नाटक

मुख्यधारा के रंगमंच का असली चेहरा – राजेश कुमार

 

  • राजेश कुमार

 

रंगमंच के विभिन्न प्रकारों की चर्चा होती है तो संस्कृत रंगमंच, ग्रीक रंगमंच, पाश्चात्य रंगमंच, पारसी रंगमंच, मनोशारीरिक रंगमंच, यथार्थवादी रंगमंच, तीसरा रंगमंच जैसे  नाम तत्काल स्मरण में आते हैं। लेकिन इनदिनों रंगमंच के गलियारों से एक नया नाम दबे – फुसफुसे रूप में सुनने को मिल रहा है जो न रंगमंच के किसी ग्रंथों, किताबों के पन्नों में दिखाई देता है, न रंग आलोचना – समालोचना के किसी कोने या सरकारी नाट्य संस्थानों के किसी गलियारे – चबूतरों के इर्द – गिर्द।

इस रंगमंच का नाम ‘ब्राह्मणवादी रंगमंच‘ है। राजनीतिक हलकों में यह नया शब्द नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में तो कई वर्षों से प्रचलन में है। अलबत्ता नाटक के लोगों के लिए नया, ताजा शब्द जरूर है। रंगजगत में अभी ज्यादा इस्तेमाल नहीं हुआ है इसलिए हो सकता है कि किसी – किसी को यह शब्द चावल में कंकड़ की तरह किरकिरा भी लगे। अस्मिता थिएटर ग्रुप के निर्देशक अरविंद गौड़ ने तो समकालीन रंगमंच के जनवरी – जून 2016 अंक में ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द का इस्तेमाल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के खिलाफ जमकर किया।

उक्त लेख में अरविंद गौड़ कहते हैं कि ‘जैसे एक जमाने में कहा जाता था कि आप आर्यन रक्त हैं, शुद्ध रक्त वाले हैं और बाकी यहूदी और आप राज करने के लिए निकल पड़ते हैं। इसी तरह की विशिष्टता अब नाट्य संस्थानों व सरकारी अकादमियों से जुड़े रंगकर्मियों के अंदर घर कर गयी है। उनको लगता है कि हम जो कर रहे हैं वहीं श्रेष्ठ है, वही मानक है। हम जो बोल रहे हैं वही सच है। ब्राह्मणवाद के इसी गढ़ को बचाये रखने के लिए विगत साठ सालों में हिदुस्तान में और प्रशिक्षण संस्थान खुलने नहीं दिए गये। वे आज तक नहीं खुल पाए क्योंकि आप रेसिस्ट हैं। जैसे शूद्रों को गीत नहीं सुनना चाहिए, इसलिए उनके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल देते थे, बिल्कुल इसी प्रकार आप जो प्रशिक्षण दे रहे हैं वही अंतिम है और बाकी लोगों को को उसे नहीं सुनना – सीखना चाहिए, इसके लिए आप जिनको प्रशिक्षण देते हैं, उनके अंदर एक ब्राह्मणवादी श्रेष्ठताबोध उतपन्न करते हैं। यह बहुत ही नकारात्मक दृष्टिकोण है, यह सामंती दृष्टिकोण है कि हमारे पास जो है वह दूसरों के पास नहीं होना चाहिए। इसकी वजह से डिसेंट्रलाइजेशन हुआ होता तो ये किले टूटते , किलेबंदी टूटती, वह आर्यवादी – सवर्णवादी व्यूह टूट जाता जो आज तक कायम है।’

