पर्यावरण

प्रकृति के दुश्मन तीन ‘पाउच ,पन्नी पॉलीथिन’

 

  • कवि अमन व्यास

 

कॉलेज में स्वच्छता अभियान की रैली में नारे दोहराये जाते हैं मैंने भी दोहराये हैं, एक नारा लेख लिखते समय ध्यान आ रहा हैं वह हैं :- प्रकृति के दुश्मन तीन / पाउच ,पन्नी पॉलीथिन । यह नारा आकर्षक लगता हैं कहने व सुनने में क्योंकि इसमें अनुप्रास अलंकार ( तीन बार “प” का प्रयोग हुआ हैं )। इसलिए नीरस विद्यार्थी जो किसी विवशता के कारण रैली में होते हैं , वे भी इस नारे में अन्य नारों की अपेक्षा बढ़ – चढ़कर भाग लेते हैं ।

ऐसा ही नारा अभी – अभी अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने दिया हैं । उन्होंने तीन “प” पानी ,प्लास्टिक और पर्यावरण के विषय में व्यापक जनांदोलन पर बल दिया हैं । पानी व पर्यावरण का संरक्षण तथा प्लास्टिक का अनुपयोग ।

 

पहला “प” अर्थात पानी , पानी के साथ दो तथ्य संलग्न हैं कि “प्यास केवल पानी से बुझती हैं और पानी बनाया नहीं जा सकता ।” वास्तविकता में पानी का निर्माण वैज्ञानिक नहीं कर सकते , वे हाइट्रोजन व ऑक्सिजन को मिलाकर भी शुद्ध जल के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकते । इसलिए यह कहा जा सकता है कि “जल का संरक्षण ही जल का उत्पादन हैं ।”
इसी वर्ष जब सावन के पहले सोमवार के बीत जाने पर भी देश के अधिकांश भाग में वर्षा नहीं हुई थी तो पलायन की स्थिति का निर्माण होने लगा था ,यज्ञ ,गीत ,भजन ,व्रत- उपवासों का क्रम प्रारम्भ हो गया था किसानों की दृष्टि मात्र आसमान को टकती दिखती । तब एक – एक बूंद का संरक्षण हो रहा था किंतु जब वृष्टि हुई तो वह अतिवृष्टि में परिवर्तित हो गई फिर पानी बहाया जाने लगा ,वर्षा जल संरक्षण प्रणाली ( rain water harvesting system ) का विचार भीषण गर्मी में सबके मन में था किंतु वर्षा होते ही सभी के मन में इसकी आवश्यकता नहीं रहीं ऐसा विचार पनपने लगा और अब विशेषकर शहरों में जिन्हें हम सीमेंट के जंगल कहते हैं वर्षा जल के संचय का कोई उचित प्रबंध नहीं हैं ।
हमेशा ध्यान रखिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का कार्य केवल शासन नहीं कर सकता ,सामान्य मानवी व शासन के सम्मिलित प्रयास से ही यह सम्भव हैं । शायद इसलिए प्रधानमंत्री जी ने एक – एक जन से इस अभियान को अपने स्तर पर संचालित करने व स्थानीय निकायों द्वारा सहयोग करने का निवेदन किया ।
स्मरण रहे “जल हैं तो जग हैं”

दूसरा “प” प्लास्टिक के लिए हैं । वास्तविकता में प्लास्टिक का निस्तारण एक बहुत बड़ा प्रश्न हैं पुरे मानव समाज के लिए । अमरत्व का वरदान प्राप्त मानव जीवन को मिला अभिशाप हैं प्लास्टिक। “मानव की देह दिन-दस-दिन में गल जाती हैं कंकाल बचता हैं किंतु प्लास्टिक युगों की समाप्ति के बाद खुदाई में जस की तस प्राप्त होती हैं ।”
हो सकता हैं “हड़प्पा की निशान के रूप में पत्थरो पर उकेरी हुई कलाकृतियाँ मिली हमारे निशान के रूप में पॉलीथिन मिले”
चीन में एक समय ऐसा भी आया जब उसकी जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि के कारण देश में उपलब्ध संसाधन कम पड़ने लगे ऐसा भी कहा जाता हैं कि चीन की इस परिस्थिति के कारण वहाँ पर अतिबुजुर्गो को मृत्यु के मुख में पहुंचाने के प्रयास भी होने लगे थे । बाद में “हम दो हमारा एक” कानून आया शने – शने वहाँ की परिस्थिति नियंत्रण में आने को हैं ।
मेरा भाव यह हैं कि जब निस्तारण सम्भव न हो तो जन – जागरण के कारण उस वस्तु का उपयोग प्रतिबंधित हो सकता हैं । हमारे साथ एक कपड़े का थैला सदैव रहे तो यह गर्व की बात हैं मेरे सम्मुख कई उदाहरण आते हैं कई बन्धु अपने साथ स्टील का गिलास लेकर चलते हैं ताकि कहीं पर भी किसी कार्यक्रम में भी प्लास्टिक के डिस्पोजेबल में पानी पीने की आवश्यकता न पड़े ।
सामान्यतया यह एक पागलपन हैं किंतु ऐसे कार्य को पहले उपेक्षा ततपश्चात समर्थन अंत में अपेक्षा व सम्मान प्राप्त होता हैं ।इसलिए अपने स्तर पर प्लास्टिक के उपयोग को समाप्त करने के लिए स्वयं से प्रयास प्रारम्भ कीजिये फिर परिवार, कुटुंब व राष्ट्र में स्वयं अलख जागने लगेगी ।

