व्यंग्य

चुनाव का परम ज्ञान – नूपुर अशोक

 

  • नूपुर अशोक

 

लोग सोचते हैं कि चुनाव एक राजनीतिक प्रक्रिया है| पर वास्तव में यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है| चुनाव आपको अहसास दिलाता है कि यह विश्व नश्वर है| जो कल था वह आज नहीं हैं, जो आज है वह कल नहीं रहेगा| सारे सम्बन्ध मायावी हैं| जो माया कल तक आपकी थी, वह आज किसी और की हो सकती है| जो किसी और का था वह ‘आप’ का हो सकता है| जिसे तुमने ममता समझा था, वह क्रूर भी हो सकती है| सब आँखों का भ्रम है, नेपथ्य में तो बस एक ही रंग है|

तुम क्या लेकर आये थे, वोटर स्लिप ही न, और क्या लेकर जाओगे, सेल्फी ही न? तो बाकी किसका मायामोह है? इस एक चुनाव को लेकर क्यों इतना व्याकुल हो रहे हो? अभी तक कितनी ही बार जीवन ने तुम्हें चुनाव का मौक़ा दिया, तो तुमने क्या उखाड़ लिया? माता-पिता तुमने चुने थे? नहीं न? फिर भी अगर कोई तुम्हारा सच्चा हितैषी है तो वही हैं| भाई-बहन तुमने चुने थे? नहीं न? फिर भी रोने के लिए उन्हीं का कन्धा मिलता है हमेशा| और कई साल चक्कर लगा कर, फीस के पैसों की आइसक्रीम खिला कर, दस रूपए की मकई को मल्टीप्लेक्स में पाँच सौ में चबा कर, वैलेंटाइन डे पर सूखे सड़े गुलाब पर सौ रूपए लुटा कर जिस कन्या को फाइनली हासिल किया उसके मोबाईल का पासवर्ड तक तुम्हें न तो मालूम है और न ही पूछने की हिम्मत है| ये है तुम्हारे चुनाव का नतीज़ा|

तो अभी जो लम्बी-लम्बी बहसें कर रहे हो, जिन लोगों के पक्ष और विपक्ष में तुम प्रत्यक्ष हुए जा रहे हो, उस के कारण तुम्हारी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट घटती जा रही है| जीवन के लक्ष्य से भटको मत| ये माया-ममता सब क्षणभंगुर हैं| कल स्मृति भी रहेगी या नहीं, कौन बता सकता है? कहते थे समोसे में आलू हरदम रहेगा, पता नहीं अब क्या कहें| पञ्च-तत्वों का बना यह नर जिसने पाँच साल राज किया, उसे भी नहीं पता कल क्या होगा| कहने को तो कोई भी कुछ भी कह ले, लेकिन कब कौन सा ग्रह किस ग्रह को लील ले यह किसने देखा है|

इस ग्रह पर ही बहुत सारे प्रभु हैं जिनके इशारों पर यह विश्व चलायमान है| किस की मति कब फिर जायेगी, किम जानति? कौन कब रूस जाएगा, किसे पता? कब कौन सा ट्रम्प कार्ड  चलेगा, ये कौन जानता है? किसके मन में क्या है, ये पाक इरादे किसे मालूम| अपन तो बस भजन करो – नमो नमो|

तुम तुच्छ प्राणी हो, अपनी सम्प्रभुता के स्वप्न मत देखो| ईश्वर भजन करो – नमो–नमो| अच्छे दिन ज़रूर आयेंगे| रुष्ट क्यों होते हो, पहले भी तो आये थे| कितने अच्छे दिन आये तुम्हें पता ही नहीं चला| इतने सारे भक्ति चैनलों पर आसीन धर्मगुरु जो कहते-कहते थक गए, शहर-शहर घूम कर चाट-पकौड़ी के ठेलों के साथ भक्ति गंगा बहाने वाले महात्मा कह-कह कर थक गए – यह धन-दौलत सब व्यर्थ है, लेकिन तुम्हें कहाँ समझ में आया?

वह तो जब अच्छे दिन आये और ‘मित्रों’ को सम्बोधित किया गया तब जा कर एक झटके में तुम्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हुई| तब जाकर तुम्हें पता चला कि जो सारे नोट तकिये में छुपा–छुपा कर रखे थे, जिन्हें प्रेम से गुल्लक में डालते रहते थे वे मात्र कागज़ के टुकड़े हैं| एक झटके में तुम्हें पता चल गया – यह धन-दौलत सब भ्रम है| तुम्हें लगता है कि ये है, पर ये नहीं है| यही परम सत्य है|

तुम्हें लगता है कि इस विश्व को तुम चलाते हो, पर चलाने वाला तुम्हें चला रहा है| इस ज्ञान को भूलो मत| जो तुम सुन रहे हो, सिर्फ वही सत्य नहीं है| जो तुमने सुना नहीं, जो तुमने देखा नहीं, वह तुम्हें पता ही नहीं| जो तुम्हें मिला है, तुमने सोचा तुम्हें दिया गया है, पर यह तुम ने ही कभी किसी को किसी रूप में दिया था, यह तुम भूल चुके हो| तुम अल्पबुद्धि प्राणी अपनी अल्प चतुराई पर व्यर्थ ही आनन्दित होते रहते हो| तुम्हें कहा था – मत देना, तुम मत दे आये| अब भुगतो|

ये जो प्रभुगण मंद स्मित सहित, विनम्र मुखमुद्रा सहित, तुम्हारे द्वार पर दर्शन देते हैं – “माँगो वत्स क्या मांगते हो, माँगो, बस हमारा चिह्न याद रखना”, तुम सोचते हो ये तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो कर आये हैं, यह तुम्हारा भ्रम है| ये स्वेच्छा से आये हैं, ये स्व-प्रेरित हो कर आये हैं| तुम्हारी तुच्छ औकात सड़क का एक गड्ढा नहीं भरवा सकती, तुम इन्हें क्या प्रसन्न करने का स्वप्न देखते हो| ये तो चिर प्रसन्न हैं| तुम अपनी चिन्ता करो|

वैसे मेरी मानो तो अपनी भी चिन्ता करना छोड़ दो| तुलसीदास जी कब का कह गए – कोऊ नृप होय हमहुं का हानी, चेरी छाडि अब होब कि रानी? तुम जहाँ थे, वहीं रहोगे| जैसे थे, वैसे ही रहोगे| हाँ, अपना काम अवश्य करना – कर्मण्य हि वाधिकारस्ते  – यही एक तुम्हारा अधिकार है, कर्त्तव्य है, उत्तरदायित्व है, लेकिन किसी फल का लोभ मत रखना – मा फलेषु कदाचन| जो होना है, वह होगा, जिसे आना है, वह आयेगा| तुम जहाँ हो, वहीं रहोगे| यह मर्त्य लोक है| तुम्हारा जन्म मरने के लिए ही हुआ है| यही परम सत्य है|

लेखिका कवयित्री, चित्रकार एवं सॉफ्ट स्किल ट्रेनर हैं|

सम्पर्क- +919831171151, dr.nupurjaiswal@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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