समकालीन रंगमंच के सम्पादक और नया रंगविमर्श व्हाट्सएप्प ग्रुप के एडमिन राजेश चंद्र ने भी अपने लेखों और पोस्टों से तार्किक रूप से तर्क पुष्टि कर दी तो लग गया कि भारतीय रंगमंच का असली चेहरा यही है। इस सम्बन्ध में उनका भी यही मानना है कि ’रंगमंच का ब्राह्मणवाद भी वही है जो जीवन के दूसरे क्षेत्रों में परिलक्षित होता है। मैं सबसे खास और विशिष्ट हूँ तथा बाकी सब मुझसे हीन या कमतर है – यह बोध ही ब्राह्मणवाद है। उसे केवल जाति में सीमित करने से हम उसे संपूर्णता में नहीं समझ सकते। थिएटर में ब्राह्मणवाद की पहचान जिन लक्षणों के आधार पर की जा सकती है, वे कोई अभी नही उपजे। यह मानदंड साहित्य से लेकर तमाम कला विधाओं पर लागू है। आप खुद इन लक्षणों पर विचार कीजिये और सोचिए कि ब्राह्मणवाद ने आज रंगमंच पर कैसा प्रभुत्व स्थापित किया हुआ है। ये कैसी धारणा है कि जिन्हें हम चुन लेते हैं, प्रशिक्षण देते हैं, वही रंगकर्मी हैं, वही थिएटर को समझ सकता है। बाकी सब अमैच्चोर और अप्रिशिक्षित हैं। जिन्हें हम भारत रंग महोत्सव में शामिल कर लेते हैं, वे प्रस्तुतियाँ कलात्मक मानदंडों पर श्रेष्ठ होती है। वे ही निर्देशक, अभिनेता या डिज़ाइनर श्रेष्ठ है जिन्हें भारत रंग महोत्सव में शामिल होने का मौका मिला है। या जो किसी रूप में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े हुए हैं। वे ही समीक्षक श्रेष्ठ हैं जो रानावि कि महानतम प्रस्तुतियों की समीक्षा करते हैं। वे ही वास्तव में नाटककार माने जाते हैं जिनके नाटक रानावि में मंचित हुए हैं या होते हैं। रानावि चारदीवारी से बाहर के रंग समूहों को, रंगकर्मियों को अछूत और हीन मानता है, इसलिए वह उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, किसी आयोजन में नहीं बुलाता। यही विशिष्टता बोध दम्भ और छुआछूत तो ब्राह्मणवाद है।’

आखिर ‘ब्राह्मणवादी रंगमंच’ है क्या बला जिसका नाम आते कुछ लोग गुस्से से अपना विवेक खो दे रहे हैं तो कुछ  अपने तर्कों के साथ डटे हुए हैं?

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इन प्रश्नों का जवाब ढूंढने के लिए पहले ब्राह्मणवाद पर एक नजर डाल लेना जरूरी है। कुछ लोग अक्सर ‘ब्राह्मण’ और ‘ब्राह्मणवाद’ को लेकर कन्फ्यूज़न पैदा कर देते हैं। ‘ब्राह्मण’ और ‘ब्राह्मणवाद’ दो अलग – अलग शब्द हैं। अक्सर दोनों शब्दों को एक मान लेते है जिसके कारण भरम उत्पन्न करते हैं। वर्ण व्यवस्था के चार वर्णों में एक वर्ण है ब्राह्मण। जैसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अन्य वर्ण हैं। इसमें कोई शक नहीं कि ब्राह्मण से ही ब्राह्मणवाद शब्द निकलकर आया है। वर्ण – जाति आधारित वह व्यवस्था जिसमें वर्ण – जाति के आधार पर ऊँच – नीच का एक पिरामिड है, जिसके शीर्ष पर ब्राह्मण है तो नीचे अतिशूद्र या ‘अछूत’, जिन्हें आज दलित कहते हैं। जो वर्णव्यवस्था आज वजूद में है, वर्षों पहले जब बनाई गयी थी, उसमें ब्राह्मणों की केंद्रीय भूमिका थी। भले सत्ता के केंद्र में प्रत्यक्ष रूप में नहीं थे, लेकिन यह भी सत्य है कि सत्ता और धर्म के बीच गहरा, अटूट सम्बन्ध रहा है। बल्कि धर्म के द्वारा ही सत्ता संचालित होता रहा है। उस काल में ऐसे कई ग्रंथों की रचना की गई जिसमें विभिन्न वर्णो के कर्तव्य और सीमाएँ रेखांकित व निर्देशित हैं। ‘मनुस्मृति’ में वर्ण और जाति व्यवस्था के नियमों और अधिकारों एवं कर्तव्यों को सबसे व्यापक, व्यवस्थित और आक्रामक तरीके से प्रस्तुत किया गया है जिसके चलते इसे ‘मनुवादी व्यवस्था’ भी कहा जाता है।

