शख्सियत

राधा बाबू को स्मृतियों की श्रद्धांजलि

 

  • प्रकाश देवकुलिश

 

6 फरवरी 2019 को भागलपुर के कलाकेन्द्र में लगभग पूरा दिन एक ऐसे माहौल में बीता जिसे कृतज्ञता, सम्मान, आदर से ओत प्रोत एक भाव भरा समय कहा जा सकता है| मौका था स्वयं शिक्षक, प्रोफ़ेसर, लेखक, सम्पादक, रंगकर्मी, चिन्तक हो चुके और अब देश के अलग अलग जगहों में सक्रिय छात्रों और अपनों द्वारा अपने चहेते, सम्माननीय, पितातुल्य शिक्षक, कवि, नाटककार, रंगकर्मी, लेखक डॉ. राधा कृष्ण सहाय, जो अपने नाम से ज्यादा ‘सर’ और ‘राधा बाबू’ के संबोधन से जाने जाते थे, के 29 जनवरी को महाप्रयाण के बाद, उनको याद करने और कृतज्ञता ज्ञापित करने का| डा. राधा कृष्ण सहाय भागलपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर तो थे ही, वे एक साथ नाटककार, कवि, लेखक, उपन्यासकार एवं रंगकर्मी रहे| उन्होने रंग संस्था ‘अभिनय भारती’ की स्थापना की थी और कई महत्वपूर्ण नाटकों का सफल निर्देशन एवं मंचन किया था| ख़ास बात यह कि कई किताबों – जालीदार पर्दे की धूप, वह दार्जीलिंग में मिली थी (कहानी संग्रह); एक शिक्षक  की डायरी (कविता); भाषा, सन्दर्भ और साहित्य, कहानी (आलोचना); अतः किम, खेल जारी खेल जारी, हे मातृभूमि (नाटक); फिर मिलेंगे (संस्मरण) के लेखक होने के बावजूद उन्होंने स्वयं को एक शिक्षक ही माना और आजीवन छात्रों तथा कला प्रेमी युवकों को एक सच्चे अभिभावक सा प्यार, निर्देशन तथा संबल देते रहे|

दिन के लगभग 11 बजे कलाकेन्द्र के मुक्ताकाश में श्रद्धांजलि और स्मृतियों का यह कार्यक्रम आरम्भ हुआ| इस मौके पर स्व. राधा कृष्ण सहाय जी की पुत्री अंजु तथा पुत्र अन्नू की पूरे दिन उपस्थिति बनी रही| राधा बाबू के कई पोट्रेट, जिनसे चिर परिचित मुस्कान और प्यार भरी नज़र के साथ. आत्मीय भाव से राधा बाबू झांक रहे थे…आशीष दे रहे थे, ने मंच का आकार ले लिया था, आरम्भ में सभी ने बारी बारी से राधा बाबू के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी| फिर चला स्मृतियों और और राधा बाबू की कृतियों की प्रस्तुति का सिलसिला|

‘निराला तुम्हें क्यों याद किया जाय?’ – राधा बाबू की, इस कविता की रंगकर्मी रीतेश रंजन के निर्देशन में भागलपुर की रंग-संस्था ‘सम्बन्ध’ द्वारा, नाट्य प्रस्तुति की गयी|आंगिक और वाचिक अभिनय द्वारा कविता के भावों का सहज और सफल सम्प्रेषण इस प्रस्तुति की खासियत रही| अपनी स्मृतियों को साझा करते हुएए भाव पूर्ण सञ्चालन के दौरान ‘संवेद’ तथा ‘सबलोग’ के संपादक किशन कालजयी ने लोगों को एक एक कर मंच पर आमंत्रित किया| कथाकार तथा सम्पादक शिव कुमार शिव ने राधा बाबू की कविता का पाठ किया और अवगत कराया कि राधा बाबू अपने निजी क्षणों में उन्हें कैसे याद करते थे| टी.एन.बी. महाविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर तथा ति.माँ. भागलपुर वि.वि. में छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष डा. योगेन्द्र ने ‘सर’ के साथ बीते छात्र जीवन के उन पलों को याद किया जब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की आयोजित परीक्षा के दौरान विभाग के विरुद्ध किये जा रहे बायकाट के बीच भी ‘सर’ प्रशासन से ज्यादा छात्रों की सुरक्षा की चिंता कर रहे थे| प्राध्यापक और रंगकर्मी डा. चन्द्रेश ने रंग गतिविधि से जुड़ी राधा बाबू की दूर दृष्टि की चर्चा करते हुए बताया कि नुक्कड़ नाटक के शैशव काल में ही, इसके महत्व को रेखांकित करते हुए ‘सर’ ने ‘नाटक से नुक्कड़ नाटक तक’ जैसा लेख लिखा था| उन्होंने इस लेख का पाठ किया| वरिष्ठ कथाकार देवेन्द्र सिंह अस्वस्थता के बाद भी उपस्थित हुए और डा. सहाय के साथ बिताये पलों को याद किया| प्रसिद्ध प्ले बैक गायक मो. कय्यूम ने ‘सर’ की प्रेरणा से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त करने की चर्चा की और ‘चिट्ठी ना कोई सन्देश…, कहाँ तुम चले गयेष| गाकर सब की आँखें नम कर दी|

