एतिहासिक

पूना पैक्ट की सच्चाई

 

  • योगेन्द्र

 

गाँधी जी यरवडा जेल में दलितों को दिये गये पृथक निर्वाचन अधिकार के खिलाफ 20 सितम्बर 1932 से आमरण अनशन पर बैठे थे। 22 सितम्बर को डॉ. अम्बेडकर यरवडा जेल पहुंचे और गाँधी जी से विचार विमर्श किया। इस विमर्श का ब्यौरा गाँधी वाड्मय-51के परिशिष्ट ,पृ. 481 पर दिया हुआ है। महात्मा गाँधी और डॉ. अम्बेडकर ने एक दूसरे के बारे में जो कहा, वह आज भी प्रेरणा देता है। डॉ. अम्बेडकर कहते हैं-‘आपके साथ मेरा एक झगड़ा है, आप केवल हमारे लिए नहीं, बल्कि तथाकथित राष्ट्रीय हितों के लिए काम करते हैं। यदि आप केवल हमारे लिए काम करें, तो आप हमारे चेहेते नायक बन जायेंगे।’ गाँधी ने कहा-‘ जब आप मेरे प्रति किसी अपमानजनक या क्रोधपूर्ण शब्द का प्रयोग करते हैं तो मैं अपने से यही कहता हूँ कि तू इसी लायक है। यदि आप मेरे मुंह पर थूकें तो भी मैं क्रोध नहीं करूंगा। ईश्वर को साक्षी मान कर मैं  यह कहता हूँ। मैं यह जानता हूँ कि आपको जीवन में बहुत कटु अनुभव हुए हैं।’ डॉ. अम्बेडकर ने अस्पृश्य समाज की पीड़ा को भोगा था और गाँधी अस्पृश्य समाज का न होकर भी उस पीड़ा को समझते थे। दोनों चाहते थे कि इससे मुक्ति मिले। गोलमेज कांफ्रेस में डॉ. अम्बेडकर की मांग स्वीकारी गयी। दलित समाज को पृथक निर्वाचन यानी अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया गया।

गाँधी को लगा कि हिन्दू समाज इससे बिखर जायेगा और दलितों को भी बहुत लाभ नहीं होगा। डॉ. अम्बेडकर से बातचीत  के क्रम में गाँधी कहते हैं-‘ आप तो जन्म से अस्पृश्य हैं, किन्तु मैं स्वेच्छा से अस्पृश्य बना हूँ। और इस जाति में नवागन्तुक के नाते इस जाति के हित की बात इस जाति के पुराने लोगों की अपेक्षा मुझे ज्यादा महसूस होती है।’ गाँधी ने आगे कहा-‘ मैं चाहता हूँ कि पूरा अस्पृश्य समाज एक स्वर से सनातनियों के विरूद्ध विद्रोह करे।’ गाँधी स्पृश्य और अस्पृश्य समाज के बीच की दूरी को मिटाना चाहते थे। उन्हें लगता था कि अलगाव से दुश्मनी और भी बढेगी और हिन्दू समाज अशांत हो जायेगा। उन्होंने अपने जीवन की एक निजी घटना का जिक्र करते हुए कहा-‘बारह वर्ष की कोमल आयु में मैंने प्रजातंत्र का पाठ पढा था। अपने घर के भंगी को अस्पृश्य मानने के कारण मैंने अपनी मां के साथ झगड़ा किया था। उस दिन मैंने भंगी को ईश्वर के रूप में अवतार लेते हुए देखा।’ गाँधी ने डॉ. अम्बेडकर से कहा कि आप ईमानदारी से अस्पृश्यों के लिए जमे रहें। आप मेरी जिन्दगी की चिन्ता न करें। गाँधी ने अपनी सदिच्छा जाहिर करते हुए कहा-‘आज जिन्हें अस्पृश्य माना जाता है उन्हें भी हिन्दुस्तान का वाइसराय बनने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। हिन्दुस्तान पहुंचने के बाद मैंने जो पहला राजनीतिक भाषण दिया था उसमें मैंने कहा था कि मैं तो किसी भंगी का कांग्रेस अध्यक्ष बनाना चाहूँगा।’

पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डॉनाल्ड

20 सितम्बर 1932 को आमरण अनशन पर बैठने से पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डॉनाल्ड को 9 सितम्बर को पत्र लिखा जिसमें कहा-‘दलित वर्गों को दोहरा मताधिकार मिल जाने से उनका या आम हिन्दू समाज का छिन्न भिन्न होना रोका नहीं जा सकता। दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की स्थापना के रूप में मुझे हिन्दू समाज को ऐसा जहर दिया जा रहा दिखाई दे रहा है, जो उसका तो सर्वनाश करनेवाला है ही, साथ ही दलित वर्गों को भी कोई लाभ पहुंचानेवाला नहीं है।’ गाँधी ने आगे लिखा-‘मैं तो दलित वर्गों को अनुपात से ज्यादा प्रतिनिधित्व दिये जाने के भी विरूद्ध नहीं होऊंगा। मेरा विरोध तो इस बात के खिलाफ है कि जबतक वे हिन्दू समाज में रहना चाहते हैं, तबतक उन्हें सीमित रूप में भी हिन्दू समाज से अलग करने की बात कानून से नहीं होनी चाहिए।’ (वही,पृ. 34) लेकिन वे माने नहीं। गाँधी भी अपने निर्णय पर अड़े रहे। यों लोगों ने समझाया, लेकिन गाँधी जी का कहना था कि मैंने 18 अगस्त 1932 को प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनॉल्ड को अनशन के बारे में साफ साफ लिख दिया था कि यदि फैसले के ऊपर दिये गये सुझावों के अनुसार बदला नहीं गया तो मेरा प्रस्तावित अनशन आगामी 20 सितम्बर को दोपहर से आरम्भ हो जायेगा। इसलिए अनशन की तिथि बढायी नहीं जा सकती। 16 सितम्बर 1932 को गाँधी जी ने समाचार पत्रों में अनशन से संबंधित वक्तव्य दिया -‘ जो उपवास करने का विचार मैंने किया है, वह केवल लोगों की भावना को प्रभावित करने के लिए नहीं किया है। उपवास के द्वारा मैं अपना प्रभाव विशुद्ध न्याय के पक्ष में डालना चाहता हूँ। इसलिए मेरी जान बचाने के लिए अनुचित जल्दबाजी या अतिशय चिन्ता करने की जरूरत नहीं है।’ आगे उन्होंने कहा – सवर्ण हिन्दुओं तथा विरोधी दलित वर्गीय नेताओं के बीच कोई कृत्रिम समझौता होने से काम नहीं चलेगा। यदि आम हिन्दुओं का मन अब भी अस्पृश्यता समूल नष्ट कर देने को तैयार न हो तो उसे मुझको तो तनिक भी हिचकिचाहट के बिना बलिदान कर देना चाहिए।’ गाँधी भारत आने के बाद से ही अस्पृश्यता के खिलाफ काम कर रहे थे और दलित समाज पर हो रहे जुल्म को समझ रहे थे। उन्होंने प्रेस के समक्ष आश्चर्य जताया-‘ आश्चर्य की बात यह है कि इतने पर भी तथाकथित अस्पृश्य लोग हिन्दू समाज से अलग नहीं हुए हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग सम्मिलित निर्वाचन मंडल के विरूद्ध हैं, उनके साथ कोई भी जोर जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए। उनके तीव्र विरोध को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। मुझ पर वे अविश्वास कर सकते हैं, क्योंकि जिस सवर्ण समाज का मैं हूँ, उसने लगातार उन पर जुल्म किया है।

