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कथा सरदार सरोवर बाँध के विरोध की – मेधा पाटकर

 

  • मेधा पाटकर 

 

देश की मतदाता सूची में पहला गाँव है नर्मदा किनारे बसा हुआ महाराष्ट्र का मणिबेली और इस गाँव का वलसंग बिज्या वसावे, दामजा गोमता का पोता, देश के इस लोकसभा चुनाव-2019 की सूची का पहला मतदाता। इस पर कुछ पत्रकारों की वहाँ पहुँचकर, कुछ  मराठी, गुजराती, अंग्रेजी अखबारों में लिखी खबरों को पढ़कर लगा कि हमारे सभी देशवासियों तक मणिबेली की पहचान और यादगार तत्काल पहुँचानी चाहिए ।

मणिबेली महाराष्ट्र का, गुजरात सीमा पर बसा हुआ गाँव! मणिबेली का विस्तार पाँच फलियों का, करीबन 1000 हेक्टर्स का! तड़वी और वसावा, दो आदिवासी जमात के करीबन 100 परिवार यहाँ रहते आये और जंगल, जमीन, नर्मदा और नाले या उपनदियों के पानी तथा मछली पर उन सबकी पीढियाँ जीती रहीं। मणिबेली में एक- एक पहाड़ और फलियों में बचाया जंगल इस बात का गवाह था कि वहाँ के आदिवासी न बिना कारण जंगल काटते थे, न ही बेचते। उतार वाली खेती के साथ नदी किनारे की प्याज, लहसून, राई, मकई, सब्जियाँ तक  उपजाने वाली जमीन साल भर खिलाती थी, तो उन्हें कहीं गाँव छोड़कर मजदूरी करने जाना नहीं पड़ता था। उन्होंने अपनी जरूरतें गाँव के संसाधनों से पूरी करते हुए, बाजार से तकरीबन पूरी दूरी बनाके रखी थी। वैसे भी अपनी छोटी सी एक पेड़ की लकड़ी की नाव में बैठकर, नदी पार होकर, फिर कुछ 4-6 किमी चलकर किसी गुजरात के बाजार में पहुँचना या फिर गाँव के पीछे अटल खड़े पर्वत पर चढ़-उतरकर, दो राज्यों के बीच की देवनदी पार करके, 7-8 घंटे चलकर महाराष्ट्र के मोलगी गाँव के बाजार में पहुँचना असंभव नहीं तो आसान भी नहीं था। अपने आप में मणिबेली गाँव स्वयंपूर्ण या कम से कम आत्मनिर्भर था। न बिजली, न सिंचाई; एक दुकान के अलावा न कोई व्यापार की निशानी। इसीलिए मछली तक का व्यापार नहीं होता, लेकिन जंगल की जड़ी-बूटी से लेकर हर प्राकृतिक संसाधन का उपयोग, सही अर्थ से निरंतरता के सिद्धान्त पर अमल करने वाले आदिवासियों का यह गाँव ‘ग्राम स्वराज्य’ का, बिना किसी दिखावे के, एक प्रतीक था।

वैसे महाराष्ट्र के सतपुड़ा की कोख में बसे कई सारे आदिवासी गाँव, खास करके नर्मदा किनारे के, मणिबेली जैसे ही थे। हर गाँव में, फलियावार भी एक या दो बुजुर्ग कारभार चलाते थे। मणिबेली फिर भी कुछ अलग था, अन्य गांवों से। यहाँ का दामजा गोमता पूरे जंगल की जड़ी-बूटी, जानने, छानने और हर बीमार व्यक्ति को देने वाला वैद्य था। भील आदिवासियों की देवेदानी में गाँवदेव, वाघदेव जैसा प्रकृति से जुडाव था| दामजा गोमता गाँव का पुजारी भी था| मणिबेली के तडवी समाज के पटेल की एक कठोरता थी तो भील वसावा समाज के तीन सगे भाई सिंगा, ढेब्र्या और गिंब्याभाई की शांति और समझदारी अनोखी थी। ढेब्र्या अपनी दो बीबियों और कई बच्चों के साथ कभी जोर दिखाने वाले व्यक्ति होते थे, लेकिन उससे भी अधिक ताकतवर तीन भाई जालमा, जातरया जेरमा और उनका चचेरा भाई भुत्या मिलकर गाँव के किसी भी मुद्दे पर पेश आते थे। नर्मदा किनारे पारंपरिक लकड़ी चक्र याने लकती के आधार पर पानी उठाकर, ठंडी में रबी की फसलों में सब्जी या राई भर-भरकर निकालने वाले पितामह तुल्य गिम्ब्याभाई और थोड़े या अधिक शराबी रहे तो भी नदी किनारे कड़ी मेहनत करने वाले केसुभाई तड़वी!  उन सभी के बच्चे, घर की बहनें, एकाध जमाई मिलाकर तड़वी-वसावा की एकता अद्भुत थी।

