मैं कहता आँखन देखी

भारतीय अकादमिक जगत की दुर्दशा

 

  • नवल किशोर कुमार

 

नरेंद्र मोदी सरकार के राज में नजारे केवल गांव-जवार और शहरों के ही नहीं बदले हैं, अकादमिक और बौद्धिक जगत भी गजब की उलटबांसी कर रहा है। अभी हाल ही एक खबर आयी। खबर यदि बिहार, झारखंड या उड़ीसा आदि राज्यों के किसी सुदूर गांव की होती तो माना जा सकता था कि सरकार को उन इलाकों में पहुंचने के अभी और समय की दरकार है। लेकिन यह खबर तो दिल्ली की है। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में गंभीर ब्रेन इंजरी (दिमागी चोट) के मरीजों का अनोखा इलाज किया गया। असमय मृत्यु से बचाव के लिए अस्पताल में वैदिक मंत्रों का जाप किया गया। और यह सब सरकार द्वारा प्रायोजित एक शोध के तहत हुआ।

 

यह एक उदाहरण है भारतीय बौद्धिक और अकादमिक जगत में आयी सड़न का। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इसके लिए 2014 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान या एम्स के तत्कालीन रेजिडेंट न्यूरोफार्मकलॉजिस्ट डॉ. अशोक कुमार ने “गंभीर ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी के बाद इन्टर्सेसरी प्रार्थना की भूमिका” के अध्ययन का प्रस्ताव दिया था। सनद रहे कि डा. अशोक कुमार कोई ओझा-भगत नहीं हैं। सामान्य भाषा में कहें तो  इन्टर्सेसरी प्रार्थना का मतलब ऐसी प्रार्थना से है जो मरीज के लिए की जाती है। उनके प्रस्ताव पर अस्पताल में महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जा रहा है जो प्राचीन हिंदू धार्मिक ग्रंथ ऋग्वेद का हिस्सा बताया जाता है। अपने शोध के जरिए डॉ. कुमार यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या गिरने, कार दुर्घटना या अन्य कारणों से दिमागी के गंभीर मामलों में इस मंत्र का जाप करने से मरीजों की हालत में सुधार आता है?

ऐसा नहीं है कि डा. अशोक कुमार यह सब चोरी-छिपे कर रहे हैं। इस अध्ययन को करने के लिए उन्होंने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद या आईसीएमआर में रिसर्च फेलोशिप के लिए आवेदन किया था। यह संस्था भारत में जैवचिकित्सा शोध प्रोत्साहन और निरूपण की सर्वोच्च संस्था है जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिनस्त है। मार्च 2016 में परिषद ने इस अध्ययन को मंजूर कर लिया और इसके लिए मासिक 28 हजार रुपए आवंटित कर दिए। मतलब यह कि इस तरह के शोध के लिए भारत सरकार पैसे दे रही है। वह भी उस शोध के लिए जिसे एम्स, दिल्ली की आचार समिति ने अवैज्ञानिक कहकर खारिज कर दिया था। लेकिन उनका यही प्रस्ताव राम मनोहर लोहिया अस्पताल की आचार समिति को पसंद आ गया।

खैर, आजकल डॉ. कुमार राम मनोहर लोहिया अस्पताल के न्यूरोसर्जरी विभाग में वरिष्ठ शोध फेलो हैं। वे मरीजों का इलाज महामृत्युंजय जाप से कर रहे हैं। उनके मुताबिक, “रामायण में लंका पहुंचने के लिए सेतु बनाने से पहले भगवान राम ने महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया था. इसी तरह प्राचीन भारत में जब सैनिक घायल हो जाते थे जो उन्हें ठीक करने के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता था।”

अब इसे आप क्या कहेंगे? पागलपन या फिर कुछ और? लेकिन जरा ठहरिए। यह केवल एकमात्र उदाहरण नहीं है। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद भी एक संस्थान है भारत सरकार का। यह संस्थान भी फेलोशिप देती है धर्म और दर्शन को लेकर शोध करने के लिए। पिछले वर्ष इस परिषद ने करीब 1817 लाख रुपए फेलोशिप के मद में बांटे। आइए, कुछ शोधों को देखते हैं जो परिषद द्वारा स्वीकार किए जा चुके हैं और कथित तौर पर शोध जारी है।

2017-18 में परिषद ने सुश्री संध्या कुमारी के इस शोध प्रस्ताव को मंजूरी दी जिसका शीर्षक है – पुरूषार्थ इन द कांटेक्स्ट ऑफ हेल्थ इन आयुर्वेद : ए स्टडी ऑफ मेडिकल इथिक्स। शीर्षक यह बताने के लिए काफी है कि परिषद किस तरह की वैज्ञानिक सोच रखता है। एक दूसरा उदाहरण देखिए। सुरेंद्र सिंह वीरे परिषद के पैसे से इस बात पर शोध कर रहे हैं कि वैदिक मंत्रों का मनुष्य के शरीर पर क्या असर पड़ता है और यह भी कि क्या इन मंत्रों से इलाज किया जा सकता है। उनके शोध का विषय है : ‘योग द्वारा मनोदैहिक आरोग्य एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य उत्कर्ष : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन।’

बहरहाल, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि जैसा राजा और जैसा उसका चरित्र होता है, सारी चीजें उसके हिसाब से ही बनती चली जाती हैं। इसलिए डा. अशोक कुमार जो कि एम्स, दिल्ली के सीनियर रेजीडेंट डाक्टर होने के बावजूद महामृत्युंजय मंत्र से मरीजों का इलाज कर रहे हैं, बेकसूर हैं। धर्मांधता और अज्ञानता के मानक सरकार तय करती है। सरकार चाहेगी तो गाय क्या, अन्य जानवरों के मल-मूत्र भी संजीवनी बूटी बन जाएगी। सबकुछ सरकार पर तय करता है। राजा यदि गोबर खाकर स्वस्थ रहने की बात कहेगा तो बाकी लोगों की क्या मजाल कि वे गोबर न खाएं और पेशाब का सेवन न करें।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  nawal4socialjustice@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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