तीसरा “प” पर्यावरण – उपरोक्त दोनों ‘प’ का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सम्बन्ध इसी ‘प’ से हैं । अपने विद्यालय की प्रथम कक्षा की परीक्षा से लेकर महाविद्यालय के अंतिम वर्ष की परीक्षा तक प्रत्येक विद्यार्थी “पर्यावरण” पर आलेख ,निबन्ध लिखता हैं ।
किन्तु दुर्भाग्यवश केवल कागज़ों पर ही लिखता हैं निजमन में पर्यावरण के प्रति भाव नहीं आते ,आते भी हैं तो क्रियान्वयन नहीं करता ।
एक सामान्य सी बात कि वृक्ष पर्यावरण के स्तम्भ हैं ,रक्षक हैं ।
यह सर्वज्ञात तथ्य हैं स्थापित सत्य हैं । वनों का विकल्प वन हैं । पर अपने सामान्य उपयोगों के लिए वृक्षो की कटाई कहाँ तक ठीक हैं ।
गाँवों में किसान भी अपने खेत की थोड़ी सी सीमा बढ़ाने के लिए अधिक उपज के स्वार्थ के पूर्वजों द्वारा सिंचित आम ,जामुन आदि वृक्षो को क्षण भर में समाप्त कर देता हैं ।
सामान्य शब्दोइ पर्यावरण का अर्थ हमें चारो ओर से घेरे हुए आवरण से हैं वह आवरण माँ के संरक्षण की तरह आवरण हैं ।
वृक्षो की कटाई ही नहीं वरन पर्यावरण के सभी अंग ,प्रदूषण के कारक ,कारण और निवारण पर चर्चा होनी चाहिए । किन्तु चर्चा दिल्ली के किसी ए.सी. युक्त साभागार में नहीं गाँवों की चौपालों ,घरों की भोजनशाला में होना चाहिए ।

कचरा देख नाराज हुईं राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल

शासन द्वारा सख्त कानूनों का निर्माण तथा उनके क्रियान्वयन की पूर्ण चिंता करनी चाहिए । किन्तु जनसामान्य अर्थात हमें भी अपने प्रयास करना चाहिए । ऐसे महान प्रयास हुए भी हैं हाल ही में माटी के गणेश सरकार की योजना नहीं हैं ,किन्तु जनसामान्य के जागरण की फलश्रुति हैं कि यत्र – तत्र हाट -बाज़ार में माटी व गौबर से निर्मित पर्यावरण मित्र बप्पा सुशोभित हो रहें थे ।
कुछ उदाहरण है कि गाय के गौबर से निर्मित कंडो से मेरा दाह संस्कार हो ऐसी कई लोगो ने इच्छा व्यक्त की हैं , इसी के चलन का सुफल है कि मुम्बई महानगर पालिका ने गोबर के ब्रिक्स बनाना प्रारम्भ किया हैं तथा समूचे देश के उनका विक्रय हो रहा हैं ।

अन्ततोगत्वा जन व शासन के सामूहिक प्रयास की महती आवश्यकता हैं पानी व पर्यावरण के संरक्षण में तथा प्लास्टिक के अंत में । लगभग शासन कमर कस चूका हैं अब जन के मन में राष्ट्र के भावी भविष्य की उज्ज्वलता के महान दृश्य का दर्शन हो जाए तो शीघ्र ही भारत माता हरियाली चुनरी में सुशोभित होगी ।
मुश्किल हैं असम्भव नहीं क्योकि हमने ( जन व शासन ने) भारत को स्वच्छ भी किया हैं और लगभग खुले में शौच से मुक्त भी ।

पर्यावरण पर लिखे जाने वाले निबन्ध के उपसंहार की पंक्ति से लेख का भी उपसंहार करूँ तो – “एक स्वछंद व स्वस्थ पर्यावरण हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए हमारे द्वारा दिया गया सबसे अच्छा उपहार होगा”

लेखक प्रसिद्द युवा कवि एवं वक्ता हैं|

सम्पर्क- +918871286106, amanpvyas56@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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