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‘समानता और समाजवाद’ से ‘सबका साथ, सबका विकास’ तक

अग्र शिरोमणि महाराजा अग्रसेन की जयंती पर विशेष-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी शासित तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे बुलंद कर रहे हैं. समाज के हर तबके को बराबरी का हक देने की बात कही जाती है. आप सब सुनते भी हैं. हालांकि इस नारे को हमारे ही कुछ भाई-बंधु सवर्ण बनाम पिछड़े और अति पिछड़े की लड़ाई में तब्दील करने की कोशिश में जुटे हैं. लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. हमारे आज के नेता समाज को बांट कर वोट प्राप्ति के जतन में जुटे हैं, और दोनों ओर के कथित बुद्धिजीवी उनकी साजिश का हिस्सा बन कर समाज को बांटने में गुरेज नहीं कर रहे.

जमीन, पानी, हवा, नदियां, सागर, फसल, खाद, पानी और वातावरण किसी का धर्म नहीं पूछते. किसी की जाति नहीं पूछते. लेकिन हमारे आज के नेता हर बात में धर्म और जाति को ही पूछते हैं.

हमारे आज के नेता या पिछले 100 साल में भी (एक-दो को छोड़ कर) ऐसा कोई नेता नहीं दिखता, जिसे समाज में समानता और समाजवाद के प्रणेता के रूप में याद किया जा सके. बल्कि युग पुरुष महाराजा अग्रसेन सच्चे अर्थों में समानता और समाजवाद के प्रणेता थे। उन्हें समाजवाद का अग्रदूत भी कहा जाता है।

आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस सबका साथ-सबका विकास के सिद्धांत की बात करते हैं, वो समानता और समाजवाद का सिद्धांत आज से 5 हजार साल पहले महाराज अग्रसेन ने ही दुनिया को दिया था.

महाराजा अग्रसेन ने समाज में समता और समानता के लिए जो नारा दिया था, वो अपने आप में अनूठा था. वो नारा जितना अनूठा था, उतना ही महत्वपूर्ण भी.

महाराजा अग्रसेन अग्रवाल समाज के जनक थे. वैश्य समाज के जनक थे. लेकिन क्या सिर्फ इतनी ही बात है? नहीं. जनक होने के साथ साथ उनका व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि आज भी उनकी पूजा की जाती है.

ऐसे में उनके जीवन दर्शन के बारे में जानना बेहद जरूरी है. ये ऐसी चीजें हैं जो हमारे समाज के लिए भी बेहद जरूरी हैं. इनकी चर्चा किये बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। महाराजा अग्रसेन के जीवन के चार मजबूत स्तंभ हैं.

  1. आर्थिक
  2. राजनीतिक
  3. सांस्कृतिक और
  4. सामाजिक।

 

ये चारों मिलकर ही विकास की नई गाथा लिखते हैं. लिखते हैं या नहीं ?  और इस बात को अग्र शिरोमणि ने पांच हजार साल पहले समझ लिया था.

जब भी विकास की बात की जाती है तो समग्र विकास खुद ही आ जाता है. ना किसी क्षेत्र से भेदभाव ना किसी व्यक्ति से भेदभाव. यही इरादा महाराजा अग्रसेन का भी था.

सही मायने में अगर किसी ने समाजवाद की नींव रखी थी तो महाराजा अग्रसेन ही थे. सही मायने में कर्मयोगी लोकनायक. बचपन से ही, संघर्षों से जूझते हुए अपने आदर्श जीवन कर्म से, पूरे मानव समाज को महानता के जीवन का रास्ता दिखाया. अपनी आत्मशक्ति को जाग्रत कर विश्व गुरू बनने की दिशा दी.

वैश्य समुदाय नहीं, सभ्यता है, संस्कार है…

आज हम उस दौर में हैं, जहां किसी एक वर्ग, समुदाय, जाति या धर्म की बात नहीं की जा सकती. लेकिन ये कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि महाराजा अग्रसेन ने जिस वैश्य समाज को जन्म दिया था, जिस अग्रवाल समाज की नींव रखी थी, वो कोई जाति या समुदाय नहीं है, बल्कि संस्कार है. पांच हजार साल पुरानी सभ्यता है. हरियाणा में 36 बिरादरियां प्रेम भाव से मिलजुल कर रहती हैं. यहां की सभ्यता में चार चांद लगाती है. समाज को साथ लेकर चलने का काम वैश्य समुदाय ही कर सकता है. क्योंकि समाज सेवा हमारे लिए सबसे बड़ा संस्कार है. समाज में धर्मशाला, गौशाला, प्याऊ सहित समाज सेवा के सभी कार्यों में वैश्य समाज का विशेष योगदान रहता है.

हममें समाज सेवा का भाव पांच हजार साल पुराना है. जब अग्र शिरोमणि ने महाभारत काल में बावड़ी का निर्माण कराया था, जिसे अग्रसेन की बावड़ी कहा जाता है. हमारे समाज के लोगों का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम किसी दीन-हीन का दुख नहीं देख सकते. जिसकी जितनी मदद हो सकती है, जरूर करते हैं. क्योंकि हमारी रगों में महाराजा अग्रसेन का इंसानियत से भरा खून बहता है.

एक रुपया, एक ईंट

हम कितनी आसानी से कह लेते हैं, एक रुपया, एक ईंट. लेकिन इस एक रुपए और एक ईंट का क्या मतलब है ? कभी विचार किया है आपने ? दरअसल, ये समाजसेवा का नया तरीका था. जिसमें समाज में किसी नये नागरिक या व्यापारी के आने पर सभी नगरवासी एक रुपया और एक ईंट देते थे. जिससे उन अनजान व्यक्ति के लिए रहने और व्यापार की व्यवस्था आसानी से हो जाए. और ये कड़ी आगे बढ़ती जाती थी. राज्य समृद्ध होता था. इस तरह महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की की. इससे बढ़कर समाजवाद और समानता का सिद्धांत और क्या हो सकता था.

