देशकाल

उस दिन के लिए हम तैयार नहीं थे – राहुल सिंह

 

  • राहुल सिंह

 

अंग्रेजी का एक फ्रेज है (होप फोर द बेस्ट, बट रेडी फोर द वस्र्ट) ‘बेहतर की उम्मीद करो, पर बदतर के लिए तैयार रहो।’ टीम इंडिया अपने विश्वकप के अभियान में इस बुनियादी बात को भूल कर उतरी। सौभाग्य उनके साथ रहा इसलिए उनकी असल कमजोरी लीग मैच में उजागर होने से रह गयी। टीम इंडिया की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी मिडल आर्डर थी। टीम इंडिया के पूरे अभियान को देखेंगे तो पायेंगे कि सबसे ज्यादा प्रयोग चौथे नम्बर के बल्लेबाज पर हुए। चूंकि लगभग मौकों पर टॉप आर्डर में से किसी न किसी ने परफार्म किया तो मिडल आर्डर का लिटमस टेस्ट होने से रह गया। बाकी भारतीय गेंदबाजी ने उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर प्रदर्शन पूरी शृंखला के दौरान किया इससे भी मिडल आर्डर की कमी ढँकी रह गयी। पर मानो यह सबकुछ किसी पटकथा की तरह लिखा हुआ था, जिसको सेमीफाईनल में ही मंचित होना था। अव्वल तो शिखर धवन का चोटिल होना एक बड़ा कारण रहा, उसके बाद भले के॰ एल॰ राहुल को ओपनिंग की जिम्मेदारी दे दी गयी हो। लेकिन बतौर सलामी बल्लेबाज जिस आक्रामकता के साथ शिखर धवन विपक्षी गेंदबाज को परेशान करते थे, वह बुनियादी गुण के॰ एल॰ राहुल में सिरे से नदारद था। बावजूद इसके वह निभा ले गये। यह गनीमत रही। लेकिन खुद को बचाये रखने के लिए उन्होंने गेंद खाये। जिसकी भरपाई रोहित, विराट या हार्दिक पांड्या करते रहे। लेकिन सवाल वही था। चौथा नम्बर।

आपको याद है इंग्लैंड के खिलाफ जिस मैच में धीमे रन बना कर हारने का भारत पर आरोप लगा, जिससे पाकिस्तान विश्व कप से बाहर हो जाये। उस मैच के खत्म होने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में जब रोहित शर्मा से पत्रकारों ने पूछा कि “क्या विराट कोहली के आऊट होने के बाद नम्बर चार पर रिषभ पंत को देखकर आपको हैरानी हुई?” तों उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि “नहीं, बिल्कुल नहीं। पूरा इंडिया पूछ रहा था कि रिषभ पंत कहाँ है, अब वह चार नम्बर पर था।” दरअसल एक शिखर धवन के बाहर होने से उस रिषभ पंत को जगह मिली जो विश्व कप के लिए चुने गये पंद्रह खिलाड़ियों में शामिल तक नहीं था। चौथे नम्बर का प्रयोग यहीं खत्म नहीं हुआ। दिनेश कार्तिक को भी मौका दिया गया। इस तरह भारत अफगानिस्तान और बांग्लादेश के खिलाफ चार विकेटकीपर के साथ मैच में उतरे। यह मजाक नहीं है, ऐसा हुआ इस बार। इतना ही नहीं जिस विजय शंकर को आल राउंडर के नाम पर टीम में जगह दी गयी थी दो मैच में तो उससे बॉलिंग तक नहीं कराई गयी। गनीमत है कि वे चोटिल होकर बाहर हुए। लेकिन हुआ क्या? उसकी जगह फिर मयंक अग्रवाल शामिल किये गये, जो कहीं गिनती में ही शामिल नहीं थे।

अंबाती रायडू ने यूं ही संन्यास की घोषणा नहीं कर दी। वे उन पाँच खिलाड़ियों में शामिल थे, जरूरत पड़ने पर जिनको विश्व कप के लिए सुरक्षित खिलाड़ियों में रखा गया था। पर उस सूची की अनदेखी कर मयंक अग्रवाल को शामिल किया गया। कुल मिलाकर चौथे नम्बर के बल्लेबाज की पोजिशन इस विश्व कप में ‘म्यूजिकल चेयर’ सरीखी हो गयी थी। लेकिन चौथे नम्बर के चक्कर में हम यह भूल चुके थे कि सलामी बल्लेबाज के बतौर राहुल संघर्ष कर रहे थे। यह तो रोहित शर्मा के रिकार्डतोड़ शतकों ने के॰ एल॰ राहुल के लिए राह आसान कर दी, नहीं तो न्यूजीलैंड से पहले मामला खराब हो जाना था। रही बात धौनी की तो यह बात स्वीकारनी पड़ेगी कि अब वह पहले की तरह ताबड़तोड़ बैटिंग नहीं कर सकते हैं। पर अपनी भूमिका को अपने जानते उन्होंने बहुत बेहतर तरीके से निभाया है। उनकी बैटिंग की एक बुनियादी गलती रही कि उनके साथ बल्लेबाजी करनेवाले पर रन बनाने का दबाव रहा। धौनी एक छोर फ्रीज किये रहे लेकिन केवल विकटों के मामले में नहीं, रन के मामले में भी वे कई बार स्ट्राइक रोटेट नहीं कर सके। जिसका दबाव दूसरे छोर पर खड़े बल्लेबाज ने ले लिया। इंग्लैंड वाले मैच में हार्दिक पांड्या और न्यूजीलैंड वाले मैच में रवीन्द्र जडेजा धौनी के बनाये दबाव के कारण विकेट गंवा बैठे। धौनी का यह एप्रोच कि अड़तालीस ओवर तक ठुकठुका के विकेट बचाना है और आखिरी एकाध ओवर में स्ट्राइक लेना है, टीम इंडिया के लिए आत्मघाती साबित हुआ।