सरदार सरोवर बाँध स्थल से निकलकर नर्मदा के दक्षिण किनारे, गुजरात के 3 गाँव पार करके, 4 किमी पैदल चलकर हम मणिबेली पहुँचते थे। अकेले चलते, कभी संघर्ष गीत मन में उभरता तो कभी रणनीति। मणिबेली का नाम सरदार सरोवर को चुनौती देने वाले संघर्ष से जगप्रसिद्ध हुआ। मणिबेली गाँव सहित उस वक्त के धुले जिले के 9 गांवों में जा जाकर गाँवस्तरीय समिति और फिर तहसील स्तर की समिति गठित होने के बाद, महाराष्ट्र के सरदार सरोवर प्रभावित 33 गावों के 33 प्रतिनिधियों का समूह कभी धुले में  तो एकाध बार मुंबई में,  मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव के समक्ष दो या तीन घंटों तक एक-एक सवाल उठाता, बहस करता था। बाँध स्थल के पास परियोजना की केवडिया कालोनी में, केन्द्र और चार बाँध प्रभावित व लाभार्थी राज्यों के उच्च अधिकारियों के साथ चर्चा चली थी, मई 1988 में छः घंटों तक! उसमें गुजरात के वाहिनी संगठन के कार्यकर्ता और घाटी के कुल 300 प्रतिनिधि शामिल हुए थे | चर्चा के बाद देर रात हम केन्द्र के समाज कल्याण सचिव एस.एस. वर्मा जी से  सर्किट हाउस में मिले तो उन्होने साफ कहा ‘‘इन राज्यों के पास तो पुनर्वास का नक्शा तक तैयार नहीं है। कहाँ है जमीन? प्लान ही नही, तो बाँध कैसे?’’ हमने उनके हाथ पत्र रखकर चेतावनी दी कि हमारे सभी सवालों के जवाब और पुनर्वास की पूरी योजना सामने नहीं रखी तो 2 महीने बाद हम सरदार सरोवर बाँध का विरोध करेंगे। मणिबेली की ओर से महिलाएँ भी शामिल रहती थी, और गुजराती व भिलारी  दोनो भाषाओं में सवालों की तीक्ष्णता, संगठन की प्रक्रिया, बैठकों, प्रबोधन के चलते बढती जाती थी। 18 अगस्त 1988 में कुल छः शहरों में, तीनों राज्यों में रैली निकालकर हमने सरदार सरोवर का विरोध जाहिर किया|

