आवरण कथा

वैदिक साहित्य और तृतीयलिंगी  – विजेन्द्र प्रताप सिंह

 

  • विजेन्द्र प्रताप सिंह

 

थर्ड जेंडर समुदाय की अवस्थिति प्राचीन काल से ही भारतीय समाज रही किन्तु दुर्भाग्यवश थर्ड जेंडर समुदाय को हाशियाकृत जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा। विशेष शारीरिक संरचना, व्यवहार तथा मनोविज्ञान के अनुसार थर्ड जेंडर पर वैदिक साहित्य में उनकी उत्पत्ति के कारण, विविध प्रकार, व्यवहार, समस्याएँ तथा व्यवसाय आदि पर विचार किया गया है। विश्व स्तर पर वैदिक साहित्य प्राचीनतम ज्ञान स्रोत के रूप में जाना जाता है। इनकी प्राचीनता लगभग 1500 बीसी से 500 बीसी मानी जाती है। वैदिक साहित्य से प्रभावित भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता एवं विविधता ने सम्पूर्ण विश्व के विद्वानों को सदा से ही आकर्षित किया है। अन्य विशेषताओं के अतिरिक्त वैदिक साहित्य की एक और विशेषता है और वह है इसकी थर्ड जेंडर जैसे परित्यक्त, उपेक्षित समाज की ओर मानवीय दृष्टि। वेदों में थर्ड जेंडर समुदाय से सम्बन्धित नैतिक, सौंदर्यात्मक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक इत्यादि पक्षों पर पर्याप्त रूप से दृष्टिपात किया गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वेद आदि चारों वैदिक ग्रंथों में विभिन्न प्रकरणों के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिपादन किया गया। प्रत्येक वेद पर आधारित कुछ बृहदाकार तो कुछ लघु आकार ग्रंथों की रचना परवर्ती कालों में हुई यथा-संहिताएँ, ब्राह्मण, अरण्यक तथा उपनिषद। अरण्यक एवं उपनिषदों को संहिताओं/ब्राह्मण का भाग माना जाता है। वेदांगों में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद, ज्योतिष आदि संबंधी ज्ञान प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वेद के उपवेद भी हैं। वैदिक साहित्य में बहुत ही पारदर्शी रूप में मानव जीवविज्ञान पर प्रकाश डाला गया है।

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वैदिक साहित्य में मानव लिंग व्यवस्था को प्रकृति के अनुरूप तीन भागों में विभाजित किया गया है, प्रथम पुरूष द्वितीय स्त्री तथा तीसरा तृतीय प्रकृति। (स्वेतवस्त्र उपनिषद, गल्वा 108) तृतीय प्रकृति के लोगों को व्यापक रूप में नपुंसक लिंग के रूप में नामित किया गया। नपुंसक पुनः पांच उप भेदों में नामित किए गए-

1.बच्चे 2.बृद्ध 3.नपुंसक 4.अविवाहित 5.तृतीय प्रकृति। इन सभी को वैदिक परिभाषाओं के अनुसार नपुसंक माना गया तथा संरक्षित माना गया और माना गया कि इन्हें भाग्योदय होता है।

 

ऋग्वेद में किन्नर:-

ऋग्वेद में थर्ड जेंडर का उल्लेख मिलता है जब इंद्र स्वयं को स्त्री रूप में परिवर्तित कर लेते हैं-(ऋग्वेद 1.51.13)

सत्पथ ब्राह्मण में यह सिद्ध किया गया है कि इंद्र वृषणव की पत्नी बने। (शतपथ ब्राह्मणः3.3.4.18)

ऋग्वेद में थर्ड जेंडर से सम्बन्धित एक और कथा मिलती है। वह यह है कि प्रायोगि के पुत्र ईश्वर द्वारा शापित होने के बाद स्त्री बन जाता है। (ऋग्वेद 8.33.19)

सूक्त -10 में भी नपुंसकतावश नियोग की अनुमति का उल्लेख मिलता है। यह सूक्त यम-यमी अर्थात् पति-पत्नी का संवाद है। पति नपुंसक होने की अवस्था में पत्नी को नियोग लिए आज्ञा देता है।