न्यूजीलैंड वाले सेमीफाईनल में धौनी की जगह दिनेश कार्तिक को भेजने के फैसले के मूल में धौनी की पिछले मैचों में की गयी धीमी बल्लेबाजी ही रही। इस पर धौनी के कद को देखते हुए कोई कुछ न बोले बात अलग है। दिनेश कार्तिक की जगह धौनी ने वही पारी खेली होती और उतने ही अविश्वसनीय कैच से उनकी पारी खत्म हुई होती तो यकीन मानिये। धौनी के संन्यास का मार्ग प्रशस्त हो चुका होता। अगर बारिश न आई होती तो बहुत हद तक संभव है कि पहले दिन भारत आसानी से जीत दर्ज कर पाता। लेकिन दूसरे दिन जब वे फील्ड पर आये तो उनके पास सलामी बल्लेबाजों का पिछले मैचों में किया गया शानदार प्रदर्शन था, जिस कारण वे बहुत तैयारी के साथ नहीं आये। इसके उलट न्यूजीलैड पूरे होमवर्क के साथ फील्ड पर उतरी। उनके होमवर्क का अंदाजा विराट कोहली के विकेट को देखकर लगाया जा सकता है कि कैसे तीन बाहर जाती गेंदों के बाद एक भीतर आती गेंद उनको पगबाधा का शिकार बना गयी। के॰ एल॰ राहुल को लेकर जिस बात का डर था, वह भी इत्तेफाकन इसी मैच में घटित हुआ। रोहित शर्मा भी चलते बने। जब पाँच रन में आप अपने 3 बल्लेबाज गंवा देते हैं तो आपके पास मैच में वापस आने का मौका लगभग खत्म हो जाता है। दिनेश कार्तिक बिलकुल सही जगह पर आये थे, बस वह एक खराब दिन था। उसके बाद रिषभ पंत और हार्दिक पांड्या अपने जोश में मैच को खींच ही रहे थे कि नब्ज पर काबू नहीं रख सके।

भला हो रवीन्द्र जडेजा का जिसने उस दिन भारत के लिए पचास ओवर देखने लायक स्थितियाँ अपने यादगार पारी से संभव कीं। जडेजा को खेलता देख एक पल को यह यकीन करना मुश्किल था कि वह उसी पिच पर खेल रहा है जिस पर बाकी भारतीय टीम भी खेल रही थी। अकेले उसने वह फर्क पैदा कर दिया था। बात जो कायदे से जानने समझने की थी कि वह कौन-सी बात थी, जिससे जडेजा खुल कर खेल सके और बाकी बंधक बने रह गये। दुर्भाग्य ने उस दिन अलग ही पटकथा लिख रखी थी। अन्यथा धौनी का वह रनआऊट होना संभव नहीं था। उनचासवें ओवर की पहली गेंद पर फग्र्युसन की गेंद को उन्होंने 6 रन के लिए सीमा रेखा के पार पहुँचा कर अपने इरादे जता दिये थे। मुझे पूरा भरोसा था कि वे इसे संभव कर दिखाते, पर होना कुछ और था, जो होकर रहा। दरअसल एक होमवर्क के अभाव में टीम इंडिया विश्व कप से बाहर हो गयी। इसकी शुरूआत शिखर धवन के बाहर होने से आरंभ हुई थी। चौथे नम्बर से राहुल को ऊपर धकेले जाने के बाद किसी ना किसी मैच में मिडल आर्डर पर यह बोझ पड़ना थी। रोहित शर्मा के शतकों और विराट कोहली के अर्द्धशतकों की लड़ियों के आगे टीम इंडिया इस बात को भुला बैठी थी कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। इसलिए हारने के बाद विराट कोहली इस बात पर टिके थे कि पूरी शृंखला में हम शानदार खेले लेकिन 40-45 मिनट के खराब खेल ने हमें इस विश्व कप से बाहर कर दिया। याद रहे उस 40-45 मिनट के खराब खेल में धौनी कहीं शामिल नहीं थे। धौनी के बाहर होने के बाद उस नम्बर पर उससे ज्यादा विश्वसनीय बल्लेबाज को खोजने की चुनौती अब भी कायम है।

बहरहाल, न्यूजीलैंड अच्छा खेली और उस दिन वह जीत की हकदार थी। यह अलग बात है कि भारत के लिए सेमीफाईनल का दिन जितना खराब था, उससे कहीं ज्यादा खराब दिन न्यूजीलैंड के लिए फाईनल का रहा। जिस गुप्तिल ने धौनी को रन आऊट करके भारत को बाहर का रास्ता दिखाया था। फाईनल के उन्हीं आखिरी ओवर में पुनः स्टोक्स को रन आऊट की गुप्तिल की कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से इंग्लैंड के खाते में बाई के अतिरिक्त चार रन दिला बैठी बात यहीं खत्म नहीं हुई। इंग्लैंड गुप्तिल के वैसे ही दूसरे रन चुराने के क्रम में रन आउट होने से फाईनल हार बैठा जैसा धौनी के रन आऊट होने पर भारत सेमीफाईनल हार बैठा था। यह भी गजब संयोग ही था।

लेखक हिन्दी के युवा आलोचक हैं |

सम्पर्क- +917979847926, alochakrahul@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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