हुम्बोट विश्वविद्यालय, जर्मनी में सपरिवार बिताये चार वषों के प्रवास काल पर डा. राधा कृष्ण सहाय का संस्मरणात्मक उपन्यास है – ‘फिर मिलेंगे’ ति.मा.वि.वि. हिंदी विभाग के अध्यक्ष डा. अरविन्द कुमार ने उपन्यास के दो रोचक प्रसंगों का पाठ किया| ‘वी विल मीट अगेन’ शीर्षक से इसी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद किया है राधा बाबू की पुत्री अंजू ने| उन्होंने इस अंग्रेजी उपन्यास के एक रोचक प्रसंग को पढ़कर सुनाया| इन प्रसंगों में राधा बाबू की जीवन संगिनी (अब स्व.) श्रीमती मालती सहाय, जो भागलपुर विश्वविद्यालय के सुन्दरवती महिला महाविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर थीं, की बार बार चर्चा आई| श्री मती सहाय की भी ममतामयी याद ने सभी को भावुक कर दिया|

नाटककार, लेखक और गांधीवादी चिन्तक डा. श्री भगवान् सिंह ने अपनी श्रद्धांजलि में डा. सहाय और श्रीमती सहाय को समान रूप से याद किया और कहा कि राधा बाबू से उन्होंने मनुष्यता का पाठ सीखा| ति.माँ.वि.वि. अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक तथा रंगकर्मी उदय मिश्र ने ‘सर’ की मौलिक रंग दृष्टि तथा संस्मरणात्मक उपन्यास ‘फिर मिलेंगे’ में भारत और यूंरोप की संस्कृतियों के अन्तर की रचनात्मक प्रस्तुति की चर्चा की| भागलपुर वि.वि. हिंदी विभाग के प्रो. डा. प्रेम प्रभाकर ने राधा बाबू से जुडी अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए उनकी लिखी कहानी ‘खंडडहर’ का प्रभावी पाठ किया| राँची से आये प्रकाश देवकुलिश ने 35 वर्ष पूर्व दर्शक दीर्घा में गूंजते राधा बाबू के स्वर ‘नाटक माने एक्शन’ को नाटक की पूरी यात्रा को समझने का सूत्र वाक्य बताते हुए उनकी दो कविताओं के अंश का पाठ किया| रंगमंच तथा कला को समर्पित भागलपुर की संस्था ‘परिधि’ द्वारा डा. सहाय द्वारा लिखे दो नाटकों ‘मैं सोच रही हूँ’ तथा ‘हे मातृभूमि’ के समसामयिक अंशों का सम्प्रेषणीय मंचन किया गया| शिक्षाविद राजीव मिश्र ने एक मनुष्य के रूप में डा. राधा कृष्ण सहाय की महानता को याद करते हुए बताया कि छात्रों और होनहार कलाकारों को चुपचाप मदद दे देना राधा बाबू का स्वभाव था, मोक्ष की अवधारणा ऐसे ही सदाशय व्यक्तियों को लेकर है|