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20 सितम्बर 1932 को गाँधी जी ने 30 पत्र लिखे। पहला पत्र गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को लिखा। उसमें गुरूदेव से  आशीर्वाद के लिए निवेदन किया- ‘दोपहर को मुझे अग्नि द्वार में प्रवेश करना है। इस प्रयास को यदि आप अपना आशीर्वाद दे सकते हों तो मुझे चाहिए।’ फिर उन्होंने लिखा कि आप सच्चे और स्पष्टवादी मित्र रहे हैं और अपने विचार साफ साफ कहते आये हैं। आपका ह्रदय मेरे इस कार्य की निंदा करता हो तो मेरे लिए वह आलोचना अमूल्य होगी। यदि मुझे अपनी भूल  का पता चल जाये तो मैं इतना अभिमानी नहीं हूँ कि उसे खुलेआम स्वीकार न कर सकूं, फिर चाहे उस स्वीकृति का मुझे कितना ही मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। 30 पत्रों में वी एस श्रीनिवास शास्त्री, मीरा बहन, होरेस जी अलेक्जैंडर, अगाथा हैरिसन, महमूद जी अल्ली जी, आशुतोष चौधरी, डॉ. विधान चंद्र राय, रमणीक लाल देसाई, कृष्णदास, कालेलकर, नारणदास गाँधी आदि के पत्र शामिल हैं। नारणदास गाँधी के पत्र में अन्य बातों के अलावे गाँधी जी ने लिखा है – दोपहर को अनशन प्रारम्भ होते समय रेहाना बहन वाला यह भजन गाया गया -उठ जाग मुसाफिर भोर भई/अब रैन कहाँ जो सोवत है/जो सोवत है वह खोवत है/ जो जागत है सो पावत है। 20 सितम्बर को नौ महीने में पहली बार शाम को पत्रकारों को गाँधी जी से मिलने की इजाजत दी गयी। गाँधी ने पत्रकारों को अनशन के ध्येय को एक बार फिर दुहराया और कहा-‘ मैं जन्म से स्पृश्य हूँ, पर स्वेच्छा से अस्पृश्य हूँ। और मेरी कोशिश अस्पृश्यों में भी ऊपर की दस जातियों का प्रतिनिधि बनने की नहीं रही है-अस्पृश्यों के लिए शर्म की बात है कि उनमें भी जातियाँ और वर्ग हैं-मेरी महत्वाकांक्षा तो यथासंभव अस्पृश्यों के सबसे निचले स्तर का, उनका प्रतिनिधि बनने की रही है जिन्हें अदर्शनीय कहा जाता है जिन्हें पास नहीं आने दिया जाता। मैं तो उनके साथ उन्हीं में से एक होकर रहना चाहता हूँ।’ फिर उन्होंने अपना संकल्प दुहराया- ‘अपने जीवन को मैं कोई महत्व नहीं देता। हिन्दुओं ने अपने ही धर्म के असहाय नर नारियों के साथ लगातार जो नृशंस अत्याचार किये हैं, उसके प्रायश्चित में यदि इस महान ध्येय के लिए सौ जीवन भी बलिदान कर दिये जायें तो वे भी काफी नहीं रहेंगे।’

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अंतत: 24 सितम्बर 1932 को यह समझौता हुआ जिस पर मदनमोहन मालवीय, तेजबहादुर सप्रू, बी आर अम्बेडकर, सी राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद, जी डी बिड़ला, देवदास गाँधी सहित कुल चालीस लोगों के हस्ताक्षर हैं। मदन मोहन मालवीय ने सबसे पहले हस्ताक्षर किये, उसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने। अम्बेडकर ने श्री राजगोपालाचारी की कलम का उपयोग किया और उसे अपने पास रख लिया। इसके बदले में अपनी कलम डॉ. अम्बेडकर ने उन्हें दे दी। समझौते के अनुसार राज्य के विधानमंडलों में 71की जगह 148 सीट दलितों के लिए सुरक्षित की गयी। चुनाव संयुक्त निर्वाचन मंडली द्वारा होने, प्रत्येक राज्य में दलितों के लिए शिक्षा का अनुदान बढाने से लेकर नौ बिन्दुओं पर समझौते हुए। 26 सितम्बर को गाँधी ने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, उनके सामने बैठे हुए कुष्ठग्रस्त कैदी, विद्वान पंडित श्री परचुरे शास्त्री और उनके प्रियजनों की मौजूदगी में अनशन तोड़ दिया।

लेखक टी.एन.बी. कॉलेज,भागलपुर में हिन्दी के प्रोफेसर और तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय में छात्र कल्याण के संकाय अध्यक्ष हैं।
सम्पर्क – +917903732395

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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