मैं कहता आँखन देखी

अयोध्या का सवाल और भारतीय मीडिया का रक्त चरित्र

 

  •  नवल किशोर कुमार

 

एक बार फिर इतिहास लिखा जा रहा है। इस बार इतिहास कोई इतिहासकार नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट में वकील और न्यायाधीश मिलकर तय कर रहे हैं। जाहिर तौर पर यह सवाल तो बनता ही है कि आखिर किसका और कैसा इतिहास लिखा जा रहा है? क्या अदालत का काम इतिहास लिखना है? या फिर अदालत की जिम्मेवारियों में धार्मिक प्रवचन देना शामिल है? या फिर उसे साक्ष्यों के आधार पर न्यायादेश देना होता है?

दरअसल, अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का रूख फिलहाल स्पष्ट नहीं हो रहा है। अखबारों में अदालती जिरह की जो खबरें छापी/छपवायी जा रही हैं, उनसे बह रही बयार और उसकी दिशा का पता चलता है। मसलन, आज ही दैनिक जागरण नामक एक दक्षिणपंथी अखबार ने जिस तरह से खबरें परोसी हैं, वे उन्माद फैला सकती हैं। अखबार ने अपने हिसाब से फैसला सुना दिया है कि चाहे कुछ भी हो, अयोध्या पर कब्जा तो हिन्दुओं का ही होगा। यह हालत तब है जब भारत सरकार की अपनी एजेंसी न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स ऑथोरिटी (एनबीएसए) ने एक एडवाइजरी जारी कर रखी है। इसके मुताबिक, अदालती कार्यवाही को लेकर अपनी तरफ से कोई व्याख्या न प्रकाशित करें, बाबरी मस्जिस के विध्वंस की तस्वीर न प्रकाशित करें, किसी तरीके के उत्सव की कोई खबर प्रकाशित न करें और न्यूज चैनलों के लिए खास निर्देश यह भी कि कोई ऐसा डिबेट न कराएं जिसमें अतिवादिता हो।

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जाहिर तौर पर एनबीएसए की एडवाइजरी का मान रखा जाना चाहिए। लेकिन न केवल दैनिक जागरण बल्कि दिल्ली से प्रकाशित पंजाब केसरी, हिन्दुस्तान आदि हिन्दी अखबारों ने एडवाइरजरी को दरकिनार किया है। आजतक नामक एक न्यूज चैनल ने कल एक खबर प्रसारित किया है। शीर्षक है – भगवान राम के ससुराल जनकपुर में अयोध्या केस पर फैसले का बेसब्री से इंतजार। मिथकीय कहानियों को इतिहास का चोला पहनाने वाली यह खबर तो महज एक बानगी है। कल दो खबरें हवा में फैलायी गयीं। यह काम लगभग सभी न्यूज चैनलों ने किया। सोशल मीडिया पर भी ये दोनों खबरें ट्र्रेंड कर रही थीं। पहली खबर यह कि मुस्लिम पक्ष के लोगों ने अपना दावा वापस ले लिया है और दूसरी यह कि मुस्लिम पक्ष के हिंदू वकील ने हिंदू पक्ष के वकील के हाथ से कोई नक्शा छीनकर फाड़ दिया है और मुख्य न्यायाधीश गुस्से से तिलमिला उठे।

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भारतीय मीडिया ऐसा क्यों कर रही है, इसके कारणों की कोई कमी नहीं है। लेकिन इसके मूल में जायें तो आप पाएंगे कि भारतीय मीडिया की बुनियाद ही संविधान विरोधी है। वह धर्मनिरपेक्ष नहीं है। मीडिया जाति निरपेक्ष भी नहीं और यहां तक कि वर्ग निरपेक्ष भी नहीं। हर मीडिया संस्थान के पास एक निश्चित सांचा है जिसमें डालकर खबरों को आकार दिया जाता है। अभी हाल ही में ऑक्सफेम इंडियान और न्यूज लांड्री ने अपनी सर्वे रिपोर्ट “हू टेल्स आवर स्टोरीीज मैटर्स’ में बताया है :
– अध्यनान्तर्गत समाचारपत्रों, टीवी न्यूज़ चैनलों, न्यूज़ वेबसाइटों और पत्रिकाओं में न्यूजरूम का नेतृत्व करने वाले 121 व्यक्तियों – मुख्य संपादकों, प्रबंध संपादकों, कार्यकारी संपादकों, ब्यूरो प्रमुखों व इनपुट/आउटपुट संपादकों – में से 106 पत्रकार ऊंची जातियों से थे. इनमें एक भी एससी या एसटी नहीं था.
– प्रमुख बहस कार्यक्रमों के हर चार एंकरों में तीन ऊँची जाति के थे. उनमें से एक भी दलित, आदिवासी या ओबीसी नहीं था.
– न्यूज़ चैनलों ने अपने प्रमुख बहस कार्याक्रमों में से 70 प्रतिशत में जिन पैनलिस्टों को आमंत्रित किया, उनमें से बहुसंख्यक ऊँची जातियों के थे.
– अंग्रेजी अख़बारों में प्रकाशित लेखों में से 5 प्रतिशत से अधिक दलितों और आदिवासियों द्वारा लिखित नहीं थे. हिंदी अख़बारों में स्थिति थोड़ी बेहतर थी. उनमें लगभग 10 प्रतिशत लेखों के लेखक इन वर्गों से थे.
– हिंदी और अंग्रेजी समाचार-पत्रों में जाति से जुड़े मुद्दों पर लिखने वालों में से आधे से अधिक ऊँची जातियों से थे.
– न्यूज़ वेबसाइटों पर प्रकाशित बाइलाइन लेखों में से 72 प्रतिशत के लेखक ऊँची जातियों के थे.
(इस पूरी रिपोर्ट को हिन्दी में फारवर्ड प्रेस के वेबसाइट पर https://www.forwardpress.in/2019/09/indian-media-cast-oxfam-india-and-newslaundry-hindi/ पढ़ा जा सकता है)

जाहिर तौर पर भारतीय मीडिया संस्थानों के रक्त चरित्र में मनुवादी सामाजिक व्यवस्था के कीटाणु हैं। इसलिए वे इसी आधार पर अपना काम करेंगे। फिर भी देश के सर्वोच्च अदालत से यह अपेक्षा है कि वह अपनी नैतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए कोई फैसला सुनाए जो उस देश के हित में हो जो न तो केवल हिन्दुओं का है और न मुसलमानों का।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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