मुद्दा

ट्यूशन का टेंशन – देवेन्द्रराज सुथार

 

  • देवेन्द्रराज सुथार

 

हाल ही में दुनिया भर में शिक्षा से जुड़े एक सर्वे में यह जानकारी निकलकर सामने आई कि भारत के बच्चे दुनिया में सबसे ज्यादा ट्यूशन पढ़ते हैं। विशेषकर गणित व अंग्रेजी जैसे विषयों को लेकर बच्चे ट्यूशन का सहारा लेते हैं। सर्वे के मुताबिक भारत में 74 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं व 72 प्रतिशत बच्चे एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में भाग लेना पसंद करते हैं। मगर उनमें 3 प्रतिशत बच्चे ही ऐसे हैं जो हफ्ते में 6 घंटे से अधिक खेल पाते हैं। 36.7 प्रतिशत बच्चे हफ्ते में मुश्किल से कुल 1 घंटा खेल पाते हैं। जबकि 26.1 बच्चे स्कूल में कोई गेम नहीं खेलते। भारत में शिक्षा की स्थिति पर एनएसएसओ ने एक सर्वे वर्ष 2014 में 66 हजार घरों में किया। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी ट्यूशन या कोचिंग का सहारा लेने वालों में 4.1 करोड़ छात्र हैं और 3 करोड़ छात्राएँ। रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार की कुल आय का 11 से 12 फीसदी निजी ट्यूशन पर खर्च होता है। कुछ मामलों में यह रकम 25 फीसदी तक है।

विगत वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में जिस तेज गति से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है उससे अधिक गति से ट्यूशन और कोचिंग संस्थाओं ने अपना विस्तार किया हैं। निश्चित ही बढ़ती ट्यूशन की वृत्ति के पीछे हमारी कमजोर शिक्षा प्रणाली और संस्थाएँ, दोनों ही जिम्मेदार हैं। हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली में न तो समग्र विकासोन्मुख गुण व मूल्य हैं और न ही सत्यम, शिवम और सुन्दरम की मूल आस्था। आज की शिक्षण संस्थाएँ बच्चों की प्रतिभा व मौलिक सोच को विकसित करने की बजाय उन्हें रटन विद्या के धुरन्धर बनाने के लिए कार्यरत हैं। देश के सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं का हाल किसी से छिपा नहीं हैं। उनकी शिक्षा व गुणवत्ता के स्तर से सब वाकिफ हैं। इधर निजी शैक्षणिक संस्थाओं में बढ़ते छात्र संख्याबल के कारण शिक्षक द्वारा प्रत्येक छात्र पर एक सामान रूप से ध्यान देना संभव नहीं है। गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों के लिए निरन्तर अभ्यास और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। इस दौरान शिक्षक की भूमिका बढ़ जाती है। लेकिन शिक्षक का पर्याप्त मार्गदर्शन प्रत्येक छात्र को नहीं मिल पाता। इस कारण विवश होकर छात्रों को ट्यूशन करना पड़ता है।

इसके अलावा आज के अभिभावकों की आकांक्षाओं का अन्त ही नहीं हैं। वे अपने बच्चों को बेस्ट से बेस्ट स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजने के बाद भी आश्वस्त नहीं हैं। इन्हें डर है कि उनका बच्चा कई अनुत्तीर्ण न हो जाएँ और उनके सुनहरे सपनों पर पानी न फेर जाएँ। अभिभावकों की इसी विकृत मानसिकता के कारण बच्चों को स्कूल से घर आते ही ट्यूशन के टेंशन से दो चार होना पड़ रहा है। समाज में ट्यूशन एक फैशन बन गया है। यह कहे कि आज के इस प्रतिस्पर्धा मूलक समाज में ट्यूशन एक आर्थिक सिंबल बन गया है। अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति कितने सजग और जागरूक हैं इसका फैसला बच्चों का ट्यूशन करने लगा।

 

आज के माहौल में ट्यूशन अपवाद नहीं अनिवार्यता बन चुका है। ये सही है कि बच्चों का ट्यूशन कोई गुनाह नहीं है और आज यह समय की माँग भी हो सकती है। लेकिन यदि ट्यूशन का टेंशन बच्चों के खेलने और कूदने पर पाबन्दी लगाएँ तो समझना होगा कि बचपन खतरे में है। बालमन पर अधिक दबाव डालने से उनकी नैसर्गिक प्रतिभा का हनन होने के साथ ही उनका विकास बाधित हो सकता है। आवश्यकता है कि बच्चों को ट्यूशन की बैसाखियों से आजाद कर स्कूली शिक्षा में सुधार लाने हेतु प्रत्यन्न किये जाएँ।

लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार है|

सम्पर्क- +91810717719, devendrakavi1@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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