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शख्सियत

लोकतन्त्र के लिये ‘लोकनायक’ जरूरी

 

  • प्रकाश चन्द्र

 

सियासी जुबान से हर बार हम यही सुनते हैं लोकतन्त्र खतरे में है, और इसे बचाने की सख्त जरूरत है। पर लोकतन्त्र में लोकतन्त्र पर ही मंडराते खतरे के क्या मायने हैं? और हमें इसका आभास कैसे हो? इसका कोई मापदंड नहीं है ना ही कोई पूर्व लक्षण। सियासी शब्दकोष का ये सबसे प्रचलित वाक्य बस कहने के लिये कहना और सुनने के लिये सुन लेना तक ही है। मतलब मायने कुछ भी नहीं हैं, कम से कम आज के दौर में तो नहीं।

कोई भी देश चाहे वह उदारवादी हो साम्यवादी हो या समाजवादी या फिर सैन्यशासित सभी अपने को लोकतांत्रिक प्रणाली का हिस्सा कहते हैं जिससे ये मान लिया जाता है कि सबकुछ लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत  ही हो रहा है। चुनाव को लोकतन्त्र का सबसे बड़ा पर्व और मतदान इस पर्व का अहम हिस्सा ये मानकर हम संपूर्ण लोकतांत्रिक प्रारूप को परिभाषित कर देते हैं, पर सच ये है इसी सबसे बड़े पर्व में ही सबसे बड़े गैरलोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला रखी जाती है, और इसी गैरलोकतांत्रिक व्यवस्था के गर्भ से लोकतन्त्र वाले देश में भ्रष्टाचार का जन्म होता है। सच में यही लोकतन्त्र में असल खतरा है।

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इस खतरे को जिसने सच में आभास किया और पूरे देश की जनता को आगाह और आह्वान किया जनतन्त्र के ‘जननायक’ और लोकतन्त्र के ‘लोकनायक’ यानि ‘लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आज जन्मदिन है। जयप्रकाश नारायण ही वो जननायक थे जिन्होंने जनता को गैरलोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का हौंसला दिया और सबने लोकनायक के साथ एक आवाज में सत्ता को ललकारा। ये ‘लोकनायक’ की ही हुंकार थी जिससे सत्ता का शीर्ष  दहला और ढह गया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के भ्रष्टाचार और गैरलोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ ही आवाज नहीं उठाई बल्कि समाज में पनप रहे हर प्रकार की बुराईयों के खिलाफ मजबूती से खड़े हुये। भ्रष्टाचार और अन्य सामाजिक बुराईयां जैसे जात-पात, भेद-भाव, बौद्धिक, शैक्षिक आर्थिक और राजनैतिक असमानता को खत्म करने के लिए आन्दोलन किया । जयप्रकाश नारायण के इसी आन्दोलन ने देश के सियासत को दर्जनों सियासी वारिस दिये। जो गाहे-बगाहे इस आन्दोलन में अपनी अहम भूमिका होने का दावा करते हैं। ये सियासी वारिस जिन मुद्दों को लेकर आन्दोलन का हिस्सा बने, वो सत्ता में आकर उन्हीं मुद्दों को देश और देश की जनता के लिये हूबहू छोड़ गये। लोकतन्त्र के दुर्भाग्य से ये सभी मुद्दे आज ही वैसे ही हैं।

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देश की सियासत और सत्ता इस जननायक, लोकनायक को आज जिस भी रूप में याद करे या श्रद्धांजलि अर्पित करे, पर वो कभी नहीं चाहेगी की कोई आम सा जयप्रकाश नारायण सीधे सत्ता से टकराये ललकारे और सत्ता के चूले हिला दे। सत्ता और सियासत ये भी कभी नहीं चाहेगी की लोकतन्त्र में जनता के बीच से कोई एक और लोकनायक बने।

अगर देश के जरूरत के हिसाब से सोचा जाय तो सत्ता से आँख मिलाकर सीधे सवाल करने वाले, और गैरलोकतांत्रिक व्यवस्था से सीधे टकराने वाले लोकनायक की देश को हर वक्त जरूरत है। सत्ता किसी की भी हो पर लोकतन्त्र में लोकहित और देशहित के लिये एक लोकनायक बेहद जरूरी है।

लेखक व्यंग्यकार, आलोचक एवं शायर हैं|

सम्पर्क- +918860200507, writerprakash.c@gmail.com

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