1985 से चलकर ‘नर्मदा धरणग्रस्त समिति’ ने महाराष्ट्र में जनशक्ति जुटाई। यह नाम भी गाँव प्रतिनिधियों ने तय किया और शासन के हर स्तर पर हमने झलकाया। विश्व बैंक का प्रतिनिधि दल एक रोज मणिबेली पहुँचा तब हमारी बैठक काफी ऊंचाई पर वामीपाड़ा में चल रही थी। ‘बहुत सारे लोग नीचे बोट लेकर आये है… उनमें गोरे लोग, अधिकारी और पुलिस भी है’, यह सुनते ही मैं सब लोगों के साथ दौड़ पड़ी। सुखदता के साथ मन में  चिंता भी करते हम वहाँ पहुँचे। वहाँ गुजरात के अधिकारी गाँववालों से विश्व बैंक के दल के सदस्यों की मुलाकात करवा रहे थे। उनके सवाल और अनुवाद सुनके मैं हैरान रह गयी और मैंने जब अंग्रेजी में सच्चाई बताना शुरू किया तब बैंक के और गुजरात के अधिकारी भी कुछ दंग, कुछ दुखी दिखाई दिये। आखिर बैंक के लोग भी समझ गये कि विस्थापितों को उनके पुनर्वास की जानकारी देना और सहभागी करना भी न्यूनतम स्तर पर है। गुजरात शासन के दावे झूठे साबित करने का और महाराष्ट्र की मूक बधिरता का शायद यह पहला मौका था, लेकिन बाद में कई मौके मिले।  मणिबेली से ही शुरूआत हुई जल सत्याग्रह की। सरकार बाँध बनाती गयी और डूब बढ़ती गई। जब अंदाजा आया कि 1990 के मानसून में अब मणिबेली की खेती ही क्या, घर भी डूब सकते हैं तो अप्रैल में ही हम निकल पडे। मणिबेली सहित महाराष्ट्र से कई सारे गावों के सैकड़ों लोग, रास्ते में धुले, ठाणे सहित कई पड़ाव पर से लोग घाटी में डूब के अत्याचार, अन्याय की बात उठाते, मुंबई पहुँचे| तब खबर आयी कि मणिबेली का रायण का पेड़ पुलिस ने काट दिया । जिस पेड़ के नीचे हम बैठक करते, उसके पीले, मीठे फल उठा-उठाकर हम और हमारे अतिथि भी खाते थे, उससे प्यार करने वाले हम हादसा खा गये। इतने में पुलिस का केसुभाई का मकान घेरने और उनकी बेटी कुंता का पुलिस को घंटों तक रोकने की खबर आयी। केसुभाई का तोड़ा गया घर तो बाद में शासन से फिर से बनवा लिया हमने! लेकिन उस वक्त हम देवराम भाई के साथ उपवास पर बैठे। उस लम्बे उपवास के बाद मुख्यमंत्री शरद पवार जी हेलिकाप्टर से मृणाल गोरे जी के साथ, बाँध स्थल पर पहुंचे और 300 कांग्रेस व राज्य शासन के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कई सारे निर्णय, जैसे बिना पुनर्वास डूब न आने देने का, हुए। उन निर्णयों पर अमल के लिए लड़ाई जारी है।

जल सत्याग्रह

मणिबेली हमारे सत्याग्रह का पहला स्थल रहा। उसके पहले दिसंबर-जनवरी 1990-1991 तक मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात से निकलकर गुजरात की सीमा पर काले फीते से हाथ बाँधकर सीमा पार करने वाले 5000 लोगों के एक-एक अहिंसक समूह पर लाठियाँ बरसीं, कार्यकर्ताओं और आदिवासी, किसान-मजदूरों की गिरफ्तारियाँ हुई | 21 दिन का उपवास हुआ था| बाबा आमटेजी भी 1 किमी दूर पर अपनी गाड़ी के साथ डटे थे| देश के कई सारे कार्यकर्त्ता, संगठनों, मध्यस्थों की इसमें सहभागिता थी| विश्व बैंक से उसी दौरान पुनर्विचार आयोग गठित हो चुका था| लेकिन बाँध पर कार्य जारी था| 1991 से हर वर्षा काल में ‘डूबेंगे पर हटेंगे नही’ के संकल्प के साथ वहीं डेरा रहा। देशभर के  सर्वोदयी से वामपंथियों तक कई सारे नेता वहाँ पहुँचते रहे। संवेदनशील पत्रकारों का समूह हर मुख्य कार्यक्रम में उपस्थित रहता था। शूलपाणेश्वर का मंदिर मणिबेली में चैत्र/जनवरी में हजारों यात्रियों को खींच लाता। वे सब मंदिर के साथ हमारे कर्मतीर्थ का, मंदिर के बाजू में ही गाँव-गाँव के संसाधन जुटाकर बनाये 3-4 कमरों के ‘सत्याग्रह स्थल’ का दर्शन करने भी जरूर आते। हमने उसका नाम रखा था, ‘नर्मदाई’ याने सुख देनेवाली। इतना सहज-सुंदर, सौम्य और अ-हिंसक नाम और शालीन, फिर भी शासन वहाँ के संघर्ष से थर-थर काँपता था। गुजरात से आये भक्तगण का भी गुजरात में हमारे खिलाफ फैलाये दहशतवाद से भ्रम टूटता, जब वे प्रत्यक्ष में हमारी ‘जायदाद’, जीवन शैली और कार्यप्रणाली देखते। 1993 में मणिबेली में गाँव के 13 मकान डूबने के बाद जब ‘समर्पित दल’ घोषित करके और परियोजना पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो जल समाधि लेने की खुली चेतावनी देकर हम भूमिगत हो गये तो पुलिस का डेरा रहा । 17 जुलाई से हमें ढूंढ न पाने वाली पुलिस ने मणिबेली के खेत-खेत ढूंढे, कुछ बरबाद किये, परिवारों को परेशान हैरान भी किया। आखिर केन्द्रीय उच्चाधिकार समिति द्वारा पुनर्विचार के लिए सार्वजनिक घोषणा होने के बाद ही हमने हमारा निर्णय वापस लिया। देशभर के 700 पत्रकार उपस्थित थे ही, लेकिन घाटी के तकरीबन 800 लोग, जो निमाड़ से और अन्य संगठनों, स्थानों से पधारे थे, बड़ौदा की जेल में थे और हमारी समाधि के बाद दूसरा दल भी अरुंधती धुरु जैसी कटिबद्ध कार्यकर्ती के साथ तैयार था। इस स्थिति में ‘जलसमाधि’ से झटका खाई गुजरात शासन ने एक ऐसा शासकीय आदेश घोषित किया कि हम मणिबेली/केवडिया जाने वाले रास्ते पर न चल सकते, न वाहन में सफर कर सकते। बड़ौदा में पुलिस ने ही पहुँचा दिया जब हमारी घोषणा स्वामी अग्निवेश जी और सैकडों की उपस्थिति में होने के बाद मुक्त होकर हम पहले पहुंचे थे, मणिबेली में ही!