और इस मनुवादी या कहिए ब्राह्मणवादी संस्कृति की बुनियादी विशेषता ये है कि श्रम, विशेषकर शारारिक श्रम करनेवालों से घृणा करना। कौन – कौन कितना और किस प्रकार का शारारिक श्रम करता है, उसी से तय होता है कि वह कितना नीच है। इस विशेषता का दूसरा पहलू यह है कि जो व्यक्ति शारारिक श्रम से जितना दूर है अर्थात जितना परजीवी है, वह उतना ही महान और श्रेष्ठ है। इसके साथ मनुवादी – ब्राह्मणवादी संस्कृति की एक और विशेषता है कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के समान नहीं हो सकता अर्थात समानता की अवधारणा का पूर्ण निषेध। चार वर्णों में सभी एक दूसरे से ऊँच – नीच हैं। चारों वर्णों में शामिल हज़ारों जातियाँ एक दूसरे से ऊँच – नीच हैं। परिवार में ऊँच – नीच का श्रेणी क्रम बना हुआ है। सबसे निचली कही जानेवाली जातियों में भी ये मानसिकता बनी रहती है, ब्राह्मणवाद की यह मूल व्याख्या है। और ये जितना धर्म में लागू होता है, रंगमंच में भी उतना ही।

चूंकि आजकल राजनीति और धर्म में काफी घालमेल हो गया है, इस संदर्भ में ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द का प्रचलन भी काफी बढ़ा है। कुछ लोग जो इस शब्द को एक वर्ण से जोड़ लेते हैं, निजी स्तर पर आहत दिखते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि इस शब्द के बहाने सीधे उनके वर्ण – जाति पर अटैक किया जा रहा है। इसलिए जहाँ ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द की चर्चा होती है, उन्हें अनर्गल, अलगाव जैसा लगता है। इस संदर्भ में 1927 की वो महत्वपूर्ण तथ्य को उद्धृत करने की जरूरत है जब दलित आन्दोलन के युवा नेता दिनकर राव जावलकर तथा केशवराव जेधे ने यह मांग रख दी कि आगामी सत्याग्रह में किसी भी ब्राह्मण को भाग लेने की अनुमति न दी जाय। इस पर अम्बेडकर ने अपनी प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि ‘उनका आन्दोलन ब्राह्मणों के खिलाफ न होकर ‘ब्राह्मणवादी धर्म’ के खिलाफ है। हम ब्राह्मणों के नहीं, बल्कि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध हैं।’ अपने विचार को उन्होंने और स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘ हमारी लड़ाई ब्राह्मण से हरगिज नहीं है, ब्राह्मणवाद से है जो समाज का सबसे बड़ा दुश्मन है। अपने भारत देश में बहुतायत ब्राह्मण जन हैं जो ब्राह्मणवाद से खुद नफरत करते हैं। हाँ, लेकिन कटु सत्य है कि पूरा भारत ब्राह्मणवाद से ग्रसित है।’

जो लोग ब्राह्मणवाद को ब्राह्मण जाति से जोड़कर देखते हैं, उस संदर्भ में अंबेडकर का कहना है कि ‘ ब्राह्मणवाद से मेरा मतलब स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना से वंचित रखना है…( ऐसी भावना केवल ब्राह्मणों में ही नहीं बल्कि सभी वर्गों में व्याप्त है हालांकि ब्राह्मणों ने इसकी शुरुआत की थी। ) अर्थात अम्बेडकर साफ शब्दों में कहते हैं कि ब्राह्मणवाद विरोधी आन्दोलन के निशाने पर कोई जाति विशेष या व्यक्ति नहीं है बल्कि पूरी ब्राह्मणवादी व्यवस्था है जिसके जहर का शिकार पूरा भारतीय समाज है और इसने हिंदुओं को विशेष तौर पर मानसिक रूप में बीमार बना दिया है।

अम्बेडकर ने सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त ब्राह्मणवाद को जिस तरह चिन्हित किया, उसी के परिपेक्ष्य में भारतीय रंगमंच को भी मौजूदा हालात में विश्लेषण करने की जरूरत है। रंगमंच के किसी कोने से अगर ‘ब्राह्मणवादी रंगमंच’ के अस्तित्व की चर्चा हो रही है तो केवल फतवे से उसे खारिज करने के बजाय जमीनी स्तर पर जाँच – पड़ताल करने की जरूरत है?

