मैं कहता आँखन देखी

इस शानदार मेजबानी का मतलब

 

  •  नवल किशोर कुमार

तुम तकल्लुफ को इख्लास समझते हो फराज
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।
(अहमद फराज की रचना)

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का शानदार स्वागत किया है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। शानदार स्वागत का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि स्वयं नरेंद्र मोदी पजामा छोड़ लुंगी में नजर आए। यह तो कुछ हदतक ठीक भी माना जा सकता है क्योंकि यह उनका फैसला है कि वे कब क्या पहनें और कब क्या खोलें। हर किसी को अपने पोशाक चुनने और पहनने का अधिकार है। लेकिन जिस तरीके से सैंकड़ों बच्चों को शी जिनपिंग का मास्क पहनाया गया, वह गलत है। इसकी आलोचना की जानी चाहिए। लेकिन इस आलोचना के परे मूल सवाल यही है कि आखिर चीनी राष्ट्रपति के इतने शानदार स्वागत के पीछे भारत की मंशा क्या है?

अभी तीन दिन ही हुए हैं जब शी जिनपिंग ने बयान दिया कि उनकी नजर जम्मू-कश्मीर पर बनी हुई है। पाकिस्तान को उसका सबसे भरोसेमंद साथी होने की बात शी जिनपिंग ने हाल ही में दुहरायी है। फिर भारत के प्रधानमंत्री उनकी शान में अपने कपड़े क्यों बदल रहे हैं?

कई बातें हो सकती हैं। मसलन एक तो यह कि भारत आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर अल्टीमेटम जारी कर चुके हैं। ग्रोथ रेट और रूपया दोनों लगातार गिरते जा रहे हैं। राम नाम और देशभक्ति के अफीम में सोये पड़े भारत के नौजवानों को अभी भी उम्मीद है कि मोदी कुछ करेंगे। लेकिन जिस तरीके से भारत के वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कल ही जीएसटी को लेकर बयान दिया है, वह भारत सरकार की हताशा की परिचायक है। उन्होंने यह कबूला है कि जीएसटी का संतोषजनक परिणाम नहीं मिला है। लेकिन वे इसे अब वापस नहीं ले सकती हैं क्योंकि जीएसटी कानून संसद द्वारा पारित कानून है।

चीनी राष्ट्रपति को अपना लुंगी ड्रेस और नन वेज मेन्यू कार्ड ऑफर करने वाले नरेंद्र मोदी के मन में आखिर चल क्या है? फिर से इसी सवाल पर ध्यान केंद्रित करते हैं। क्या भारत यह समझ चुका है कि अब वह यदि चीन के साथ मिल जाय तो ये दोनों राष्ट्र मिलकर अमेरिका के मोनोपॉली को खत्म कर देंगे? इस बात में दम तो है। वैसे भी चीन की आर्थिक और सामरिक शक्ति बहुत बढ़ चुकी है। यदि उसे भारत जिसके पास विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है (बड़ा बाजार है), का साथ मिल जाय तो वह अमेरिका को पछाड़ सकता है। लेकिन भारत को इस सौदेबाजी में क्या मिलेगा?

इस सवाल पर गौर किया जाना चाहिए। वर्तमान के संदर्भों को देखें तो इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी के सत्तारूढ़ होने के बाद भारत की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटी है। हालांकि भारतीय मीडिया इसका दूसरा रूप ही दिखाती है। भाड़े की भीड़ को दिखा वह भारत की साख को नहीं मोदी की लोकप्रियता का ढिंढोरा पिटती है। तो क्या भारत ने यह मान लिया है कि अब उसकी साख तभी बची रह सकेगी जब चीन का आशीर्वाद उसे मिलेगा।

या फिर वजह उपरोक्त में से कोई भी न हो। नरेंद्र मोदी अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए शी जिनपिंग के सामने घुटनों के बल हैं? आतंकवाद ओर उग्रवाद की समस्या में उन्नीस-बीस का ही फर्क सामने आया है। मतलब यह कि न तो आतंकवाद का खात्मा हुआ है  और न ही उग्रवाद की समस्या पर सरकार काबू पा सकी है। पूर्वोत्तर के प्रांतों में एनआरसी के कारण अलग से बखेड़ा खड़ा हो गया है। वहां जन-विद्रोह की सुगबुगाहट तेज हो गयी है।

बहरहाल, वजह चाहे कुछ भी हो भारत के शानदार आतिथ्य की, कहना अतिश्योक्ति नहीं कि भारत दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा है। चीन को उससे वित्तीय सहयोग की भी अपेक्षा होगी। सामरिक विषयों में भी वह चीन की सहायता लेना चाहेगा। इसके अलावा पाकिस्तान को डराने और धमकाकर रखने में चीन उसकी बड़ी मदद कर सकता है। हालांकि चीन न तो नेहरू के समय बेवकूफ था और न ही आज। भारत को सचेत रहने की जरूरत है।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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