पुस्तक-समीक्षा

टिकट प्लीजः डायरी के बहाने रेलवे का रोजनामचा

  • शिवाशंकर पांडेय

जिंदगी की छोटी-छोटी घटनाओं को पकड़ना और साहित्य की शक्ल देकर उसे बेहतर उपन्यास बना देने का हुनर देखना हो तो रामदेव सिंह का ‘टिकट प्लीज’ उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए। रेलवे के टीटीई शार्दूल अनिकेत की डायरी के बहाने रामदेव सिंह ने रेलवे की एक समूची आभासी दुनिया का विस्तार से खाका गढ़कर उसे दिलचस्प तरीके से पेश किया है। यूं भी कहा जा सकता है कि इस उपन्यास को पढ़ते हुए मनोरंजन के अतिरिक्त भारतीय रेल के उस ऐसे अनदेखे ‘सिस्टम’ से रूबरू होने का मौका मिलता है, जो बाहर से अक्सर नहीं दिखता। रेलवे में टीटीई की नौकरी, सैकड़ों किमी दूर दराज की ट्रेवलिंग, तरह-तरह के पैसेंजर्स को फेस करना। कभी ‘टिटिया’ के रूप में खलनायक तो कभी महिला ट्रेनयात्री की लाश के साथ मदद करके बुजुर्ग यात्री के ‘हितुआ’ के रूप में ‘देवता’ तक का तमगा हासिल करने वाला सज्जन इंसान। तरह-तरह के कड़वे-मीठे अनुभवों को आत्मसात करना और उसे बखूबी जीना… यह खुद एक लेखक को आम से खास तो बना ही देता है।

भोगे गए यथार्थ को कविता-कहानी की शक्ल देना रामदेव सिंह की पुरानी खासियत है। करीब तीन दर्जन से ज्यादा सशक्त कहानियों को लिखकर कथाकारों में अपनी अलग और विशिष्ट पहचान रखने वाले रामदेव सिंह इसके पहले ‘काले कोट का सफेद दिन’ कहानी संग्रह लिखकर चर्चा में आ चुके हैं। एक उदाहरण-‘अब ट्रेन में ज्यादा आदमी चढ़ेगा तो लोड बढ़ेगा, और तब गाड़ी बैठ जाएगी। … चढ़ने दीजिए सर, …। ‘अच्छा निकालो दस-दस रूपए फी आदमी…। ‘सिपाही जी गिनकर आगे जाने दीजिए…। ;टिकट प्लीज उपन्यास का एक अंशद्ध। इसके आगे देखिए-‘सुना, शर्मा जी पकड़े गए। …घूंस लेंगे तो पकड़ाएंगे नहीं। …सुना, शर्माजी छूट गए, घूंस देंगे तो छूटेंगे नहीं…। ;उपन्यास का एक और दिलचस्प अंशद्ध निश्चित रूप से बदतर होते सिस्टम पर यह करारा तंज है, जो मनोरंजन के अलावा खीझ पैदा करता है। और, यहीं पर कहानीकार अपने लिखने की सार्थकता हासिल करने में कामयाब होता दिखता है।