महाराजा अग्रसेन के लिए कहा जाता है कि वे किसी पक्षी को तीर का निशाना बनाने की बजाए उन्हें उड़ता देखना पसंद करता थे. मान्यता है अग्रसेन शिरोमणि का जन्म मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की (34वीं) चौंतीसवीं पीढ़ी में सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में हुआ था. द्वापर युग के आखिरी और कलियुग की शुरुआत के समय में.

उन्होंने पिता महाराज वल्लभसेन के साथ महाभारत की लड़ाई में पांडवों की ओर से शिरकत भी की थी. लड़ाई खत्म होने के बाद जब वे लौट रहे थे, तब लोक कल्याण के लिए किए गए यज्ञ में उन्होंने बलि के लिए लाए गये पशु की आंखों में दर्द देखकर उन्होंने बलि देने से इंकार कर दिया. और जब शोर मचा तब उसी वक्त क्षत्रिय धर्म की बलि देकर वैश्य वर्ण अपना लिया.

पशुओं से प्रेम में,

परंपरा को झुठला डाला

पशु बलि को रोकते हुए

नये समाज का निर्माण कर डाला

इसीलिए आज भी अग्रवंश समाज हिंसा से दूर ही रहता है. महाराजा अग्रसेन ने वैश्य जाति का जन्म तो कर दिया, लेकिन व्यवस्थित करने के लिए 18 यज्ञ किये गये. महाराज जी ने अपने 18 पुत्रों को यज्ञ में 18 ऋषि-मुनियों से संकल्प दिलवाया और उन्हीं ऋषि-मुनियों के आधार पर गौत्र की उत्पत्ति हुई. ये 18 गोत्र मिलकर ही अग्रवाल समाज बनाते हैं.

राम राज्य का सपना

महाराजा अग्रसेन का जन्म भगवान श्री राम के कुल में हुआ था, तो राम राज्य की स्थापना उनकी प्रायोरिटी थी. आज हमलोगों की इच्छा होती है कि हमें मरने के बाद स्वर्ग मिले, लेकिन अग्र शिरोमणि महाराज अग्रसेन कहते थे- हमें ऐसा जीवन बनाना होगा कि हम कह सकें कि हम मृत्यु से पहले स्वर्ग में थे.

वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बलि प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे.

ज्यादा कमाओ, कम खर्चो

आज कई बार देखने में आता है कि युवा कम कमाते हैं और EMI पर कर्ज लेकर सामान खरीद लेते हैं, लेकिन हमारे ऐसे भाइयों के लिए महाराज अग्रसेन की ये सीख बेहद जरूरी है कि जो भी कमाओ, मेहनत से कमाओ. और जितना कमाओ उससे कम खर्च करो. खुशहाली बनी रहेगी. ना किसी कर्ज की चिंता होगी और ना ही किसी की EMI चुकाने की चिंता.

हमें आज भले ही व्यापारिक कौम समझा जाता है. ठीक भी है. लेकिन कोई हमें कमजोर न समझे. आरक्षण को लेकर विवाद बढ़ता हुआ देखने में आ रहा है. मेहनत करने वालों को आरक्षण की जरूरत नहीं. महाराजा अग्रसेन ने हमारे एक हाथ में व्यवसाय के लिए तराजू दी थी, तो दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए हथियारों की शिक्षा पर भी बल दिया था.

महाराज अग्रसेन ने 108 वर्षों तक राज किया. उन्होंने जिन जीवन मूल्यों को ग्रहण किया उनमें परंपरा एवं प्रयोग का बैलेंस दिखाई देता है. एक ओर तो उन्होंने हिंदू धर्म ग्रंथों में वैश्यों के दिये गये निर्देशों को माना तो दूसरी और देशकाल के संदर्भ में नए आदर्श स्थापित किए.

इतिहास में महाराज अग्रसेन का नाम परम प्रतापी, धार्मिक, सहिष्णु, समाजवाद के प्रेरक महापुरुष के रूप में दर्ज है. जगह-जगह अस्पताल, स्कूल, बावड़ी, धर्मशालाएँ आदि अग्रसेन के जीवन मूल्यों का आधार हैं और ये जीवन मूल्य मानव आस्था के प्रतीक हैं.

राजनीति में आगे आएं समाज के युवा

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के वंश में जन्म लेने वाला एक युवा जब परंपरा के विरूद्ध आवाज बुलंद करके नये समाज की स्थापना कर सकता है तो सोचिए, कि आज हमारे पढ़े-लिखे युवा साथियों को राजनीति में क्यों नहीं आना चाहिए?

पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आने से कतराते हैं. जो जाना चाहते हैं, उन्हें उनके माता पिता रोकते हैं. आखिर ये डर क्यों है ? अगर ये डर महाराजा अग्रसेन ने माना होता तो हम और आप महाराजा अग्रसेन की जयंती नहीं मनाते.

हमें इस डर को अपने अंदर से निकालना होगा. युवाओं को राजनीति में जाने से मत रोकिए. अगर रोकेंगे तो हो सकता है कि अयोग्य व्यक्ति आपका शासक बन जाए.

अगर कोई राजनीति के बारे में बात करता है, विचार करता है, विश्लेषण करता है तो ये भी राजनीति का ही हिस्सा है. विचारधारा चाहे कोई भी हो. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में वैश्य समुदाय में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है, लेकिन इतना ही काफी नहीं है. और आगे बढ़ने की जरूरत है.

 

राजन अग्रवाल

लेखक पत्रकार हैं.

rajan.journalist@gmail.com