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जन्मदिन विशेष : हर फिक्र को दरकिनार करके आगे बढ़ने वाला अदाकार

sablog.in डेस्क : ‘ना सुख है, ना दुख है, ना दिन है, ना दुनिया, ना इंसान, ना भगवान… सिर्फ मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं… मैं… सिर्फ मैं…’ साल 1965 में रिलीज हुई फिल्म ‘गाइड’ का यह डायलॉग आज भी उतना ही प्रासांगिक है, जितना सालों पहले हुआ करता था। दरअसल, आज भी भारतीय सिनेमा की बात होती है तो देवानंद का नाम जितनी खुशी से जुबान पर आता है, उतना शायद किसी और फिल्म स्टार का ना आए।

पंजाब (अब पाकिस्तान) के गुरदासपुर जिले में धरम देवदत्त पिशोरीमल आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को हुआ था। और, कितनी जल्दी वो बॉलीवुड की आंखों का तारा बन गए, यह कहना शायद संभव ना हो। अपना रास्ता खुद बनाया और सिल्वरस्क्रीन के जरिए दर्शकों के दिल पर राज करते जाने का हुनर सिर्फ देवानंद ही बखूबी जानते थे। देवानंद एक ऐसे अभिनेता हुए, जिन्होंने आलोचनाओं से परे अपनी एक संसार रची, जिसमें जिंदगी के हर रंग थे।

भले ही धरम देवदत्त पिशोरीमल आनंद को लोग देवानंद कहें, क्या फर्क पड़ता है, वो तो हिन्दी सिनेमा का वो ध्रुवतारा है, जो आज भी सिल्वरस्क्रीन के किसी कोने में चमकता दिखाई पड़ जाएगा। कहते हैं कि देवानंद 30 रूपये लेकर बंबई (अब मुंबई) आए थे। और, अपनी मेहनत के दम पर इस 30 रूपये को लाखों में तब्दील कर दिया। अपने ड्रेस सेंस के लिए प्रसिद्ध देवानंद काले कोट में जबरदस्त हैंडसम लगते थे।

लेकिन क्या देवानंद को यह सब इतनी आसानी से मिल गया। उन्होंने भी काफी संघर्ष किए। 1940 में घर से मुंबई पहुंचने के बाद देवानंद ने 165 रूपये मासिक वेतन पर काम शुरू किया। बाद में एक अकाउंटिंग फर्म में काम करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने भाई चेतन आनंद के साथ IPTA (Indian People’s Theatre Association) में काम शुरू किया। इस दौरान फिल्म ‘अछूत कन्या’ में अभिनेता अशोक कुमार का परफार्मेंस देखी और बंबई फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने का फैसला कर लिया।

जब देवानंद ने फिल्म के रोल के लिए प्रभात फिल्म्स स्टूडियो में पहला इंटरव्यू दिया तो सभी ने उन्हें पसंद किया। इंटरव्यू लेने वाले बाबू राव पाई ने कहा था कि ‘इस लड़के की आंख, हंसी और आत्मविश्वास मुझे काफी पसंद आई है।’ और बाबू राव सच थे, देवानंद की संवाद अदायगी हो या चेहरे के हावभाव, सभी आज भी हमारे दिल में बसे हुए हैं। फिल्मों में काम शुरू करने के कुछ साल बाद देवानंद और सुरैया के दिल तो मिलें, लेकिन किस्मत नहीं मिली।

दरअसल, मोहब्बत तो हुआ, मुकाम नहीं मिला। सुरैया ने हमेशा कुंवारी रहने का फैसला ले लिया तो देवानंद भी उनकी याद में जिंदगीभर तड़पते रहे। कई फिल्मों में देवानंद का अभिनय इसी का प्रमाण देता दिख जाता है। गुरूदत्त की फिल्म ‘बाजी’ में देवानंद और कल्पना कार्तिक की जोड़ी का रील से रीयल लाइफ में तब्दील होना, देवानंद की कोशिश थी, सुरैया की कमी को पूरा करने की। लेकिन, देवानंद हमेशा ढूंढते रहे, उस प्यार को, जो कभी उन्हें नहीं मिला।

फिल्मों से इतर देवानंद ने 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की थोपी गई इमरजेंसी का पुरजोर विरोध किया तो एक राजनीतिक पार्टी भी कुछ समय के लिए बनाई। जब फिल्म ‘हरे राम हरे कृष्ण’ के कलाकारों को चुन रहे थे तो, एक पार्टी में जीनत अमान से मुलाकात हुई। जीनत ने जिस लहजे से अपने बैग से सिगरेट निकालकर उन्हें दिया, उस पर देवानंद फिदा हो गए। और, बाद में जीनत ने फिल्म में देवानंद की बहन का रोल निभाया।

आंधियां, टैक्सी ड्राइवर, हाऊस नंबर 44, नौ दो ग्यारह, पॉकेट मार, मुनीम जी, फंटूश, पेइंग गेस्ट, सीआईडी, सोलवां साल, काला बाजार, बनारसी बाबू, छुपा रूस्तम, अमीर-गरीब, हीरा पन्ना, वारंट, डार्लिंग-डार्लिंग, उनकी कई फिल्में हैं तो कई पुरस्कार। लेकिन, देवानंद फिल्मों और पुरस्कारों से दूर निकलते जाते हैं। 2001 में पद्म भूषण सम्मान हो या 2002 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड, देवानंद को जितना मिला, उनके लिए कभी मायने नहीं रखता था। ‘रोमांसिंग विथ लाइफ’ किताब में देवानंद ने अपनी जिंदगी को दुनिया के सामने भी रखी।

लेकिन ‘गाइड’ एक ऐसी फिल्म रही, जिसने देवानंद को लॉर्जर दैन लाइफ इमेज दिया। वहीदा रहमान और देवानंद स्क्रीन पर इतनी खूबसूरत शायद पहले कभी नहीं लगे थे। देवानंद के लिए यह फिल्म काफी मायने रखती थी। यह फिल्म उनके दिल के बेहद करीब थी। लिहाजा उन्होंने फिल्म में खुद को ऐसा डूबो लिया कि आज भी देवानंद का नाम लेते ही राजू गाइड दिमाग में आ जाता है। कितने साल गुजर गए, देवानंद हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन आज भी ‘गाइड’ हमारे बीच है। भले ही फिल्म की शक्ल में क्यों ना हों, देवानंद आज भी कहते मिल जाते हैं।

”लगता है आज हर इच्छा पूरी होगी, पर मजा देखो, आज कोई इच्छा ही नहीं रही।”

(ये लेखक के अपने विचार  हैं।)

अभिषेक मिश्रा
(लेखक टीवी पत्रकार हैं।)
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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