मणिबेली सत्याग्रह पर पहली-पहली अत्याचार की घटना भी पीड़ादायक थी। सत्याग्रह की झोपड़ी सी खड़ी करते हुए मात्र 11 लोगों की एक टुकड़ी ने वहाँ बैठने-रहने के लिए गाँव में ही रैली निकाली तो धुले के आज के युवा संपादक निखिल सूर्यवंशी, निमाड़ के बुजुर्ग किसान सीताराम भाई, मुंबई की पर्यावरणवादी मोना पत्राव आदि के इस मिश्रित सत्याग्रही दल पर जबरदस्त लाठी चार्ज हुआ। लेकिन हर साल वह सत्याग्रह 1991 से 1993 तक चला और वहाँ डूब आने पर सैकड़ो पुलिस को घेरने की कार्यवाही के साथ चला। डूब से चुनौती लेने देने वाले इन कार्यक्रमों के चलते अमृतसर स्वर्णमंदिर जैसे शूलपाणीश्वर मंदिर भी सैकड़ो पुलिस का पड़ाव बना रहा। महाराष्ट्र के साथ निमाड़, मध्यप्रदेश के मैदानी किसान भाई-बहन भी सारियां लगाकर सैकड़ों में सत्याग्रही बनकर रहते थे| चातुर्मास के चलते काशीमुनि जैसे संत भी आन्दोलन के सहयोगी बन जाते थे| उसी में पुलिस से सेमल्दा गाँव की दो आदिवासी युवतियों से बेइज्जती की घटना का भी हमें पीछा करना पड़ा था| हमारे भूमिगत रहते महेश शर्मा जैसा कार्यकर्ता रोज सुबह आदिवासी बनकर पैदल चलकर केवडिया पहुँचता था और उस वक्त माध्यमों की आज जैसी भरमार न होते हुए भी दूर तक खबर पहुँचती थी। एक दिन कई मीटिंग्स हमारे साथ करके तैयार हो चुकी मणिबेली की महिलाओं ने मिलकर अहिंसक हल्लाबोल के द्वारा पुलिस का सामान उनके समक्ष मंदिर से बाहर नीचे फेंक कर उन्हें भगा दिया था। उस वक्त माणिबेली के 40 पुरूष धुले या तलोदा जेल में थे और महिलाओं ने ही गाँव को सफल संघर्ष की चोटी पर पंहुचा दिया था ।