डॉ. रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक ’भारतीय साहित्य की भूमिका’ में लिखते हैं – ‘मनुस्मृति में हम गीत, वाद्य और नृत्य से आजीविका का निषेध देखते हैं तथा व्यवस्था पाते हैं कि सवर्णों को गीत, वाद्य और नृत्य से आजीविका उपार्जन नहीं करना चाहिए।’ ‘मनुस्मृति’ सूत, मागधों और नटों को वर्णसंकरता का परिणाम बताती है। सिर्फ मनु ही नहीं बल्कि और भी धर्मज्ञाताओं ने शूद्रों के लिए मनु शैली ही अपनायी। उन्होंने सुझाव दिया कि उन्हें रंगमंच के अभिनेताओं के भोजन नहीं करना चाहिए। विष्णु के ‘विष्णुस्मृति’ में अभिनेताओं की उत्पत्ति को शूद्रों और वैश्य कन्याओं से जोड़ा गया। ‘मनुस्मृति’ में मनु ने नटों और मल्लों के पेशे को सबसे नीच माना और ब्राह्मणों को अभिनेता बनने से वर्जित किया। इसी तर्ज पर ‘महाभाष्य’ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले अभिनेताओं की पत्नियों को गिरी नैतिकता की माना गया और ब्राह्मणों को सलाह दी गयी कि ये उनसे दूर रहे। नाटक करने वालों की स्त्रियाँ एक प्राचीन संस्कृत श्लोक के अनुसार पराये पुरुषों के साथ इस प्रकार लगी हुई थी, जिस प्रकार वर्णों के साथ मात्राएँ। कौटिल्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में नट – नटियों की आचारहीनता की ओर संकेत किया है और नगरपालिकाओं तथा पंचायतों पर जोर डाला है कि वे नटों – बाजीगरों और तमाशा करने वालों को नगर के समीप न फटकने दें। इनके लिए नगर के बाहर ही बस्ती बनायी जाए। अर्थशास्त्र में ही नाट्यशास्त्रों का विरोध करते हुए यह भी लिखा गया है कि ये गॉवों में नहीं बनाई जानी चाहिए क्योंकि इससे ग्रामीणों के काम में बाधा पहुँचती है।

मनु, याज्ञवल्क्य से लेकर कौटिल्य तक न जाने कितने ऋषियों – ब्राह्मणों ने आदिवासियों – दलितों के लोक रंगमंच के बारे जो – जो कहा है, लिखा है; वो आपत्तिजनक ही नहीं, सर्वथा निंदनीय है। उनके अभिनेताओं और उनके आचरणों के सम्बन्ध में जो टिपण्णी की गई है वो साफ तौर पर ब्राह्मणवादी मानसिकता के आधार पर की गई है। संस्कृत नाटकों में अभिनय करनेवाले सवर्ण आभिनेताओं के बारे में मनु और याज्ञवल्क्य कुछ नही बोलते हैं पर लोक रंगमंच पर कार्य करनेवाले शूद्र अभिनेताओं को लेकर ब्राह्मणों को सुझाव देते हैं कि उन्हें इनका भोजन स्वीकार नहीं करना चाहिए। ‘मनुस्मृति’ में मनु ने नटों और मल्लों के पेशे को सबसे नीच माना है। ‘महाभाष्य’ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले आभिनेताओं की पत्नियों को गिरी नैतिकता की माना गया और ब्राह्मणों को उनसे दूर रहने की सलाह दी है। कौटिल्य का ब्राह्मणवाद तो ‘अर्थशास्त्र’ में खुलकर आ जाता है। वे नट – नटियों की आचारहीनता की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि इन्हें नगर के समीप फटकने न दें। इनके लिए नगर के बाहर ही बस्ती बनायी जाये।