बिहार में मधेपुरा जिले के इसरायण कलां निवासी रामदेव सिंह ने जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा मुगलसराय में बतौर टीटीई के रूप में रेलवे की नौकरी में गुजारा है। बकौल रामदेव सिंह-‘रोजाना सैकड़ों मुसाफिरों के बीच टिकट चेकिंग में कई खट्टे-मीठे अनुभव। एक से एक दिलचस्प सब्जेक्ट्स दिखते हैं। यही सब मिलकर कहानी की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं।’ टिकट प्लीज को वे उपन्यास ही मानने का अनुरोध फ्लैप पर करते नजर आते हैं। बहरहाल, एक रचना के रूप में पेश इन कहानियों में शिल्प का ताना-बाना, शब्दों की प्रस्तुति, कहानियों को रूचिकर बनाती हैं। जो, पाठकों को शुरू से लेकर आखिर तक बांधे रखने में सफल दिखती है। इसके आगे क्या है?’ की उत्सुकता पैदा करती है। शुरू में ही उपन्यास का पहला हिस्सा जो दिखता है वह है ‘बसेरे से दूरः शहर में पहला दिन’। …रेलवे में नियुक्ति का पत्र लेकर बाबूजी सहरसा पहुंचते हैं। नियुक्ति का लेटर किसी वरदान से कम नहीं का भाव लेकर। डीपीओ ऑफिस, डेढ़ सौ रूपए की शुरूआती रिश्वत के बाद मेडिकल फिटनेस, भूली ट्रेनिंग, पेट के साथ पीठ को बचाने वाली दास बाबू की सीख के साथ, दिलचस्प तरीके से उपन्यास आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ता जाता है। ‘पहले तो मर्दाना टिकट और जनाना टिकट के नाम पर डील किया जाता था… वो टीसी जो केंद्र में मंत्री पद की शोभा बढ़ा रहे हैं, मर्दाना और जनाना टिकट के नाम पर वसूली किया करते थे…;लर्निंग डेज शीर्षक से उपन्यास का एक और अंशद्ध ये सब किसी छिपे सच से पर्दा उठाते हैं।

‘टिकट प्लीज’ उपन्यास भारतीय रेल के अंदरखाने में चल रहे घात-प्रतिघात की एक मुकम्मल तस्वीर भी है। ‘पगड़ी का रहस्य’ में सरदार जोगिंदर सिंह डीसीएस और मुगलसराय की डीलिंग, गौड़ियामठ का चंदा ;टीसी ऑफिस लाइवद्ध, चेकिंग-1, चेकिंग-2, चेकिंग-3, रेलवे की जारज संतानें, चंबल एक्सप्रेस के बोनाफाइड चोर, तरन्नुम में गार्ड साहब, रंजीत डॉन का कोटा, पाठकों को अगर एक अलग दुनिया की सैर कराते हैं, तो कन्हैया चाय वाला, फिफ्टी डाउन का दशहरी आम, मुगलसराय स्टेशन के बाहर कई साल से जमे जमाए हीरा चाय वाले, उसी के बगल थोड़ी दूर शास्त्री मार्केट में सिंधी की दुकान के मक्खन, मलाई, टोस्ट, आमलेट, अंडा फ्राई के प्रसंग पढ़ते हुए मुगलसराय किसी चलचित्र की तरह गतिमान होकर एक अलग दृश्य पैदा करता है। शायद यही इस उपन्यास की खासियत है जो इसे कुछ अलग और बेहतरीन श्रेणी के खांचे में रखता है। रेलवे से रिटायर्ड रामदेव सिंह अपने लेखन को सक्रिय हो जाएं तो हिंदी कहानियों में और भी ज्यादा बेहतर चीजें पढ़ने को मिल सकती हैं। बहरहाल, रामदेव सिंह उम्मीद तो बंधाते ही हैं।

एक नजर

रामदेव सिंह : आरडी सिंह के नाम से चर्चितद्ध, हिंदी की कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएं, लेख, संस्मरण, साक्षात्कार समीक्षाएं प्रकाशित। आकाशवाणी से कहानियाँ, वार्ता प्रसारित। डेढ़ दशक तक रंगमंच पर सक्रिय। लखनऊ दूरदर्शन की फिल्म ‘घनीभूत पीड़ा के कवि जयशंकर प्रसाद’ में जयशंकर प्रसाद की भूमिका। कहानी संग्रह ‘काले कोट का सफेद दिन’ पर रेलवे बोर्ड का प्रेमचंद पुरस्कार, जलेस बेगुसराय की ओर से ‘शील सम्मान’ केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद का ‘शब्द शिल्पी सम्मान’।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, और सबलोग के यूपी ब्यूरो से सम्बद्ध हैं|

सम्पर्क –  +918840338705, shivas_pandey@rediffmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

2 thoughts on “टिकट प्लीजः डायरी के बहाने रेलवे का रोजनामचा

  1. डॉ. मधु संधु Reply

    एक अलग विषय पर लिखे गए उपन्यास का परिचय देती बढ़िया समीक्षा ।

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