साकार की गई। कहना ना होगा कि ‘ट्रोल्स’ अपनी मकसद में कामयाब होते नजर आये। बहुतों को उन्होंने अपनी गाली-गलौच वाली भाषा से चुप कराया। लेकिन अब दूसरे राजनीतिक दल भी इस बात को समझ कर इस दिशा में काम कर रहे हैं। जवाब में जो प्रति-संस्कृति विकसित हो रही है। उसमें भी इसी किस्म के अतिकथन, झूठ और अमर्यादित भाषा को प्रश्रय मिलता दिख रहा है। अभी हाल में जो एक झूठी खबर वायरल हुई जो इस बात की तस्दीक करता है कि भाजपा को अब उसकी भाषा में जवाब देने की अदा विपक्ष ने भी सीख ली है। वह खबर थी कि देश का 226 टन रिजर्व सोना मोदी जी ने चुपचाप गिरवी रखा। जब तक इस खबर की सत्यता मालूम होती तब तक यह खबर काम कर गई थी। इस तरह देखें तो भाजपा की पिच पर अब विरोधियों को भी बल्लेबाजी करना आ गया है। इसलिए आप पायेंगे कि अचानक से मोदी और शाह की नीतियों, भाषणों और जुमलों का मजाक बनाने वाली कार्टून की बाढ़ सी आ गई है। इससे भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों के समर्थकों को भी व्हाट्स एप पर रायता फैलाने की बराबर छूट हासिल हो गई है। लेकिन असल चुनौती आम जन या पूर्वाग्रहरहित मतदाताओं के लिए हो गई है कि दरअसल किसी मामले में सत्य या तथ्य क्या है? जिन लोगों ने अपना पक्ष या विपक्ष चुन लिया है, उनके लिए यह कोई समस्या ही नहीं है। वह पुलवामा पर हुए हमले के बाद भारत के एयर स्ट्राइक के नाम पर विडियो गेम की क्लिपिंग भेजकर भी खुश हैं। उसकी सचाई जानने के बाद भी शर्मिन्दा नहीं है। यह चिंता की बात है। अकेले नेहरू पर व्हाट्सएप के जरिये जो कुत्सा प्रचार का अभियान चलाया गया, उस पर कोई शोध करे तो मालूम होगा कि यह अभियान कितना सुनियोजित था। मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या का भय दिखाने वाले और हिन्दुओं की एकजुटता का आह्वान करनेवाले संदेशों की बाढ़ आ गई। एक सांप्रदायिक मानस निर्मित करने में 2014 के बाद व्हाट्सएप ने बड़ी भूमिका निभाई है। मजाक में व्हाट्सएप को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी कहने के चलन के मूल में यही आचरण है। आईटी सेल द्वारा उत्पादित सूचना (भ्रामक) को ही आधिकारिक ज्ञान मान लेने की आदत ने महामारी का रूप ले लिया है। अब तो आलम यह है कि  आपके राजनीतिक रूझानों को जान कर फेसबुक और दूसरे सोशल प्लेटफार्म उसी मिजाज की चीजें आपके वाॅल पर एक नियमित अंतराल पर ठेल रहे हैं। बेरोजगार युवाओं के जीवन के अवकाश को मुफ्त के इस डाटा ने जहाँ एक ओर लील लिया है, वहीं दूसरी ओर अब उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि उनको प्राप्त संदेश में निहित बातें भ्रामक है या तथ्यों पर आधारित। दरअसल व्हाट्सएप अब देश में ‘परसेप्शन’ निर्मित करने का एक जरूरी टूल बन गया है। एक खास किस्म की राजनीतिक चेतना और पूर्वाग्रह को निर्मित करने में व्हाट्सएप ने निर्णायक भूमिक अदा कर दी है। समाज में अलग-अलग विचारधारा को माननेवाले, अलग राजनीतिक दलों को समर्थन करनेवाले लोग 2014 से पहले भी थे। लेकिन उनके बीच की वैचारिक खाई इतनी गहरी नहीं हुई थी। आज एक खास राजनीतिक दल की विचारधारा का अनुगमन करनेवाले समर्थकों को जिस दिशा में सोचने की राह दिखाई जा रही है और जिस ढंग से वे एक किस्म की बातों को बहस का हिस्सा बना रहे हैं। इससे इसकी व्याप्ति को समझा जा सकता है। असल संकट इस बात का है कि ऐसे लोगों के पास अब इतिहास, समाज, देश, राज्य की इतनी अधकचरी समझ मौजूद है कि उसे निजी या सार्वजनिक बहसों के जरिये समझा पाना मुमकिन नहीं रह गया है। जो एक बात अलग से इस संदर्भ में रेखांकित करने की यह है कि व्हाट्सएप के इस गैर जवाबदेह सूचना प्रसारण की मानसिकता के निर्माण और प्रचार-प्रसार में गोदी मीडिया की महती भूमिका रही है। 2000 के नोट में चिप लगे होने जैसी गैर जवाबदेह बात करने के बावजूद टीवी एंकर पर कोई कार्यवाही न होना ‘फेक न्यूज’ को प्रोत्साहित करने की दिशा में बढ़ा हुआ एक ऐतिहासिक कदम था। उसके बाद तो ‘फेक न्यूज’ की बाढ़ सी आ गई। जब खुले आम ऑन स्क्रीन झूठ बोल कर किसी कार्यवाही से बचा जा सकता था तब व्हाट्सएप के ‘फारवार्डेड मैसेज’ पर क्या कार्यवाही होती? इसलिए इस बात को समझने की जरूरत है कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, फेक न्यूज, गोदी मीडिया, आई टी सेल और ट्रोल्स 2014 के बाद इस देश में एक खास किस्म की मानसिकता को निर्मित करने के उद्देश्य से अस्तित्व में आये थे। इनकी जड़ें कहाँ हैं अलग से कहने की जरूरत नहीं है।

लेखक हिन्दी के युवा आलोचक हैं |

सम्पर्क- +917979847926, alochakrahul@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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