शख्सियत

कवि वही जो अकथनीय कहे – शेख अब्दुल वहाब

 

  • डॉ.शेख अब्दुल वहाब

 

आधुनिक हिन्दी कविता की विकास परम्परा में नयी कविता को स्थापित करने का महती कार्य डॉ. जगदीश गुप्त ने किया| इस बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व का जन्म 3 अगस्त 1954 को शाहाबाद – हरदोई (उ.प्र.) में हुआ था|  हिन्दी साहित्य जगत में कवि-चित्रकार-समीक्षक के रूप में  वे विशेषतः आदृत रहे|  उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक पदों को अलंकृत किया और अनेक सम्मानों से विभूषित हुए| अपने जीवन काल (1954 से 2001) तक अनेक संस्थानों, समितियों, अकादमियों, विश्वविद्यालयों आदि से सम्बद्ध रहे| आपकी मूल काव्य चेतना छायावादी संस्कारों के साथ प्रगतिवादी रुझान से संपृक्त है|  अपने काव्यों में उन्होंने शिल्प और संवेदना के स्तर पर नवीन प्रयोग भी किये और अन्त में नयी कविता की स्थापना एक वाद मुक्त काव्यान्दोलन के रूप में सफलता से किया| बाबु गुलाबराय के शब्दों में “1954 में अपने सम्पादकत्व में प्रकाशित पत्रिका ‘नयी कविता’ से मानो जगदीश गुप्त ने नयी कविता के संवाहक के रूप में अपने को स्थापित करवा लिया (सुबोध इतिहास,पृ.238)|” डॉ. रमाशंकर शुक्ल के छात्र होने के नाते ब्रज भाषा के कवियों के साथ गुप्त जी भी समाविष्ट किये गए| पारंपरिक छंदों के साथ उन्होंने मुक्त छंद में भी रचनाएँ की| उन्होंने शम्बूक, गोपा-गौतम, बोधिवृक्ष, जयंत और शांता कथा – काव्यों की रचना की तथा शब्ददंश, नाव के पाँव, आदिम एकांत, युग्म, बहुलोचना नदी, आक्रोश के पंजे  आदि मुक्तकों का भी सृजन किया|

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गुप्त जी की या फिर नयी कविता की प्रमुख विशेषता आधुनिकता का बोध रही है| यही विशेषता इस काव्यधारा को पूर्ववर्ती काव्यधाराओं से अलगाती है| इस समय-सापेक्ष एवं गतिशील प्रक्रिया उनके ही शब्दों में “आधुनिकता अपने सही अर्थ में उस विवेक पूर्ण दृष्टि से उपजती है जो व्यक्ति को वास्तविक युगबोध प्रदान करने के साथ-साथ अधिक दायित्वशील, सक्रिय और मानवीय बनाता है|”(नयी कविता:स्वरूप और समस्याएं पृ.26)| आधुनिक भाव-बोध की गहरी दृष्टि इनके काव्यों में पायी जाती है| नयी कविता में व्याप्त जीवन के प्रति आस्था गुप्त जी के काव्य में द्रष्टव्य है| अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने आधुनिकता बोध को सही ढंग से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है| ‘शम्बूक’ के माध्यम से स्वार्थग्रस्त व्यवस्था के अन्त की बात उठायी गयी है| और सत्ता पक्ष के खिलाफ प्रश्न चिह्न लगाने का प्रयास किया गया है| यही प्रश्नाकुलता या प्रश्नशीलता आधुनिकता बोध का लक्षण है| “प्रश्नशीलता आज के कवि की प्रमुख विशेषता है|”(हिन्दी कविता का समकालीन परिदृश्य, हरदयाल, पृ.23)| गोपा-गौतम, बोधिवृक्ष, जयंत और शांता काव्यों के माध्यम से गुप्त जी ने आधुनिकता बोध की इस विशेषता को उभारा है, समकालीन समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए|

