मध्यप्रदेश

आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यकों पर हिंसक हमले – शिवानी तनेजा 

 

  • शिवानी तनेजा 

 

एक तरफ जहाँ देश ने भाजपा सरकार को ज़बरदस्‍त जनादेश दिया है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश राज्य के गाँवों, कस्‍बों और शहरों में बीते वर्षों में बजरंग दल, शिव सेना, श्री राम सेना, कर्णी सेना जैसे नामों से चल रहे विभिन्न हिन्दूत्व समूहों के हाथों फैलायी गयी नफरत और हिंसा की जड़ें फैलती गयी हैं। इनके प्रभुत्व पर कांग्रेस सरकार द्वारा भी कोई चुनौती नहीं दी जा रही है।

ऐसी ही हिंसा की एक वारदात 22 मई को सिवनी में हुई। मॉब लिंचिंग के इस हादसे (भीड़ द्वारा की गई हिंसा) की चार सदस्‍यों के एक जांच दल, जिसमें राज कुमार सिन्हा, झरना झावेरी, किरण प्रकाश और शिवानी तनेजा शामिल थे, द्वारा जांच की गयी। वायरल हुए विडियो (जो कि प्रमुख आरोपी द्वारा भाजपा की चुनावी जीत के बाद खुद पोस्ट किया गया), ने हमें पहले ही गौ रक्षकों के हिंसक व घिनौने चेहरे और साथ ही जुड़ी दंड-मुक्ति के एहसास को दिखा दिया। इसके बावजूद, जांच दल को इस खास हादसे के पीड़ितों, और साथ ही आरोपियों के परिवारों में बेहद दर्द और दुख दिखा। वे सभी, जिनको मारा गया और मारनेवालों में से भी कई लोग वैसे समुदायों से हैं, जो हाशिये पर हैं।

तौसीफ खान, जो कि गौ-मांस की तस्करी में प्रमुख आरोपी बताया जा रहा है, 20 साल का भी नहीं है। स्थानीय लोगों और ट्रेवल एजेंसी की बुकिंग पर उनकी गाड़ियों को चलाता है। 21 मई की रात को वो अपनी फूफी के यहाँ रुका था, और सहरी के बाद घर की बस नहीं मिलने पर ऑटो में बैठ गया था ताकि समय पर अपनी बुकिंग पर पहुंच पाये। वारदात की जगह से ऑटो-ड्राइवर व ऑटो में बैठे और लोग भाग पाए, लेकिन क्योंकि यह लड़का बीच की सीट में सोया हुआ था, वो पकड़ा गया। पूरे हादसे में वो एक ही मुस्लिम पकड़ में आने पर, श्री राम सेना के सदस्यों का पूरा आक्रोश उसी पर निकला। 40 वर्षीय अंजुम जो कि पैदाइशी मुस्लिम नहीं हैं, पर मुस्लिम व्यक्ति से शादी करी थी। अभी घरेलू हिंसा के कारण, तीन बेटियों के साथ अकेले ही रहती है। आज उनकी 13 और 10 साल की दो बेटियां, जिन 4 घरों में वे काम करती थीं, वहां झाड़ू-पोछे और बर्तन धोने का काम कर रही हैं ताकि जेल से माँ के छूटने तक उनकी मासिक तनख्वाह में कटौती ना हो। दिलीप, तीसरे व्यक्ति जिनको मारा गया, एक दलित धोबी परिवार से हैं। उनकी माँ और बहन इस्त्री करके और लोगों के टिफिन बनाकर घर चलाती हैं।