और एक घटना घटी जब पुलिस दल को छोड़कर शासनकर्ताओं ने गाँव के विभिन्न हिस्सों में आग लगायी थी। उन्हें बस मणिबेली गाँव खाली करवाना था। उस समय भी मणिबेली की ये महिलाएँ गाँवभर सैरवैर होकर पुलिसों का सामना करती रही और आखिर पुलिस की पीछे हार हुई। वामीपाडा की भील महिलाएं और हिंदु धर्म देवता मानने वाले तड़वी समाज की महिलाएँ मिलजुलकर यह अहिंसक संघर्ष चलाती हुई आज भी हमारी नजर में हैं। एक बार जीवनशाला के बच्चों ने भी कमाल किया था। महाराष्ट्र गुजरात की सीमा ‘देवनदी’ पार करके घुसती पुलिस को रोकने के संग्राम में मुझे वहीं उपवास पर उतरना पड़ा था। ठंड की कड़ी रात में अंगीठी जलाकर मै नदी पात्र के किनारे उबड़खाबड़ जमीन पर सोयी थी। जब अंधेरी रात में नींद खुली तो देखा, 40-50 बच्चे अक्षरश: वानरसेना बनकर आए थे। अपने नन्हे-नन्हे हाथों से पुलिस का बनाया मिटटी का रास्ता तोड़कर वे मिटटी के ढेकले उठाने में इसलिए अपनी बालशक्ति लगाये थे कि पुलिस की गाड़ियां दूसरे दिन सुबह नही आ पाए। उस वक्त आज की तरह सेल्फी अन फोटो, व्हाटसअप के हथियार या माध्यम नहीं थे वरना आज पेश करते, वह यादगार जीवित रखते! वैसे मणिबेली तो गवाह है ही!

शासन द्वारा पुलिसिया दबाव दमन के सब हथकंडे अपनाने के बाद एक दिन चुनीकाका वैध जी को सैकड़ों पुलिस मणिबेली में लेकर आयी| उनका कहना था कि गाँव के 11 परिवारों ने हमें लिखकर दिया है कि वे परवेरा वसाहट (गुजरात) में स्थलांतरित होना चाहते है| हमें अंदाजा था ही| हमने निर्णय लिया, ‘लोग विरुद्ध लोग’  की स्थिति पैदा नहीं होने देनी| हम उनके घरों के कवेलू, हमारे दिल के टुकड़े जैसे उतारते देखते रहे| गाँववासियों ने कुछ मदद की भी, पर मनमुटाव और दर्द के साथ| रमण दला, जो कि कुछ समय तक माणिबेली के, सत्याग्रही युवाओं को प्रौढ़ शिक्षा देते थे, क्योंकि कुछ थोड़े (तीसरी-चौथी तक) पढ़े हुए वे ही एक थे| उनका भी हट जाना दर्दनाक था| पर हमने सहन किया|पुलिस की गाड़ियाँ रोकने का कुछ छोटा सा प्रयास भी करना हुआ तो मेरे साथ हमारी साथी नंदिनी को भी खदेड़ने का पुलिस गाड़ी में डालकर देय हटाने का काम पुलिस ने किया ही! माणिबेली के उन 11 परिवारों के बाद एक भी परिवार, बिना वैकल्पिक जमीन और पुनर्वास के आज तक नहीं हटा| उस वक्त पुलिस बल पर उठे वे परिवार भी बाद में गुजरात बसाहटो की समस्याएँ लेकर आज तक हमारे साथ ही जुड़े हैं…….. गुजरात से हक़ दिलाने के लिए महाराष्ट्र शासन को बार-बार दस्तक देकर हम मजबूर करते रहे है|

 