ब्राह्मण ग्रन्थ:-

वेदों के पश्चात् ब्राह्मण ग्रंथों का प्रचलन भारत में रहा। आर्यों के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ यज्ञों एवं कर्मकांड़ों में वृद्धि होती गई और इनका विधान अत्यंत जटिल होता गया। यज्ञों तथा उनसे सम्बन्धित विधान एवं प्रक्रियाओं को समझने, समझाने तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए उस ज्ञान को संरक्षित रखने की दृष्टि से वेदों पर आधारित ब्राह्मण ग्रंथों की रचना हुई। प्रत्येक वेद की शाखा के अनुसार भिन्न-भिन्न ब्राह्मण ग्रन्थ रचे गये। ऋग्वेद के दो -ऐतरेय और कौषीतकि भेद है। ऐतरेय विशेष प्रसिद्ध है। इसमें 40 तथा कौषीतकि में 30 अध्याय हैं। सामवेद से सम्बन्धित कई ब्राह्मण पुस्तकें रची गई परंतु सर्वाधिक प्रसिद्धि प्राप्त की ताण्डन्य ने, जिसमें 2 अध्याय हैं। इसे पंचविश के रूप में भी जाना जाता है। गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद का ग्रन्थ है। शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित ब्राह्मण ग्रन्थ है शतपथ ब्राह्मण। शतपथ ब्राह्मण (7-5-2-32) में अश्वमुखी मानव शरीर वाले, मानवसार में गरुढ़मुखी, मानव शरीरी और पशुपति, जबकि कुछेक ग्रंथों में मत्स्य धड़ में महिलामुख का वर्णन है।

किरातार्जुनीय:-

महाकवि भारवि ने अपने ग्रन्थ किरातार्जुनीय के हिमालय वर्णन खंड (पांचवां सर्ग, श्लोक 17) में किन्नर, गन्धर्व, यक्ष तथा अप्सराओं आदि देव-योनियों के किन्नर देश में निवास होने का वर्णन किया है। वायु पुराण में महानील पर्वत पर किन्नरों का निवास बताया गया है।

 

मत्स्यपुराण एवं वायुपुराणः-

मत्स्यपुराण में किन्नरों का निवास हिम्मवाण पर्वत बताया गया है। डाॅ.कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी ने हिमाचल प्रदेश के एक क्षेत्र में किन्नरों का निवास बताया। महाभारत के नायक अर्जुन द्वारा धवलगिरी को लांघ कर पुरुष देश जहाँ किन्नरों का वास था, पर विजय प्राप्त करने उल्लेख मिलता है। पुराणों में किन्नर देवी गायक कष्यप की संतान और हिमालयवासी बताए गए। वायुपुराण के अनुसार किन्नर अश्वमुखों के पुत्र थे। उनके अनेक गण थे और वे गायन और नृत्य में पारंगत थे। किन्नौर के गेजेटियर में भी किन्नर का विस्तार से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उल्लेख किया गया है।

मनुस्मृति-

हिजड़ों से सम्बन्धित विवरण मनुस्मृति में भी प्राप्त होता है। दैत्यदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। सुपर्ण किन्नराणां च स्मृता बर्हिषदोत्रिजाः॥3.196॥ अर्थात अत्रि के पुत्र बर्हिषद दैत्य, दानव, यक्ष, गंदर्भ, नाग, राक्षस, सुपर्ण और किन्नरों के पितर हैं। ;मनु-स्मृति-तृतीयोध्याय)

आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की भी उत्पत्ति मानी गई है।

कामसूत्रः-

कामसूत्र’ चैथी शताब्दी का ग्रन्थ है। ‘कामसूत्र’ में तृतीय प्रकृति का भी पर्याप्त मात्रा में उल्लेख है। इस ग्रन्थ  में किन्नरों को ‘तृतीय प्राकृति’ का नाम दिया गया है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार इन्हें न तो पुरुष और न ही पूर्ण नारी का स्थान दिया गया है। उनके व्यवसाय भी अलग रहे, जैसे मालिश करना, केश सवारना, घरेलू नौकर, फूल विक्रेता, राज परिवारों में रानियों की सुरक्षा इत्यादि। कामसूत्र के पांचवे अध्याय के पृष्ठ सं. 173 पर हिजड़ों के संबंध में किसी एक आचार्य का मत व्यक्त किया जाता है-‘भिन्नत्वातृतीया प्रकृतिः पश्चिमीत्येके । तृतीया प्रकृतिर्नपुंसकः स्त्रीत्वपुंस्त्वाभावादिभ्द्यते।।27।।

निष्कर्षतः निवेदन यही किया जा सकता है कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के विपरीत वैदिक काल में थर्ड जेंडर समुदाय को न तो समाज से बहिस्कृत किया जाता था और न ही दंडित किया जाता था। उन्हें समाज में गृह स्थापना, विवाहित रूप में एक साथ रहना तथा सामाजिक व्यवहारों में सहभागिता के साथ जीवन यापन करने का अधिकार अन्य मानवों की तरह ही प्राप्त था। प्राचीन काल में उनकी शारीरिक संरचना से अधिक महत्व उनकी कला एवं कार्य निपुणता को दिया जाता था, वे नृत्य, गायन, अभिनय, नाई, केशसज्जा, मालिस तथा गृह सेवक आदि के क्षेत्र में कार्य करते हुए समाज के अंग के रूप में अपना योगदान देते थे। उन्हें सामाजिक क्रियाकलापों, विवाह, जन्म तथा अन्य कार्यक्रमों में सहभागिता की पूरी अनुमति थी और उनकी उपस्थिति को शुभ माना जाता था।

लेखक रंगकर्मी और प्राध्यापक हैं|

सम्पर्क- +918218405797, vickysingh4675@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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