चर्चा में

बात थोड़ी लम्बी है, लेकिन कहना जरुरी है

 

  • अमित कुमार सिंह 

 

बात थोड़ी लम्बी है! लेकिन कहना जरुरी है। कहने की सार्थकता तभी है जब उसे सुना जाए। अतः इस बात की सुनवाई हो सके, इसलिए इसे पढ़ना भी उतना ही जरुरी है…
नयी कहानी आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर राजेंद्र यादव ने कहा है कि चालीस-पचास के दशक में जो साम्यवाद से प्रभावित नहीं था, उसे युवा नहीं माना जाता था।मार्क्स की साम्यवादी सोच जब लेनिन के प्रयोगशाला में उतरी तो रूस की सफल क्रांति के रूप में एक ऐसी मिशाल पूरी दुनिया के सामने खड़ी हुई, जिसके चमक से आँखे चुरा पाना किसी भी देश के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था| भारत में भी इसका असर हुआ| गाँधी एक साल में आज़ादी दिलाने का वादा और दावा लेकर हिन्दुस्तानी जनमानस के सामने उम्मीद की मशाल जलाये| लेकिन चौरी-चौरा में इस मशाल के बुझ जाने पर उस दौर के युवाओं में एक ऐसी चिंगारी सुलगी, जिसका विस्फोट भगत सिंह के रूप में सामने आया|

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किताबों और कथा-कहानियों से परे भगत सिंह को देखने-जानने-बुझने का पहला मौका सन् 2002 में राजकुमार संतोषी के “दि लिजेन्ड ऑफ भगत सिंह” के रूप में मिला| आज भी याद है कि कैसे हमारे बालमन में उस चिंगारी का कुछ अंश समाहित हुआ, और साँस थामें भगत की आखिरी साँस तक पर्दे पर टकटकी लगाये रखे थे| इसके पहले पर्दे पर जब भी किसी “सिंह” टाइटल वाले चरित्र को देखा था, तो बस विलेन के ही रूप में- चाहें वह बड़े पर्दे पर गब्बर सिंह हो,या छोटे पर्दे पर क्रूर सिंह| लेकिन चन्द्रकान्ता का “यकू” उवाच् वह क्रूर पात्र(अखिलेन्द्र मिश्रा अभिनीत) भी यहाँ चंद्रशेखर आज़ाद के रूप में पॉजिटिव करेक्टर में दिखा, तो भगत सिंह भी फ़िल्मी निर्देशकों के जातीय पूर्वाग्रह के साम्राज्यवादी नज़रिए के नाश होने का नारा लगा रहे थे|
हर चरित्र को एक नाम देना जरुरी है| साहित्य और सिनेमा में उन चरित्रों के नाम अमर हो जाते हैं|”ठाकुर मैं तेरा खून पी जाऊंगा!” जैसे डायलाग भी| ज़ाहिर-सी बात है कि इस डायलाग में ठाकुर की जगह “शर्मा/ वर्मा/ मिश्रा/ पांडे/ गुप्ता/ यादव… तेरा खून पी जाऊंगा” जैसे डॉयलॉग सुनना कोई पसंद नहीं करेगा, क्योंकि गुस्सा शोषक के खिलाफ ही भड़कता है, और सिनेमा ने कहीं-न-कहीं “ठाकुर” या”सिंह” के खिलाफ एक पूर्वाग्रह तैयार कर दिया है|

प्रख्यात राजनेता बूटा सिंह की अध्यक्षता में भारत से जाति-भेद दूर करने के लिए सलाह देने हेतु गठित की गई कमेटी ने अपने रिपोर्ट में कहा था कि सरकारी कागजातों में यदि व्यक्ति के नाम के साथ जाति-सूचक शब्द लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाए तो जातीय-अभिमान के साथ-साथ भेद-भाव में भी कमी आयेगी| सरकारी तौर पर तो यह लागू नहीं हुआ, लेकिन सिनेमा और साहित्य में यदि यह स्वैच्छिक रूप से लागू हो तो जरूर कोई बात बन सकती है| क्योंकि ये दोनों समाज का केवल आईना ही नहीं, मशाल और मार्गदर्शक भी हैं|
आज भगत सिंह की जयंती पर उन्हें याद करते हुए इस आइनें में यह अक्स स्वयं ही झलक उठा| और अंत में भगत सिंह का सर्वप्रिय “डायलॉग”– Long Live Revolution (इंक़लाब ज़िन्दाबाद)*

लेखक शिक्षक हैं और साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं|

सम्पर्क- +918249895551, samit4506@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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