मणिबेली की 1993 की पहली बड़ी डूब और  लोगों द्वारा किया गया उसका सामना, उस गाँव की अपूर्व ताकत का दर्शन था। 22 दिन की नन्ही बच्ची को लेकर हिरूबेन, सरपंच रहे नारायण भाई की पत्नी और सभी घर घर के परिवारजन, घर, मवेशी के डूबते और पानी के चढते हुए भी बैठे रहे। मणिलाल काका-जडीबेन की भैसें जो उनके बच्चों जैसी थी डूब गईं। नारायण भाई की दुकान भी डूब गयी। पूरा तड़वी पाडा डूबा तो 13 परिवार बेघर हो गये । इस स्थिति में सभी तड़वी परिवारों को भील-वसावा परिवारों ने सहारा दिया । उनके घर खड़े होने तक खाना खिलाया, सुलाया भी। यह आन्दोलन के लिए जातिवाद और वर्ग भेद तोड़ने का बड़ा मौका था। उसका हम सबने, समर्थकों ने, पत्रकारों ने भरपूर सम्मान  किया। लेकिन मणिबेली के संसू नुरया याने ढोरचार से शुरू होकर हमारी मांगों में भी ‘पुनर्वास गैरबराबरी कम करने की नीति में ताकत हो’, यह बात सम्मिलित हुई थी। मणिबेली में यही एक परिवार भूमिहीन था। हर गाँव में ऐसे दो-चार ढोरचार थे| गाव के ढोर (पशु) चराने के बदले उन्हें घर-घर से रोटी मिलती थी। घर के इर्द-गिर्द में कुछ गुंठा(आर) जमीन पर बीज बोते थे, वही उनकी खेती थी। ‘ढोरचार को पहले जमीन दो, फिर हमारी बात करो’ इस नारे के साथ मुद्दा जोर पकड़ा और आखिर महाराष्ट्र शासन से हर भूमिहीन को 1 हेक्टर जमीन देना मंजूर करवाया। बल्कि मध्य प्रदेश शासन नेभूमिहीनों को जमीन नहीं दी, फिर भी मच्छीमारों को सहकारी समितियों द्वारा मत्स्य व्यवसाय का, कुम्हारों को जमीन का, नाविकों को घाट पर पट्टे का और मजदूरों को विशेष अनुदान का हक भी हमने 2017 में संघर्ष से ही पाया।

 

दुनिया के मंच पर मणिबेली

1991/92 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की विश्वबैंक से नियुक्त मोर्स समिति का मणिबेली में पधारना एक विशेष घटना थी। यूएनडीपी जैसी वैश्विक संस्था के उपाध्यक्ष रहे ब्रॅडफोर्ड मोर्स इस समिति के अध्यक्ष और कनाडा के न्यायाधीश थॉमस बर्जर उपाध्यक्ष थे । समिति के अन्य सदस्य थे, ब्रिटन के अंथ्रपोलोजिस्ट ह्यू ब्रांडी और अमरीका के पर्यावरणविद गॅम्बलर। समिति का मणिबेली में पहला दौरा था। वृद्धत्व में भी अपना गांधीवाद और हमारे जैसे कार्य और कार्यकर्ताओं के लिए साधुवाद सुरक्षित रखने वाले सिध्दराज जी ढ्डढा, हमारी वर्षो की सहयोगी साथी परवीन बहन, मेरी मां इन्दूताई और कई साथी, समर्थक, बरसात में बसों के बंद रहने से या गुजरात शासन से रोकी जाने से, तकरीबन 10 किमी चलकर नदी किनारे पहुंचे और इसे बोट से पार करके वे मणिबेली पहुँचे थे। लोगों के सवाल-जवाब मोर्स समिति को और सारे सहयोगियों को हमारी संगठन और प्रबोधन की ताकत का एहसास निश्चित ही देकर गये थे। मोर्स समिति की यह रिपोर्ट (1993) दुनिया के विकास मॉडल और गुजरात मॉडल की कड़ी समीक्षा और विश्व बैंक पर सटीक टिप्पणी है और बड़े बांधों की पोलखोल भी। उससे विश्व बैंक ने सरदार सरोवर को एक प्रकार से विनाशकारी और अनायोजित घोषित करते हुए अपनी आर्थिक सहायता आधे पर रोक दी। जाने माने विषेशज्ञ भी मणिबेली को नहीं भूल सकते थे ।

 

मणिबेली के और नर्मदा घाटी के इस संघर्ष की खबर और चर्चा दुनिया में नहीं होती तो ही नवल! 1998 में विश्व बैंक की 50 साल पूर्ति के मौके पर उनकी साहूकारी से देश-देश में हुई घुसपैठ, विस्थापन, विनाश, कानून-नीति में बदलाव आदि मुद्दों को लेकर चेतावनी कार्यक्रम हुआ था स्पेन के मैड्रिड शहर में| दुनिया के 2000 संगठनों ने मिलकर जो मेमोरेंडम – ज्ञापन रखा था, मानो एक संकल्प पत्र, उसका नाम था, माणिबेली डिक्लेरेशन यानि घोषणा!