नयी कविता में वैज्ञानिक प्रगति के कारण उत्पन्न यांत्रिकता, यांत्रिक सभ्यता के कारण उत्पन्न आधुनिक जीवन की विसंगतियों, विद्रूपताओं, विषमताओं आदि की अभिव्यक्ति हुई है| वैश्वीकरण के इस दौर में आदमी तनाव में जीने को विवश है| इस तनाव के कारण और यंत्रवत जीवन व्यवस्था की भयावहता के कारण भी उसकी संवेदना आहत हुई है| “आज का साहित्य तनाव में लिखा गया साहित्य है||”(साठोत्तर हिन्दी कविता की वस्तु योजना, डॉ.रावत,पृ.58)| डॉ. जगदीश गुप्त के काव्यों में विज्ञान से उत्पन्न वैचारिक क्रान्ति और तर्कशीलता के दर्शन होते हैं| शम्बूक में व्यवस्था के प्रति विद्रोह का स्वर मुखर है| वह अपनी  तर्कशीलता से शासन व्यवस्था पर निर्दय प्रहार करता है| उसकी लडाई मात्र शम्बूक की लड़ाई नहीं है, बल्कि आज के मनुष्य की लड़ाई है| उसकी समस्या आधुनिक मानव की समस्या है| डॉ. गुप्त के पात्र उनकी  वैचारिकता तथा बौद्धिकता के सशक्त वाहक हैं| कवि के शब्दों में, ‘शम्बूक के मुख से कहलाई गयी बात मेरी अपनी ही है’|”(त्रयी – 3, पृ.11) उनका भूमिपुत्र नए मनुष्य का प्रतीक है और नयी कविता में नैतिकता का आधार बन गया है| क्योंकि उनके अनुसार ओढी हुई झूठी नैतिकता भारी लबादा होकर आदमी की  सीधी चाल को कुंठित कर देती है|

‘गोपा-गौतम’ में गुप्त जी ने स्त्री–पुरुष के पारस्परिक सम्बन्ध की आतंरिक स्थितियों का निरूपण मानवीय पक्ष उभारते हुए किया है| हाँ, इसके लिए उन्होंने काल्पनिकता का सहारा लिया है| उनका नारी चित्रण या चिंतन भी आधुनिक भाव- बोध से संपृक्त है| गोपा और ‘शांता’ काव्य की शांता (राम की बड़ी बहन) के आधार पर नारी सम्बन्धी उनका विमर्श स्पष्ट हुआ है| उनकी गोपा, गौतम के महाभिनिष्क्रमण को पलायन कहने का साहस रखती है| “मैंने यशोधरा (गोपा) की नयी कल्पना की है जिसमे उसके माता रूप की अपेक्षा नारी रूप प्रधान है|”(गोपा-गौतम, पृ.10) उनकी शांता उपेक्षित नारी समाज का प्रतीक है| उसे पिता द्वारा रोमपाद को दत्तक दिए जाने पर पिता दशरथ से  तर्क करती है| “गोद दिया या बोझ उतारा /पीछे मुड़कर नहीं निहारा(पृ.40) तथा राम से कहती है “ कन्या होना पाप नहीं है / नारी जीवन अभिशाप नहीं है|”(पृ.112) आधुनिक अनारी के रूप में वह अपनी अस्मिता के प्रति सजग है| ‘जयंत’ काव्य का जयंत माता पिता के पारस्परिक संघर्ष एवं भ्रष्ट आचरण से प्रभावित अन्तर्मुखी पात्र है| गुप्त जी ने उसका चित्रण युगीन संदर्भ से जोड़कर किया है| वह अपने कर्मों का फल भोगने को तैयार है किन्तु इसके लिए वह अपने परिवेश को उत्तरदायी ठहराता है|

डॉ.जगदीश गुप्त की कविता आशावादिता पर अवस्थित है| उन्होंने तो कविता को मानवता की मातृभाषा माना है| इसलिए नयी कविता के केंद्र में मानव और मानव कल्याण की भावना को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है| आधुनिकता के मूल में निहित मानववादी स्वर की सफल अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई है| ‘नयी कविता: स्वरूप और समस्याएं’ ग्रन्थ में उन्होंने लिखा है “समस्या का समाधान इसी में है की नए भाव – स्तर पर मनुष्य की मनुष्य के प्रति समाज आस्था जागरित हो|”(पृ.२९) इसलिए गुप्त जी ने अपने काव्यों में उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना की है| उनके गौतम तो वैयक्तिक या निजी समस्याओं से परे मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए समर्पित हो जाते है और इसका सारा श्रेय गोपा को देते हैं| गौतम (‘बोधिवृक्ष’ में) के लोकवंदित रूप(सामान्य किन्तु सम्मान्य) के दर्शन भी हो जाते हैं| डॉ.शंभूनाथ सिंह का कथन कि “मानव को केंद्र में स्थापित करके ही आज आधुनिकता की अवधारणा निश्चित की जा सकती है|”6,डॉ.गुप्त के शब्ददंश, नाव के पाँव, आदिम एकांत आदि काव्य संग्रहों में स्पष्टतः सिद्ध हुआ है| मानवता के विरोध में पड़नेवाली किसी भी विचार को उन्होंने इसलिए अस्वीकार किया है क्योंकि वह आधुनिकता के विरोध में पड़ता है| गुप्त जी के काव्य की यही प्रमुख विशेषता है|

