मुद्दा

नदी को दीन बनाते हम – गिरीश पंकज

 

  • गिरीश पंकज

 

हम लोग अपनी-अपनी नदियों के प्रति कितने सजग हैं, इसका अनुमान नदियों की हालत देखकर ही लगाया सकता है। देश की अधिकांश नदियाँ प्रदूषण की मार झेल रही हैं। फिर चाहे उत्तर प्रदेश की गंगा हो, असी और वरुणा हो या आमी नदी हो। बनारस के बीचोबीच से बहने वाली नदी असी तो ‘असी नाला’ के रूप में पहचानी जाती है।  काशी में रहने वालों ने ही असी की ऐसी हालत कर दी है। उसके आसपास अवैध कब्जे कर-कर के सैकड़ों घर बना लिये गये। वर्षों पहले जब पहली बार जब कुछ लोगों ने असी के किनारे को पाटने की कोशिश की थी,  तभी अगर लोग जाग्रत हो जाते तो आज यह नौबत नहीं आती। अब जबकि पूरा परिदृश्य बदल चुका है, असी नदी नाले में तब्दील हो गयी है तो मुट्ठी भर लोग वहाँ असी को बचाने की और पुनर्जीवित करने की चिन्ता कर रहे हैं। पता नहीं ये लोग कब सफल हो पाएँगे। होंगे भी या नहीं।  छत्तीसगढ़ की इंद्रावती, दूध, हसिया, हसदेव, शिवनाथ, खारुन, केलो या अरपा हो या नार्थ ईस्ट की नाम्बुल नदी हो। नदी जब मरणासन्न होने लगती है, तब हमारी लोक चेतना जाग्रत होती है। तब मुट्ठी भर लोग नदी किनारे जाते हैं और उसे प्रणाम करके जन जागरण यात्रा शुरू करते हैं। ऐसे आयोजन लगभग वार्षिक श्राद्ध की तरह अक्सर गर्मियों में देखने को मिलते हैं। हम अजीब दुनिया के प्राणी हैं। जो नदी हमारी माँ की तरह है, जिसकी जलधार हमें जीवन देती है,  उसी नदी को हम नष्ट करने पर आमादा रहते हैं। छत्तीसगढ़ की नदियों  की हालत भी काफी खराब है। भारत का नियाग्रा जलप्रपात कहे जाने वाले बस्तर के चित्रकोट में एक बूंद भी पानी नहीं है। क्योंकि इंद्रावती लगभग सूख चुकी है। छत्तीसगढ़ की अन्य नदियों की भी यही दुर्दशा है। जलविहीन नदियों को देखकर कुछ लोग विचलित हो रहे है। पिछले दिनों कुछ लोगों ने स्कूली बच्चों के साथ  इंद्रावती जन जागरण यात्रा निकाली। शिवनाथ नदी के संरक्षण के लिए शिवनाथ सेवा मंडल बना जो पिछले एक दो वर्षों से नदी के तट पर निरन्तर आरती करता है, साफ-सफाई करता है। कुछ परपीड़क किस्म के लोग इन्हें विचित्र नजरों से देखते हैं और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते हैं। वे उनके काम में हाथ नहीं बटाते वरन उपहास की दृष्टि से देख कर आपस में चर्चा करते हैं कि पागल हैं। केलो, अरपा, महानदी, खारुन, हसिया औऱ हसदेव आदि हर नदी की बुरी दशा है।  रायगढ़ जिला एक औद्योगिक क्षेत्र है। वहाँ बहने वाली केलो नदी की भी दुर्दशा है। उसे बचाने के लिये भी वहाँ के जागरुक लोग आगे आए हैं। बिलासपुर की नदी अरपा जो अक्सर अंतःसलिला बनी रहती है। बरसात में जरूर उसमें पानी दिखाई देता है। अरपा को लेकर भी  अनेक समाजसेवी संस्थाओं ने पदयात्रा निकाली,  जागरण अभियान चलाया। कहने का मतलब यह है कि हर मरणासन्न नदी को पुनर्जीवित करने के लिए लोग चिन्तित तो हैं लेकिन ऐसे लोग मुट्ठी भर हैं। जब तक यह मुट्ठीभर चेतना अगर व्यापक जनचेतना में तब्दील नहीं होती, नदियों को बचाना संभव नहीं है। इसलिए अब यह बहुत जरूरी है कि बच्चों में बचपन से ही नदियों के सम्मान करने का संस्कार दिया जाय। फिर चाहे वह ग्रामीण बच्चे हों या शहरी। हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी हो कि प्राथमिक स्तर से ही नदियों के प्रति  लगाव पैदा करने वाले  पाठ बनाए जाएँ।  फिर चाहे पहली कक्षा के बच्चे के लिए चार-छह पंक्तियों का  कोई नदी गीत हो या फिर स्नातकोत्तर स्तर तक नदियों पर व्यापक अध्ययन वाला कोई पाठ। कहने का मतलब यह कि बचपन से लेकर जवानी तक  बच्चे के जेहन में यह बात रहनी चाहिए  कि नदी हमारी माँ है।  उसका संरक्षण हमारा परम कर्तव्य है। जैसे तुम्हारे माता-पिता पूजनीय हैं, वैसे ही हमारी नदियाँ भी पूजनीय हैं क्योंकि यही वह नदी है जिसके बलबूते हमारी प्यास बुझती है। नदी हमारी जीवनदायिनी है। (गाय को भी हमने माँ ही माना लेकिन उसकी हालत भी नदियों की तरह हो चुकी है।) बच्चों को जब तक हम नदी का महत्व नहीं समझ जाएँगे, उनको जब तक नदियों के निकट नहीं लाएँगे, नदियों के तट की साफ-सफाई करवाने के लिए उन्हें प्रेरित नहीं करेंगे, वे नदियों के महत्व को भला कैसे समझेंगे? ऐसा कुछ चले तो  बच्चों में नदियों के प्रति अनुराग विकसित होगा। पंचतारा किस्म के बड़े-बड़े स्कूलों के बच्चों को नदियों के तट पर लाना चाहिए।  वहाँ उनसे शपथ दिलानी चाहिए कि ‘हम जीवन भर नदी को बचाने का प्रण करते हैं। नदी में भूलकर भी कचरा नहीं डालेंगे। शहर का दूषित जल या कचरा नदी में जाने से हम रोकेंगे’।

नदी को लेकर जो चिन्ता हमारा समाज गरमी के अवसर पर दिखाता है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि वह भविष्य की आशंका से भयग्रस्त हो जाता है। अगर कल को जल ही नहीं रहा, तो हाहाकार मच जाएगा। आज भी हम समाचार पढ़ते हैं कि एक एक बूंद के लिए लोग खूनी संघर्ष कर रहे हैं। हालत क्या यह है कि कुछ राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर आए दिन विवाद की नौबत बनी रहती है। नदी तो सबकी है। यह किसी एक राज्य की धरोहर हो ही नहीं सकती। नदी प्रकृति का मनुष्य को अनुपम उपहार है। इस पर किसी राज्य का कॉपीराइट नहीं हो सकता इसलिए हर राज्य को एक दूसरे के साथ सहयोग करके समान रूप से जल बंटवारे की कोशिश करनी चाहिए। और  राज्य की जीवनदायिनी नदी कैसे बची रहे, इसकी भी चिन्ता करनी चाहिए।

गिरीश पंकज व्यंग्यकार हैं। महत्वपूर्ण सम सामयिक विषयों पर भी निरन्तर लिखते रहते हैं।

सम्पर्क- +919425212720, girishpankaj1@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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