मुनादी

विकास गायब, गठबन्धन गैरहाजिर

  • किशन कालजयी 
आम जनता की सार्वजनिक समस्या, भ्रष्टाचार, गरीबी,बेरोजगारी भारत की  संसदीय राजनीति  के मुद्दे बनते रहे  हैं और इन मुद्दों पर हार जीत होती रही है|  भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू ने नारा दिया था ‘आराम हराम है’,लाल बहादुर शास्त्री का दिया हुआ नारा ‘जय जवान जय किसान’ आज भी देशवासियों की जुबान पर है| इन्दिरा गाँधी का नारा ‘गरीबी हटाओ’ भी खूब लोकप्रिय हुआ|1974 के जयप्रकाश आन्दोलन में ‘लोकतन्त्र बनाम तानाशाही’ का मुद्दा छाया रहा और अन्ततः बड़े पैमाने पर सत्ता परिवर्तन हुआ| बोफोर्स सौदे में दलाली के मुद्दे पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गाँधी को घेरा और खुद चुनाव जीतकर प्रधानमन्त्री बने|
अभी जब सत्रहवीं लोक सभा के लिए प्रचार अभियान जोर पकड़ रहा है,इन पंक्तियों के लिखे जाने के वक्त कॉंग्रेस का घोषणा पत्र जारी हुआ है| कॉंग्रेस का यह प्रस्ताव कि रेलवे की तरह खेती किसानी का भी अलग से बजट हो,एक स्वागत योग्य संकल्प है, लेकिन गरीबों को हर वर्ष 72 हजार रुपये देने की घोषणा कुछ अगम्भीर और तात्कालिक चुनावी लाभ के लिए लगती है| गरीबों को खैरात बाँटने के बजाय गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों और नीतियों की घोषणा होती तो बेहतर होता| इसतरह की लोक लुभावन चुनावी घोषणाओं के लिए सिर्फ राहुल गाँधी कटघरे में नहीं हैं, 2014 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने नारों और वादों के निवेश से ही  जन मानस को जीता था| 2014 में चुनावी वादा करते समय मोदी  यदि इस बात का ख्याल करते कि इन  वादों को पूरा भी करना होगा तो शायद वे कुछ सहमते| दरअसल उनकी मंशा सत्ता प्राप्ति की थी और इसमें वे अच्छी तरह सफल हुए|
जीएसटी और नोटबन्दी मोदी सरकार के  प्रमुख कार्यक्रम थे| नोटबन्दी से कितना लाभ हुआ यह तो विवाद का विषय है,जीएसटी के बारे में कहा जा रहा है कि इससे कर चोरी पर नियन्त्रण हुआ है| सरकारी खजाने को भले लाभ हुआ हो, लेकिन जीएसटी के नाम पर आम जनता कठिन मंहगाई को झेलने के लिए अभिशप्त है|उज्ज्वला योजना ने जरूर गरीबों के चूल्हे जलाये|
भाजपा की ओर से  2014 का मुख्य चुनावी एजेण्डा विकास था, आश्चर्यजनक रूप से 2019 की  चुनावी चर्चे से ‘विकास’ अनुपस्थित हो गया  और राष्ट्रवाद तथा  पकिस्तान का मुद्दा प्रमुख हो गया| यह कहना जरूरी है कि देश,समय और जनता की जरूरत के हिसाब से राजनीतिक मुद्दे नहीं बनते, वोट हासिल करने की मंशा और सत्ता में पहुँचने की आतुर आकांक्षा से मुद्दे बनते हैं| इन मामलों में कमोबेश सभी राजनीतिक दल एक ही संस्कार के हैं| विपक्षी दलों को देश के मुद्दे से सचमुच प्यार होता तो वे भाजपा के खिलाफ एकजुट होते, छोटे छोटे व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण आपस में लड़ झगड़ कर बिखरते नहीं|
पिछले पाँच वर्षों में शिक्षा,चिकित्सा,महंगाई और बेरोजगारी के मामले में बदहाली बढ़ी है|  पिछले वर्ष जुलाई में संसद में दिये गये जवाब के अनुसार देश के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में 10.1 लाख,पुलिस में 5.4 लाख,रेलवे में 24 लाख, आंगनवाड़ी में 2.2 लाख,स्वास्थ्य केन्द्रों में 1.5 लाख,सैन्य बल में 62084,अर्द्धसैनिक बल में 61509,डाक विभाग में 54263,एम्स में 21740, अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थानों में 12020 और न्यायालयों में 5853 रिक्तियाँ हैं| सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इण्डियन इकोनॉमी  के महेश व्यास ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है कि 6 जनवरी 2019 तक बेरोज़गारी की दर 7.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.8 प्रतिशत हो गयी है. उनके अनुसार  दिसम्बर 2017 में जितने लोगों के पास काम था, उसमें से एक करोड़ दस लाख लोग दिसम्बर 2018 तक बेरोज़गार हो गये| नये  लोगों को काम नहीं मिला और जिनके पास काम था, उनकी भी नौकरी चली गयी| हाल ही में केन्द्र सरकार द्वारा पेश अन्तरिम बजट में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मन्त्रालय के बजट में पिछले वर्ष की तुलना में 2088 करोड़ रूपये की  कमी हुई है,जबकि आम तौर पर हर वर्ष बजट में वृद्धि होती है| सामाजिक न्याय की यह उपेक्षा सरकार के नजरिये को दर्शाता है|
नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में भारत दुर्दशा के लिए बार बार जवाहर लाल नेहरू को कोसा जाता रहा है,जिनकी मृत्यु 55 वर्ष पहले हो गयी थी| विभिन्न विभागों में जो इतनी रिक्तियाँ हैं,उसे भरने में दिवंगत नेहरू क्या बाधा  पहुँचा सकते हैं? जवाहर लाल नेहरू को गुलामी के ठीक बाद का एक बदहाल देश मिला था,तब उन्होंने अपने कार्यकाल में सेल,भेल,एम्स,भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र  और आईआईएम जैसे संस्थान खड़े किये| लफ्फाजी को यदि छोड़ दें तो पिछले पाँच वर्ष में 2989 करोड़ रुपये की लागत से बनी 192 मीटर ऊँची   सरदार वल्लभ भाई पटेल की विशालकाय  प्रतिमा के अलावा देखने दिखाने के लायक मोदी सरकार के पास  क्या है?
प्रत्येक वर्ष दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने के प्रलोभन से आप देश के युवाओं को रिझाकर शासन में आ जाएँ और नौकरी देने की बात हो तो यह कहकर टाल दें कि चुनाव में तो बढ़ चढ़ कर वादे किये ही जाते हैं| यह धोखाधड़ी संसदीय राजनीति की अश्लीलता  और अनैतिकता तक ही सीमित  नहीं है, यह एक तरह का राजनीतिक अपराध है| कोई भी राजनीतिक पार्टी हो, इसतरह के अपराध पर चुनाव आयोग को संज्ञान लेना चाहिए और चुनाव आयोग संज्ञान नहीं ले तो फिर इसी सच को साकार किया जाए कि यह देश नेताओं का नहीं मतदाताओं का ही है|
लेखक ‘सबलोग’ पत्रिका के संपादक हैं|
सम्पर्क- +918340436365, kishankaljayee@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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