डॉ.जगदीश गुप्त ने भारतीय संस्कृति की स्वस्थ परम्पराओं को स्वीकार किया है| अतीत को नयी अर्थवत्ता के साथ नए रूप में सर्जनात्मक कल्पना के सहारे प्रस्तुत किया है| पौराणिकता और ऐतिहासिकता के परिप्रेक्ष्य में आधुनिकता को समझने का प्रयास कर उसे अपने काव्य में अभिव्यक्त किया है| परम्परागत रूढ़ियों के बदले यथार्थ को महत्व देते समय अपनी विवेकशीलता का सहारा लिया है| संस्कृति सम्बन्धी विचार ‘शम्बूक’ में इसप्रकार व्यक्त हुए हैं| “राज्य जो संस्कृति रहित है, दर्प है:/डसेगा मानव नियति को सर्प है|”(पृ.97)  ‘गोपा गौतम और बोधिवृक्ष” काव्यों में गौतम की वाणी “बहुजनसुखाय बहुजनहिताय” को अभिव्यक्ति प्रदान की है| ‘युद्ध और बुद्ध’ कविता में उन्होंने आज की ज्वलंत युद्ध समस्या के समाधान के रूप में बुद्ध के विचारों को नए सिरे से प्रस्तुत किया है| “युद्ध को/तिलांजलि दो, श्रद्धांजलि/ बुद्ध को|”(शब्द दंश, पृ.92) उनके ‘आक्रोश के पंजे’ काव्य संग्रह में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य मिलता है| ‘युग्म’ में “नर-नारी की समानता के आधुनिक संदर्भ को व्यक्त किया है”| उनका युग्म भाव शारीरिक पक्ष की अपेक्षा मानसिक पक्ष को अधिक महत्व देता है| उनका शिल्प पक्ष भी समकालीन परिस्थितियों की जटिलताओं को अभिव्यक्त करने में सक्षम रहा है| वह भी नये एवं उपयुक्त भाषिक, आलंकारिक, प्रतीक और बिम्बगत साधनों के प्रयोग के साथ|

 

डॉ.गुप्त अपने परिवेश के प्रति सजग साहित्यकार हैं| उनके साहित्य में व्यक्तिगत चेतना और समष्टिगत चेतना का सुन्दर समन्वय देखा जा सकता है| आधुनिकता बोध का नकारात्मक पक्ष इनके काव्यों में उभरा कर आ नहीं सका है| स्वयं अस्वस्थ रहकर भी उन्होंने 1998 में ‘शांता’ काव्य की रचना की थी| शोध छात्रों के प्रिय शोध निर्देशक रहे| नयी कविता के संस्थापक होकर अज्ञेय से मिलकर “नवधा’ का संपादन किया था| ‘कवितांतर’ एवं ‘त्रयी’ के माध्यम से अनेक युवा कवियों को प्रोत्साहन दिया| 1992 में मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और 1998 में भारत-भारती सम्मान से विभूषित इस महान काव्य-मनीषी(26 मई 2001 को निधन) का स्मरण करना आवश्यक ही नहीं प्रेरणादायक भी है| जीवन में आस्था को उभारती उनकी ये पंक्तियाँ यहाँ समापन के लिए उपयुक्त लगती हैं||||“मानो या मानो तुम सही, / पर सोचता हूँ मैं यही, / ये जिन्दगी के रास्ते| / सारी धरा के वास्ते|”

(डॉ.जगदीश गुप्त की जयंती के अवसर पर उनकी स्मृति में लिखा गया लेख)

 

 लेखक इस्लामिया महाविद्यालय (स्वायत्त), तमिलनाडु में हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं|

सम्पर्क – +919443816403 , yadikiwahab@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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