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शख्सियत

दुर्भाग्य कि हिन्दी अखबार अपनी ताकत न समझ सके – काक

 

  • शिवाशंकर पाण्डेय

 

इसे दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि हिन्दी अखबार अपनी ताकत को समझ नहीं सके। नतीजतन, हिन्दी पत्रकारिता में एक ठहराव-सा देखने को मिल रहा है। जहाँ, एक तरफ पाठकों की रूचि घट रही है, वहीं दूसरी तरफ अखबारों को जमे रहने के लिए मार्केट में एक से एक नये प्रयोग करने पड़ रहे हैं। अखबारों में गुणवत्ता घटी है, शैम्पू, बैग, टी-शर्ट जैसे पैकेज के सहारे पाठकों के बीच टिके रहने की ‘मजबूरी’ आ पड़ी है। पत्रकारिता में हिन्दी अखबारों की दशा विषयक वार्ता छिड़ी तो प्रख्यात कार्टूनिस्ट काक ने कुछ ऐसा ही दर्द बयां किया।

हिन्दी बेल्ट के अखबार के पाठकों को काक का कार्टून जरूर याद होगा। कार्टून जगत में काक के कार्टून सशक्त हस्ताक्षर बने। अपनी मुकम्मल और खास पहचान बनाई। दिल्ली से निकलने वाले अखबार जनसत्ता ने कभी हिन्दी पत्रकारिता को गति और खास पहचान देने का काम किया था। प्रभाष जोशी संपादक थे, उनकी अगुवाई में तेज तर्रार रिपोर्टरों की टीम अपने पूरे दमखम से जुटी। इसमें काक के कार्टून ने अपनी खास छाप छोड़ी। ये वह समय था, जब हिन्दी पत्रकारिता में खास मोड़ आया। अंग्रेजी के कई संस्थानों को हिन्दी क्षेत्र में उतरना पड़ा। इंडिया टुडे, संडे आब्जर्वर, संडे मेल, दिनमान टाइम्स, आउटलुक सरीखे पाक्षिक, साप्ताहिक हिन्दी में आए और पाठकों के बीच छा गए। इसी दौर में जनसत्ता अखबार निकला, अपनी नयी पहचान बनाई। और, जनसत्ता में काक के कार्टून सबसे पहले देखे जाते। ब्लैक एंड व्हाइट में निकलने वाले साठ पैसे के अखबार ने पूरे देश में खास पहचान बनाई।

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यूपी में जिला उन्नाव के मूल निवासी हरिश्चंद्र शुक्ल कार्टूनिस्ट-दुनिया में काक के नाम से जाने गए। काक के कार्टून ने पाठकों के बीच अपनी अमिट छाप छोड़ी। श्री शुक्ल के शब्दों में ‘शुरू में कानपुर के दैनिक जागरण के लिए कार्टून बनाना शुरू किया पर असल पहचान जनसत्ता से ही मिली।’ काक दृष्टि यानि कौवे सी चपलता और सतर्क निगाह… शायद इसी सोच ने काक का कार्टून शब्द को स्थायी भाव बना दिया, और यहीं से काक के कार्टून का सफर शुरू हो गया। सबसे पहला कार्टून के बारे में कुछ याद है? इस सवाल पर अचानक चुप्पी साध लेते हैं श्री शुक्ल। थोड़ी देर बाद याद करने के बाद बताते हैं- सात अप्रैल सन् 1967 को गफ्फार खां पर पहला कार्टून दैनिक जागरण कानपुर ने छापा। वो नरेंद्र मोहन जी थे जो सम्मान के साथ कार्टून मंगाते और उसे छापते थे। नरेंद्र मोहन का जिक्र आने पर श्री शुक्ल भावुक हो जाते हैं। बताते हैं – नरेंद्र मोहन लोगों से काम लेना जानते थे, दैनिक जागरण अखबार के वो काबिल मुखिया माने गए। दूर दृष्टि थी उनकी, कान्सेप्ट भी क्लीयर था। मजबूत टीम बनाकर खुद भी मेहनत करते। इसी का नतीजा रहा कि दैनिक जागरण न केवल हाई सर्कुलेटेड बल्कि नरेंद्र मोहन के रहते ही हिन्दी का ब्राण्ड-अखबार बना। खासकर, हिन्दी बेल्ट में चाहे जिस भाषा का हो …जो भी अखबार आया उसे दैनिक जागरण का ही सामना करना पड़ा। जनसत्ता के बाद काक के कार्टून ने नवभारत टाइम्स, प्रभासाक्षी में भी छपे, जिन्होंने पाठकों के दिलो दिमाग में सम्मान जनक जगह बनाई। अपने कार्टून का सबजेक्ट तैयार करने में किन बातों का ध्यान रखते हैं? इस सवाल का जवाब बड़ी ही सहजता से देते हुए श्री शुक्ल बताते हैं- सामान्य तौर पर भी पाठकों पर गहरा असर डालता है कार्टून, एक छोटा सा कार्टून गागर में सागर का काम करता है। मध्यम वर्ग पर केंद्रित करते हुए आमजन की खीझ, ब्यूरोक्रेट्स, घटिया दर्जे की राजनीति, सामाजिक विद्रूपताओं पर विषय वस्तु को रखने की कोशिश रहती है। बहरहाल, सुखद यह है कि उम्र के अस्सी बसंत पार कर जाने के बावजूद श्री शुक्ल गाजियाबाद में रहते हुए अपने कार्य में पूरी तरह अभी भी सक्रिय हैं। काक का कार्टून अभी भी अपने चहेते पाठकों के बीच बराबर देखने को मिल रहा है।

(जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय से कार्टूनिस्ट काक ने कहा)

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, और सबलोग के यूपी ब्यूरोचीफ हैं|

सम्पर्क –  +918840338705, shivas_pandey@rediffmail.com

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