मुद्दा

यौन आक्रमण से ख़ौफ़ज़दा भारत की बेटियां.. औऱ गांधी की उदात्त काम ऊर्जा

  • डॉ अजय खेमरिया
“मैं जिस यौन शिक्षा का समर्थन कर रहा हूं उसका ध्येय काम के आवेग को जीतना औऱ उसका उदात्तकरण करना है इस शिक्षा से बच्चों के मन मे अपने आप यह बात घर कर जानी चाहिये कि मनुष्य और पशु के बीच प्रकृति ने एक मौलिक भेद किया है वह यह कि मनुष्य में सोचने,समझने, रिश्तों को महसूस करने की विशिष्ट क्षमता है।”
महात्मा गांधी की यह बात आज भारत के लोकजीवन में इसलिये प्रासंगिक हो रही है क्योंकि इस देश में बचपन आज यौन आक्रमण से बुरी तरह भयाक्रान्त है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के ताजा आंकड़े उस भारतीय लोकजीवन की मर्यादाओं औऱ सयंमित प्रेरणाओं को कटघरे में खड़ा कर रहा है जिसने पूरी दुनिया को रिश्तों की परिभाषा दी। किशोर न्याय अधिनियम हो या पॉक्सो एक्ट के सख्त प्रावधान ऐसा लगता है काम आवेग के तिमिर ने मनुष्यता औऱ पशुता के उस प्रकृतिजनित भेद को ही समाप्त कर दिया है औऱ सभी कानूनी प्रावधान इस पशुता के आगे बेअसर हो रहे है। जाहिर है जिस यौन शिक्षा की वकालत महात्मा गांधी आज से 85 साल पहले महसूस कर रहे थे भारतीय समाज के लिये क्या वह उनकी समाजविज्ञानी के रूप में दूरदर्शिता को स्वयंसिद्ध नही कर रहा है। ताजा बाल यौन शोषण और अपराध के आंकड़े बताते है कि पिछले डेढ़ दशक में इनकी व्रद्धि दर 88.9 प्रतिशत रही है। इनमें बलात्कार के मामले तो 17.5  फीसदी के अनुपात से बढ़े है। मप्र, यूपी, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में बाल यौन शोषण के मामले बेहद ही डरावनी तस्वीर प्रस्तुत कर रहे है। मप्र में सबसे पहले 12 साल की बेटियों के बलात्कारियों को फांसी की सजा का कानून पारित किया गया लेकिन जो ताजा आंकड़े है वह बताते है कि मप्र में इस सख्त कानून की पहल के बाबजूद लोगो के ह्रदय औऱ मस्तिष्क में कोई ख़ौफ़ कायम नही हुआ है। बर्ष 2015 में मप्र बेटियों के साथ दुराचार औऱ शोषण के मामलों में प्रथम औऱ 2016 में यूपी के बाद दूसरे स्थान पर रहा है।
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बालिकाओं के साथ यौन अपराधों में 95 फीसदी  नजदीक के रिश्तेदार, परिचित, ही होते है जाहिर है यौन आक्रमणकारियों को कही दूर से नही आना पड़ रहा है वे बेटियों के इर्द गिर्द ही है उनके अपने ही है। सवाल यह है की सामाजिक रिश्तों की होली को ये हवा दे कौन रहा है? आज क्यों बेटियां अपने ही घर आंगन, खलिहान और मोहल्लों में असुरक्षित हो गई जो सामाजिक परकोटा उन्हें एक आत्मविश्वास और सम्मान का अहसास कराता था आज वही उनका आक्रमणकारी क्यों बन बैठा है? हमें याद है एक गांव की बेटी बगैर जातिभेद के विवाह बाद उस पूरे गांव की बेटी ही मानी जाती थी। कुछ और पीछे जाएंगे तो जिस गांव की बेटी पड़ोस के गांव में विवाही गई है तो पूरा गांव उस गांव में खाता पीता नही था क्योंकि बेटी के घर पीहर वालों का खाना मना था। आज समय का चक्र कैसे घूम गया…! घर में रिश्तों की मर्यादा वासना की बंधक नजर आ रही है। पड़ोसी, मित्र, रिश्तेदार सब संदिग्ध हो चुके है। सवाल यह है कि आखिर भारत के लोकजीवन में यह जहर भर कैसे रहा है? हकीकत तो यह है कि जिस विकास के रास्ते पर हम चल पड़े है उसके मूल में विषमता औऱ भेदभाव के बीज है। नई आर्थिक नीतियों के नाम पर जिस उपभोक्तावाद का उदय नागरिकवाद की जगह हुआ है उसने समाज में पैसे को मूल्यों की जगह स्थापित कर दिया। इसलिये नागरिक उपभोक्ता की तरह होकर रह गए जबकि भारत का लोकजीवन उपभोग के साथ दोहन का हामी रहा है।
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सहअस्तित्व उसकी आत्मा का आधार है। आज हम विकास के जिस रास्ते पर चल निकले है वहां मनुष्य और पशु के बीच का बुनियादी अंतर खत्म हो रहा है। महात्मा गांधी इस बात को बेहतर नजर से देख पा रहे थे इसलिए वह भारत मे काम आवेग के सकारात्मक विस्तार के पक्षधर थे। लेकिन गांधी की दूरदर्शिता को भारत के शासक वर्ग ने कभी समझने का प्रयास नही किया। आज आर्थिक नीतियाँ समाज मे खतरनाक हद तक विषमता खड़ी कर चुकी है शिक्षा नीति नागरिक नही सिर्फ कुंठा ग्रस्त इंसानों का  निर्माण कर रही है डिग्रीधारी महज सूचनाओं के अहंकारी पुतले भर है। संचार तकनीकी और डेटा को जो नया हथियार बताया जा रहा है असल मे वह भी