22 मई  के दिन उपरोक्त लोगों के साथ क्रूरतम हिंसा करने वाले श्री राम सेना के लोगों में योगेश उइके, 19 वर्षीय आदिवासी गोंड युवा था। प्रमुख आरोपी शुभम बघेल, जिसने पूरे हादसे के लिए सबको प्रेरित किया और जो शहरभर में अपने सांप्रदायिक कारनामों के लिए बदनाम है, के घर में एक परेशान माँ और नानी उसकी चिंता में है। हालांकि इन दोनों लड़कों की मांओं ने अपने बेटों द्वारा किए गए दुर्व्‍यवहार का बचाव करने की कोशिश की। दोनों ने यह भी बोला कि सबका भगवान एक है और वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे इस रास्ते पर चलें। योगेश उइके का परिवार आदिवासी है और उन्होंने कहा कि अगर उसके शहर के दोस्त नहीं बनते, तो वो ऐसा नहीं बिगड़ता। हरेक माँ ने अपने जीवन के संघर्षों के बारे में बात करते हुए कहा कि कैसे मज़दूरी कर-करके उन्‍होंने बच्चों को पाला है और कैसे बार-बार बच्चों को किसी काम में जुड़ने के लिए प्रेरित किया है। वे नेताओं से भी बहुत गुस्सा थे कि सरकार ने आदेश दिया, तभी तो हमारे बच्चों ने ऐसा काम किया।

1991 से सिवनी ज़्यादा सांप्रदायिक हुआ है, हालांकि पहले भी यहाँ सांप्रदायिक तनाव रहे हैं। 2016 में यहाँ चार बार कर्फ्यू लगाया गया था। उसके विपरीत इस दौरान जहाँ हिन्दूत्व राजनीति ने देश के एक-एक कोने में अपनी जड़ें फ़ैलाने की कोशिश की हैं, देवास ज़िले के सोनकच्छ तहसील का पीपलरावा गाँव सामुदायिक सौहाद्र और शान्ति का प्रतीक रहा है।

2019 में हिंसा 

30 अप्रैल 2019 को होशंगाबाद ज़िले के सिवनी-मालवा तहसील के छपड़ा-गाहें पंचायत क्षेत्र में 33 वर्षीय दलित कार्यकर्त्ता, कमलेश राठोर को बजरंग दल के सदस्यों और पुलिस ने अगवाकर रातभर गालियाँ देते हुए पीटा। लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने कमलेश के ऊपर केस कर दिया है। कमलेश के साथ हुई हिंसा, और पहचाने गए अपराधियों के ऊपर केस दर्ज करने की उनकी शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। आज भी तीनों अपराधी गाँव में खुले घूम रहे हैं और कमलेश पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाये हुए हैं।

इसी साल, अगर शहर में 29 जनवरी को 34 वर्षीय महबूब और 35 वर्षीय रोदूलाल मालवीय पर गौरक्षकों के एक दल ने हमला किया। पुलिस ने मौके पर आकर उन पर गाय के ट्रांसपोर्ट का केस कर दिया। यह आरोप कि वे लोग गाय को बुचड़खाना ले जा रहे थे, झूठा है। ज़मानत मिल जाने के बावजूद, 5 फरवरी को उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून  लगाया गया। इसके एक दिन पहले ही, खंडवा ज़िले के तीन और लोगों पर रासुका की धाराएँ लागाई गयीं। म.प्र. में गौ-ट्रांसपोर्टर और मांस-व्यापारियों पर कानूनी काम करने पर भी पैसे ऐंठना और भीड़-द्वारा हिंसा आम हो गयी है। इन सभी अपराधी मसलों में पीड़ितों पर ही कार्यवाही करने की चुस्ती पुलिस में दिखती है, न कि वास्तविक अपराधियों के ऊपर।

गायत्री सोनकर, सिमरन धुर्वे, विजय झोपाटे, अनोखी और सबा खान का पांच सदस्यी जांच दल दो समुदायों के बीच हुई झड़प में एक दलित व्यक्ति की मौत के हादसे को समझने के लिए पीपलरावा गाँव गया था। 29 मई की रात, यह लड़ाई तब हुई जब किसी बाहरी गाँव से शादी की बारात इस गाँव में दुल्हन के घर जा रही थी। पीपलरावा गाँव में दलित और मुस्लिम समुदायों के लोग शान्ति और एकजुटता के साथ पीढ़ियों से रह रहे हैं। एक छोटा तनाव का मसला 1954 में हुआ था और उसके बाद कभी नहीं। शादी में स्थानीय डीजे भी मुस्लिम समुदाय का था, और शादी के आमंत्रण दोनों समुदायों के घरों में भेजे गए थे। लेकिन जब बारात मस्जिद को पार कर रही थी, जहां कि नमाज पढ़ी जा रही थी, तब बारात में आये युवाओं और मस्जिद के बाहर खड़े युवाओं के बीच झगड़ा हो गया। इस लड़ाई में, एक दलित व्यक्ति जो अपने घर से सबको शांत करने के लिए निकले थे, उनको चोट लग गयी और उनकी मौत हो गई।

