मैं कहता आँखन देखी

ये युवा घोड़े अथवा कोल्हू के बैल नहीं हैं सरकार

 

  • नवल किशोर कुमार

 

एक तस्वीर, सौ अफसाने। ठीक यही बात इस तस्वीर पर लागू होती है जो कर्नाटक के भगत प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज, हवेरी में उस वक्त की है जब परीक्षा ली जा रही है। इस तस्वीर में बच्चों के सिर पर कागज के बक्से यानी कार्टून डाल दिए गए हैं। ताकि परीक्षार्थी अगल-बगल न झांक सकें। नकल रोकने का यह नया तरीका इजाद किया गया है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि टमटम में जोते गए घोड़ों के साथ किया जाता है। उनके माथे पर भी इसी तरह का मोहरा होता है ताकि वे दायें-बायें न देख सकें।जो भारत के गांवों को जानते-समझते हैं, उनके लिए कोलहू का बैल अंजाना शब्द नहीं है। इन बैलों की हालत घोड़ों से भी गयी-गुजरी होती है। घोड़ों को सामने देखने की इजाजत होती है जबकि कोल्हू में जुते बैलों की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है। इस सवाल पर आगे चर्चा करेंगे कि क्या आज के युवाओं को घोड़ा और बैल बनाने की तैयारी की जा रही है।

फिलहाल जैसे ही यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई कर्नाटक सरकार ने इस पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिया है। लेकिन बात यही खत्म नहीं होती। बात तब भी खत्म नहीं होगी कि जांच रिपोर्ट में क्या सामने आता है और फिर सरकार कार्रवाई करेगी या नहीं करेगी। इस पूरे मसले का यह केवल एक पक्ष है। दूसरा पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है।

दूसरे पक्ष पर बात करने से पहले दास्तां एक और तस्वीर की। करीब चार साल पहले बिहार से एक तस्वीर आयी थी। तस्वीर में एक परीक्षा केंद्र में नकल के पर्चे पहुंचाते लोग थे। इस तस्वीर को बिहार की शिक्षा व्यवस्था का पर्याय बताया गया था और कथित तौर स्वयं को सुशासक कहने/कहलाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पर ठोस कार्रवाई की। नतीजा यह हुआ कि बाद के दिनों में नकल का पैटर्न बदल गया।

अब बात उपरोक्त दूसरे पक्ष की। आखिर कौन हैं वे जो युवाओं को घोड़ा अथवा कोल्हू के बैल के रूप में देखते हैं? क्या इसके लिए उपरोक्त कॉलेज के लोग जिम्मेदार हैं? या फिर इस देश के शासक जो युवाओं को डाक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस, सफल उद्यमी, साहित्यकार, पत्रकार, वकील, जज, कलाकार के बजाय पकौड़ा तलने वाला समझते हैं?

एक बार फिर बात बिहार की। 2005 में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद को सत्ता से बेदखल करते हुए सूबे की कमान संभालने के साथ ही तीन काम किया। पहला काम अमीरदास आयोग को भंग करना था। यह आयोग रणवीर सेना और उसके संरक्षकों के मामलों में जांच कर रहा था। दो अन्य कार्यों में डी. बंद्योपध्याय कमीशन और मुचकुंद दूबे आयोग का गठन किया जाना शामिल था।

मुचकुंद दूबे आयोग ने अपनी रिपोर्ट में समान शिक्षा की बात कही। यह वही एजेंडा था जो लोहिया की सप्त क्रांति में शामिल था और जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति में भी। मुचकुंद दूबे ने अपनी रिपोर्ट में तमाम बातों के साथ यह भी कहा कि जाति व्यवस्था के तर्ज पर शिक्षा व्यवस्था को खड़ा किया जा रहा है और इसके मूल में बहिष्करण का सिद्धांत है। जो सबसे अमीर तबका होगा, उनके बच्चों के लिए अलग स्कूल-कॉलेज। जो थोड़ा सा कम अमीर यानी अरबपति या खरबपति न होकर करोड़ों वाले होंगे उनके बच्चों के लिए अलग। जो मिडिल क्लास वाले हैं उनके लिए अलग और जो नीचे पायदान पर हैं उनके लिए अलग।

असल में युवा नकल क्यों करते हैं, उसकी जड़ में हमारे शासकों का यही एप्रोच है। आज का हर युवा आगे बढ़ना चाहता है। संसाधन और शिक्षा सब अलग-अलग हैं। अलग-अलग चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का वे सामना कैसे करें, इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा को लेकर हमारे हुक्मरान अपनी सोच बदलें। वर्ष 2016 में मैंने मुचकुंद दूबे का साक्षात्कार किया था। शैक्षणिक संस्थाओं के निजीकरण से जुड़े मेरे एक सवाल के जवाब में उन्होंने उन देशों के बारे में बताया जहां समान स्कूली शिक्षा लागू है। उनके मुताबिक, वहां की सरकारों ने ऐसा इंतजाम कर रखा है कि स्कूल चाहे सरकारी हों या प्राइवेट, सभी बच्चों को पढाया जाएगा। फ़िर चाहे वे गरीब हों या अमीर। एक बात और शिक्षा के मामले में इसका समानीकरण सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। ऐसा नहीं हो सकता कि आप शिक्षा को समान किये बगैर गुणवत्ता में सुधार कर सकें। खासकर निजी संस्थाओं के बुते तो बिल्कुल भी नहीं। यदि ऐसा हुआ तो यह एक भीषण दुर्घटना के रुप में सामने आयेगा। हमारे देश में यह सामने आ भी रहा है। जिस तरह से समाज में अलग-अलग श्रेणियां हैं, शिक्षा की भी अलग-अलग श्रेणी बन चुकी है। अलग-अलग बोर्ड इसके उदाहरण हैं। (https://www.forwardpress.in/2016/09/shiksha-ki-sajis-hatya-kar-rahe-narendra-modi_nawal-kishor-kumar/)

जाहिर तौर पर युवाओं के साथ यह बड़ी साजिश है। पूरे विश्व में भारत की पहचान मजदूर पैदा करनेवाले देश की है। इसके लिए सरकारें और उसकी नीतियां महत्वपूर्ण रही हैं। बेहतर तो यह हो कि युवाओं के आंख पर पट्टी लगाने के पहले सरकार खुद यह जतन करे तब संभव है कि उसे वह मार्ग दिखेगा जो देश को आगे की ओर ले जाएग। सरकार को तभी समझ भी आएगी कि इस देश के युवा पकौड़ा तलने के लिए पैदा नहीं हुए हैं।

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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