इसी का आधार लेकर मनमोहन सिंह जी “हमारे देश के चंद लोग विश्व बैंक का विरोध कर रहे है, लेकिन हम बैंक के साथ हैं”, यह बयान दुनिया के हजारों लोगों के प्रदर्शन के जवाब में दे रहे थे| तो मणिबेली घोषणा पत्र हाथ में लेकर मुझे बाहर इकट्ठे हुए दुनिया भर की सशक्त जनशक्ति को संबोधित करने का मौका मिला था| यह भी मणिबेली का सम्मान था| देश के नागरिकों को क्या, मणिबेली के गाँववासी, आदिवासियों को भी उससे अधिक मोल है, अपनी धरती और आसमान का!

महाकाय परियोजना की कानूनी और मैदानी लड़ाई का, शासनकर्ताओं के झूठे दावों की चुनौती का सामना करना इतना जटिल है कि आदिवासियों की एकता, समरसता, जीवटता और हिम्मत, आन्दोलनकारी मार्ग और मार्गदर्शकों पर अटूट विश्वास आदि सबके बावजूद आसानी से मंजिल हासिल नहीं होती है। मणिबेली तो शासनकर्ताओं ने आधी डूबाकर छोड़ी है| बसाये हुए परिवारों को कई जगह बिखेरकर छोड़ा है। जैसे गुजरात के वडगाम और गधेर गाँव को भी। और तो और, मणिबेली के वलसंग को मतदाता के रूप में ही नहीं मतदान की राजनीति में याद करते हुए कहा जाता है, महाराष्ट्र में डूब गया तो गुजरात की सेवाओं का सहारा मिला। वाह रे वाह! गुजरात में, गुजरात की हठधर्मिता और कच्छ सौराष्ट्र के सूखे की प्राथमिकता का आधार दिखाकर वड़संग का उसके पिता का दादा-दादी का घर डूबाया, खेत डूबोया, गाँव जंगल का विनाश लाया। इस पर कुछ नही सोचेंगे माध्यमकर्ता? और तो और जो नई पीढ़ी उभरी है मणिबेली से और पुरानी भी आज तक जिद लेकर, डटकर हक मांग रही है, उन्हें नहीं देखेंगे आम नागरिक? राजनेताओं में नरेन्द्र मोदी सरकार ने जबरन सरदार सरोवर के गेट्स बंद किये, मात्र नर्मदा में बाढ़ की डूब न आने से कुछ बची है घाटी नहीं तो लुप्त हो जाती।

जीवनशाला से निर्माण

मणिबेली का यह लम्बा संघर्ष का दौर रहा, वैसे ही जीवन शाला के रूप में निर्माण का भी। चिमलखेड़ी में शुरू हुई पहली जीवनशाला । बच्चों ने पुलिस की ही बार्ज पर चढ़कर, केवडिया तक और वहाँ से नंदुरबार जिले के अक्कलकुआ तहसील तक दरमजल करते हुए, तहसीलदार कचहरी पर ही पूरे दो महीने शाला चलायी। आखिर शासन को झुकाया और मणिबेली में शाला बनवाकर माने । लेकिन मणिबेली की शाला फिर डूबी… गाँव ने फिर खड़े किये कुछ कमरे| बच्चों के, शिक्षकों के बहुत कुछ सहने के बाद फिर शासन ने बाँध दी पत्रे की शाला, जिसे देखकर आज भी हैरान होते हैं कलेक्टर भी… पर कुछ बच्चे, युवा पेंटर्स ने सजायी यह शाला आज भी न केवल 100 से अधिक बच्चों की शिक्षा का, बल्कि इससे 25 सालों में निकल चुके पहली शिक्षित पीढ़ी के सैकड़ों बच्चों के शिक्षा और विकास का केन्द्र बनी हुई है। इस शाला की पहली बैच का विधार्थी संघर्ष में शामिल और आज सहकारी समितियों का मत्स्य व्यवसाय कारोबार सम्हालने वाला सियाराम पाडवी कार्यरत है। दिनेश दामण और नरपत वलसंग वसावे मणिबेली का केज कल्चर का मत्स्य व्यवसाय संभाल रहे हैं । आन्दोलन के द्वारा पाया यह हक उनकी जमीनें डूबने पर नवरोजगार का साधन है।

आज भी जारी है मणिबेली की ये लड़ाई और चुनौती भी!

लेखिका नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री और प्रसिद्द पर्यावरणविद हैं|

सम्पर्क- +919423965153, medha.narmada@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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