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समाज

नैसर्गिकता बनाम कृत्रिमता

 

  • डॉ. संगम वर्मा

 

माँ पिता बच्चों के लिए ही भरण पोषण करते हैं, दिन भर मेहनत करते हुए इधर उधर उड़ते हुए दाना इकट्ठा करते हैं, और अपने घोंसले में बैठे चीं-चीं की चीत्कार के साथ उनकी भूख को शांत करने मवं एकजुट रहते हैं, तस्वीर में कितना कुछ है कि हमारी भूख क्या है, पर सुंदरता ये है कि बच्चे आज भी माँ बाप पर निर्भर हैं, कि कोई उनके लिए दाना पानी एकत्रित कर रहा है, कहानी यहीं से शुरू हो जाती है, पोषण माह तो वैसे ही चल रहा है, पक्षियों में आपको पोषणता को लेकर अधिक जागरूकता देखी जा सकती है, हम मानव तो स्वाद के चक्कर में बेस्वाद हो गए हैं, जिससे हमारी पौष्टिकता कृत्रिमता में तब्दील हो गई है, पक्षियों में कोई बनावटीपन नहीं होता उन्हें तो खोज करना आता है शिकार करती हैं, प्रकृति ने उन्हें ये क्षमता प्रदान की है। घर तो घर होता है, कुछ माह बाद पँख निकल आएंगे, उड़ना सीख जाएंगे,और माँ बाप की तरह ख़ुद खाने के लिए जुट जाएंगे, और निच्छलता से जीवन की लंबी उड़ान भरेंगे।

अब घरों में ऐसे घोंसलें दिखने तो दूर कोसों कोसों तक नज़र भी नहीं आते,ज़ाहिर है कि सरकार मुनाफ़ा कमाने में दुश्निर्णय ले रही है, पिछले दिनों अमेज़ॉन के जंगल जलाए गये, संसार में अब तक का सबसे और हो सकता है सदी का सबसे बड़ा कुठाराघात मानव ने मानव के लिए किया है, इसके घातक परिणाम निकट भविष्य में शीघ्र ही देखने को मिल जाएंगे। कहानी किस्सों में इनका नामो निशान मिट जाएगा, बच्चों को चुन चुन करती आई चिड़िया नहीं पढ़ाई जाएगी, बल्कि जंगल जलाए गये पढ़ाया जाएगा, जैसे कि कोई महा दैत्यकार दानव ज़ोर से अट्टाहास लगा रहा हो, कि मैं मानव नहीं महामानव हूँ। नैसर्गिकता(Naturality)नाम की चीज ख़त्म होने के कगार पर है,और हम चंद्रयान को लेकर जश्न मनाने में तुले हुए हैं। अन्ततः बचना है तो तजना सीखो, तजना है तो गर्जना सीखो, गर्जना चाहते हो तो मंझना सीखो और मंझना सीखना चाहते हो तो पहले मानना सीखो। किस्सागोई भी तभी है जब संसार है, संसार नहीं तो किस्सागोई नहीं होगी, अगर कुछ होगा तो उठता हुआ धुआँ..जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कोई ट्रिगर नहीं होगा हमारे पास किसी अन्य दुनिया में जाने का। हमने अपनी दुनिया को कृत्रिम बना दिया है। डायनासोर ख़त्म हुए तो कृत्रिम रूप देकर व्यवसाय कमाया, आगे जाकर कृत्रिम मानव भी जल्द ही बाज़ार में उपलब्ध होंगे जहाँ भावनाओ का अतिक्रमण हो चुका होगा। जैसे किसी चहारदीवारी में क़ैद हो हम सभी। जिसका दरवाज़ा कहीं नहीं होगा। वहीं दम घुट कर मर जाएँगे।

लेखक पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज, चंडीगढ़ में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं|

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