दोनों समुदायों के बुज़ुर्गों और पुलिस का भी कहना है कि यह हादसा एक अचानक से हुई वारदात है। कर्फ्यू खत्म करने के लिए दोनों समुदायों के लोगों ने प्रशासन के सामने बात रखी और लोगों को दुकानें खोलने के लिए प्रेरित किया। साझी बैठकें हुई हैं और शान्ति और सामंजस्य का संदेश गाँववालों ने ही फैलाया है। बार-बार सुनने में आया कि अगर सिर्फ गाँव के लोग होते या बुज़ुर्ग नमाज में नहीं होते, तो वो इस हादसे को ऐसा मोड़ नहीं लेने देते। पड़ोसी गाँव और छोटे शहरों से बजरंग दल के लोग अभी भी पीड़ित परिवार और दलित युवाओं को उकसाने में लगे हैं।

इन सभी कहानियों में, परिवारों में अपने नज़दीकी और प्यारे बेटे, पति, पिता के गुज़र जाने पर, या जेल में बंद भाई, माँ, बेटे की स्थिति में बेहद दर्द और चलती आयी गरीबी में और ज़्यादा डूबने की परिस्थिति स्पष्ट है। हिन्दूत्व राजनीति युवाओं को बहुत क्रूर तरीकों से ताकत दे रही है। सवर्ण समाजों द्वारा दलितों पर की गई अत्याचार की वारदातें सिवनी और देवास में भरी पड़ी हैं। मुस्लिम युवा जीवन-यापन के लिए कोई भी काम के तरीके ढूंढ रहे हैं। इन सभी समुदायों के युवक कक्षा 5वीं से 10वीं के बीच में ड्राप-आउट हुए हैं।

ये ज़रूरी है कि नफरत और हिंसा की बीमारी को रोकने के लिए राज्‍य ठोस कदम उठाये। शिक्षा की ख़राब गुणवत्ता और बेरोजगारी की स्थिति में, श्री राम सेना, बजरंग दल इत्यादि में जुड़ना ताकत पाने और पैसे कमाने का एक ज़रिया नहीं हो सकता। हमारी मांग है कि गौ-हत्या या मांस की तस्करी में गिरफ्त लोगों की सामाजिक-आर्थिक पृष्‍ठभूमि को देखा जाये और लोगों को तुरंत रिहा किया जाये ताकि उनके परिवार और पीड़ित नहीं हों। हमारी मांग है कि हिन्दूत्व राजनीति में फंसे युवा नागरिकों को पहचानकर ‘पुनर्वास’ किया जाए ताकि वे और इंसानी जीवन जीयें और देश में सकारात्मक योगदान दे सकें। हमारी यह भी मांग है कि किसी भी सांप्रदायिक दंगे के पीड़ितों को उपयुक्त मुआवज़ा और नौकरी दी जाये, चाहे वे सतना की सईदा-उल-निसान हों जिनके दरजी पति की सतना में माॅब लिंचिंग की वारदात में गए साल मौत हुई, या देवास में धर्मेन्द्र शिंदे की विधवा पत्नी प्रियंका हों।

इस हिन्दूत्व राजनीति में, इंसानियत गायब होती जा रही है। जरूरत है कि सभी नागरिक और राज्य सरकार सांप्रदायिक नफरत और बढ़ते हुए ध्रुवीकरण के खिलाफ काम करें।

लेखिका बेघर बच्चों के बीच तथा महिला अधिकारों के लिए कार्य करती हैं|

सम्पर्क- +919425600382, shivani.shivanitan@gmail.com

 

 

 

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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