भारत में बेटियों के लिये दुश्मन साबित हो रहा है। पिछले दिनों जगतगुरु जग्गी वासुदेव ने एक आईटी विशेषज्ञ से लाइव कार्यक्रम में पूछा कि लोग इंटरनेट पर क्या देखते है? उस विदेशी एक्सपर्ट ने जो बताया उससे यौन आक्रमणकारियों की दुनिया को समझा जा सकता है क्योंकि दुनियां में इंटरनेट यूज करने वाले 84 फीसदी लोग पोर्न देखते है। इस समय 43 लाख बेबसाइट से पोर्नोग्राफी दुनिया को परोसी जा रही है। हर 34 मिनिट में एक पोर्न मूवी बनाकर अपलोड कर दी जाती है। पिछले साल 4.6 अरब घण्टे लोगों ने इंटरनेट का उपयोग किया जिसमें से लगभग एक अरब घण्टे पोर्न देखा गया है। आज प्रति एक सेकेंड पोर्न देखने पर दुनिया मे 2 लाख 09 हजार रुपए खर्च कर रहे है लोग। विशेषज्ञ बताते है कि इस समय नग्नता का यह कारोबार 101 बिलियन डॉलर यानी 6.7 अरब रुपयों का है। समझा जा सकता है कि डेटा की ताकत कहां खर्च हो रही है। यह पोर्नोग्राफी की सीधी पहुँच जिस तरह  चुपचाप से हमारी  हर आमोखास चेतना में समा गई है उसने नारी को सिर्फ दैहिक रूप में ही हमारे सामने स्थापित कर दिया है सामाजिक  रिश्तों की बुनियाद पर शारीरिक सबन्ध की महत्ता को खड़ा कर दिया है। भारत के लोकजीवन में काम ऊर्जा का स्थान दिमाग की जगह शरीर मे था वह पुरुषार्थ के साथ सयुंक्त थी लेकिन डेटा की सस्ती पहुँच ने पहले हमें उपभोक्ता बनाया फिर काम को हमारे शरीर से निकालकर मस्तिष्क में स्थापित कर दिया है। यही कारण है कि आज नजदीकी रिश्तों में ही सर्वाधिक यौन आक्रमणकारी घुसे हुए है। महात्मा गाँधी इसी विकृति को नया आयाम देने की बात कर रहे थे उनकी यौन शिक्षा का आग्रह सेक्स को शरीर मे ही बनाये रखने की आवश्यकता को प्रतिपादित करता है। दुर्भाग्य से भारत मे यौन शिक्षा को लेकर कभी कोई नीति नही बनाई गई। घर के आसपास बेटियों के विरुद्ध यौन हमले के पीछे सेक्स को लेकर उत्कंठा तो ही साथ मे पोर्नोग्राफी ने पैदा की विकृति भी बड़ा कारण है।
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सरकार भारत के बचपन को ऐसे हमलों से बचाने के लिये पॉक्सो, जेजे एक्ट, जैसे सख्त कानून तो बना दिये लेकिन 43 लाख पोर्न साइटों को प्रतिबंधित करने की दिशा में कोई बुनियादी कदम नही  उठाया गया है। एक सर्वे के नतीजे बताते है कि मुंबई, बेंगलुरु, मद्रास, दिल्ली, अहमदाबाद, जैसे बड़े शहरों के नामी पब्लिक स्कूल के कक्षा 8 से 13 तक  78 फीसदी बच्चों ने पोर्न फिल्में देख ली होती है। सवाल यह है की यौन सबन्धों और प्राकृतिक शारीरिक बदलाव पर जब हमारे घर, स्कूल, आसपास  कहीं  कोई  स्वस्थ्य चर्चा तक नही होती है तब ये डेटा जो परोस रहा है उसके आधार पर हम समाज मे सयंमित यौन संव्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकते है?
 इस यौन आक्रमण की त्रासदी का एक पहलू औऱ भी है जिस पर ईमानदारी से चर्चा होनी चहिये वह है हमारी विषमता मूलक विकास लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता। आज पूंजीवाद के जरिये शांति, सद्भाव, औऱ समानता का लक्ष्य विफल हो चुका है सतत विकास 2030 की  चर्चा पूरी दुनियां में हो रही है। सतत विकास लक्ष्यों की भारी भरकम सूची में 5 वे औऱ 16 वे क्रम पर बच्चों के मामलों में लैंगिक सुरक्षा और समता का जिक्र है। लेकिन इन लक्ष्यों के बीच मिलिंडा बिल फाउंडेशन, या वारेन बफेट, अजीम प्रेमजी, टाटा, जैसे पूंजीपति अगर अरबों का दान कर बच्चों की शिक्षा और लैंगिक समानता के लिये करते है तो असल मे यह सतत विकास लक्ष्यों के खोखलेपन को ही प्रमाणित करता है।
आज भारत की 39 फीसदी आबादी 18 साल से कम आयु की है इसमें आधी बेटियां है। इनको हम पॉक्सो, जेजे एक्ट की सख्त धाराओं औऱ फांसी की सजा के प्रावधानो से शायद ही यौन हमलावरो से बचा  पाएं। आंकड़े भी इसकी गवाही दे रहे है इसलिये सरकार औऱ समाज  को गांधी की उस दूरदर्शिता को जमीन पर आकार देना ही होगा जो काम को इंसानी ऊर्जा बनाने की बुनियादी सोच की वकालत कर उसे कामांध बनने से रोकती है।

लेखक:जुबेनाइल जस्टिस एक्ट के अधीन बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष है|
सम्पर्क-  +919109089500, ajaikhemariya@gmail.com
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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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