श्रीमती रत्ना मुखर्जी राधा बाबू के निर्देशित नाटकों में नाटकों में नायिका की भूमिका निभाती रहीं थीं, उन्होंने कहा कि वो मात्र अभिनेत्री नहीं रहीं, राधा बाबू और मालती दी की आत्मीयता ने उन्हें परिवार का अंग बना लिया| भागलपुर वि.वि. में हिंदी विभाग के पूर्व प्राध्यापक डा. रामचंद्र घोष ने छात्रों के बीच राधा बाबू की लोकप्रियता की चर्चा की| कहलगांव कॉलेज में हिंदी के प्रोफ़ेसर डा. पवन कुमार सिंह ने छात्रों के साथ अपने विद्वान शिक्षक की ईमानदारी को याद करते हुए कहा कि यदि कभी कक्षा में ‘सर’ को लगता कि विषय और ज्यादा गहराई की मांग करता है, तो वे स्पष्ट कह देते कि ‘मैं इसे और देख कर आऊंगा’| अनौपचारिक चर्चा में छायाकार एवं कथाकार रंजन ने राधा बाबू निर्देशित नाटकों के अभ्यास के दौरान ‘राधा बाबु’ तथा ‘मालती दी’ से प्राप्त स्नेहिल लमहों को याद करते हुए बताया कि उन्हें नाटकों में प्रकाश व्यवस्था की जिम्मेवारी निभाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था| जमुई से आये श्री भवानंद ने दुष्यन्त कुमार की वही ग़ज़ल, जिसे डा. सहाय उनसे अक्सर सुनते थे, सस्वर सुनाई| युवा शायर मो. एकराम साद ने राधा कृष्ण सहाय को लेकर लिखी ग़ज़ल का तरन्नुम में पाठ किया| ‘इस अनात्मीय समय में’ राधा बाबू की आत्मीयता को याद करते हुए रांची से डा. रविभूषण, ‘मानस गुरु’ के रूप में उनको याद करते हुए दिल्ली से यादवेन्द्र और गाज़ियाबाद से नीलू कुमारी ने संदेश भेजे थे, जिनके अंशों को किशन कालजयी ने पढ़कर सुनाया| दिवाकर घोष ने स्नेह की वर्षा करने वाले अपने सम्माननीय शिक्षक को याद करते हुए, धन्यवाद ज्ञापन किया| कार्यक्रम में कथाकार रामकिशोर, कवि राजकुमार, शिक्षक रामनारायण भास्कर, कलाकेन्द्र के प्राचार्य रामलखन सिंह, ‘परिधि’ के उदय, ललन, कुमकुम, संगीता घोष, ‘सम्बन्ध’ के कई सदस्य तथा शहर के सौ से अधिक साहित्य और कला प्रेमी उपस्थित थे|

कार्यक्रम का उद्देश्य था अपने प्रिय शिक्षक, अभिभावक को कृतियों और स्मृतियों की श्रद्धांजलि के साथ साथ उनकी प्रेरणा और प्रेम का पुनः संचयन| कार्यक्रम न सिर्फ इस उद्देश्य में सफल रहा बल्कि भावुकता की अंतर्धारा के साथ, कला और साहित्य को समर्पित एक दिन की तरह बीता… राधा बाबू जैसा ही उदात्त, सहज और अनौपचारिक|

कवि एवं मीडियाकर्मी, सहायक सम्पादक ‘सबलोग’

सम्पर्क- +919801990246, shreeprakash.sh@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

2 thoughts on “राधा बाबू को स्मृतियों की श्रद्धांजलि

  1. अरुण कुमार पासवान Reply

    कम मुलाक़ातें हुईं,पर महत्वपूर्ण।निधन का समाचार सुनकर झटका लगा था।श्रधांजलि सभा की इस रिपोर्ट ने एक बार फिर हिला दिया।पर नियति के आगे हम दुखी होने और जहाँ तक हो सके उनका अनुसरण करने के साथ, उन्हें आशीर्बाद देती हुई एक आदर्श मूर्ति के रूप में सदैव याद रखने के सिवा ,कुछ कर भी तो नहीं सकते।

  2. डॉ. जयश्री उपाध्याय Reply

    पूज्य राधा बाबू से मिलने का सौभाग्य एक – आध बार ही मिला परंतु इनकी पत्नी आदरणीय मालती दीदी से पढ़ने का सुअवसर लंबे समय तक मिला । मालती दी न सिर्फ़ एक उच्य कोटि की अनुशासनप्रिय शिक्षिका थीं बल्कि उनके विशाल हृदय में अपनी छात्राओं के प्रति असीम स्नेह भरा था । उनकी मधुर आवाज़ और बेहद स्तरीय भाषा ने मुझे बहुत लाभान्वित किया ।
    इस अवसर पर मैं उपस्तिथ न हो पाई पर इस दिन पूज्य राधा बाबू को मन ही मन श्रधांजलि देने के साथ मेरे हृदय ने मालती दीदी को भी श्रद्धा सुमन अर्पित किये । मन भर आया ।

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