इस तथ्य से कुछ लोग सहमत न हो, लेकिन वर्तमान में मुख्यधारा का जो रंगमंच हमारे बीच मौजूद है, वो घोर ब्राह्मणवादी, मर्दवादी, सवर्णवादी और जातिवादी है। असल में मेनस्ट्रीम का थिएटर जैसा दिखता है, अंदर से है नहीं। मुख्यधारा के रंगमंच के जो प्रतिनिधि , प्रशंसित और बहुमंचित नाटक हैं, पायेंगे कि उनमें अधिकतर उच्च मध्यवर्गीय परिवार के इर्द – गिर्द घूमती हुई है। अभिजात्य लोगों की कुंठा, त्रास, तनाव पर फोकस है। इससे इतर एक बहुत बड़ी आबादी जिसने आज़ादी के बाद सोचा था कि उनके दिन फिरेंगे, श्रम का वाजिब दाम मिलेगा, शिक्षा – स्वास्थ्य – रोजगार उनके नसीब में होगा… ऐसे सवाल, जुझारू किरदार नाटकों से गायब हैं।

हमारा समाज और धर्म ही वर्णव्यस्था पर टिकी हुई है तो हमारा रंगमंच वर्ण – जाति से अप्रभावित कैसे रह सकता है? ब्राह्मण वर्ण को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए मनुसमृति और उसी तरह की दर्जनों ब्राह्मणी साहित्य रची जा सकती है तो उसके उन्मूलन, विरोध में अगर दलित साहित्य, दलित रंगमंच वजूद में आता है तो ये कोई अस्वाभाविक प्रक्रिया है? देश में करोड़ों की संख्या में दलित हैं तो उनका साहित्य, नाटक अलग कैसे नहीं होगा? उनकी संस्कृति भिन्न क्यों नहीं होगी? आज पारसी नाटक से हिदी समाज पूरी तरह से परिचित है, लेकिन उसी के समकालीन ज्योतिबाराव फुले के नाटकों के बारे में कितने लोग जानते हैं? फुले ने ‘तृतीय रत्न‘ नाटक में समाज में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीति, अस्पृश्यता को रेखांकित करते हुए ब्राह्मणवाद पर जिस तरह निर्मम प्रहार किया था, उस पर नाटक के आलोचकों ने कितना लिखा है? अम्बेडकर के समकालीन अछूतानंद ‘हरिहर’ ने हिन्दी प्रदेश में कानपुर की नौटंकी शैली में आधे दर्जन नाटकों का लेखन किया, देहातों में जा – जाकर दलित सवालों पर नाटक किया, इसको जिस तरह से नजरअंदाज किया गया है, उस पर विचार करने की जरूरत है। वर्णव्यवस्था से लड़नेवाले नायक रैदास, फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार जैसे दलित नायकों पर अगर नाटक नहीं लिखे जा रहे हैं , किसानों की आत्महत्या और जंगलों से विस्थापित आदिवासियों पर खामोशी है तो कुछ न कुछ तो कारण होगा ही? कारण वही है जो पहले था। उनका मानना है कि अगर जात – पात, अस्पृश्यता, निम्न जाति के लोगों के रहन – सहन, बोली को दिखाने – सुनाने लगे तो नाटक के प्रति लोगों की थोड़ी – बहुत जो रुचि बची हुई है; वो भी गर्त में  चली जायेगी। नाटक का जो सौंदर्यशास्त्र बचा हुआ है, स्वाहा हो जाएगा। सामाजिक जीवन में ये दलित – आदिवासी आरक्षण, दलित एक्ट, गौ हत्या के बहाने तो तबाही मचाये ही हुए है, अब मंच पर आकर फिर से दैत्यराज विरुपाक्ष की तरह उत्पात मचाना शुरू कर देंगे।

लेकिन उन्हें पता होना चाहिए अब जर्जर करने के लिए केवल इंद्र ही काफी नहीं हैं। तमाम देवता गण, ऋषि – मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को लामबंध होना होगा। और ब्रह्मा ने इस बार सरस्वती को फरमान जारी कर दिया है कि अब एक ऐसा ब्राह्मणवादी रंगमंच का सृजन करे जहाँ प्रतिरोध का एक परिंदा भी पर न मार सके।

लेखक धारा के विरुद्ध चलकर भारतीय रंगमंच को संघर्ष के मोर्चे पर लाने वाले अभिनेता,निर्देशक और नाटककार जो हाशिये के लोगों के पुरजोर समर्थक हैं.  +919453737307,  rajeshkr1101@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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