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स्मृति शेष – उस पागल चंदर को कैसे भूले कोई…

sablog.in पूरा तो याद नहीं, लेकिन जिले का नाम भागलपुर था, अब वहां किस लेखक का घर था, यह याद नहीं। हां, इतना याद है कि वो सर्दी की रात के अंधेरे में आम के पेड़ के नीचे कुछ खुरच रहा था। वो घर जिस लेखक का था, वहां और लोग भी थे जो उसे कौतूहल भरी नजर से देख रहे थे।

उनमें से एक को रहा नहीं गया तो आगे बढ़े।

धीरे… धीरे… वो उसके पास पहुंचे। वो देखना चाहते थे कि आखिर पागल जैसी हरकत कर रहा यह लड़का है कौन।

दरअसल, वो लड़का कुछ खोज रहा था, नजदीक जाकर देखने पर पता चला कि वो आम के पेड़ के नीचे सूखे पत्तों के जले अलाव में चिंगारी ढूंढ रहा था। वो चिंगारी से बीड़ी जलाने की जुगत में था और अथाह कोशिश के बाद उसने बीड़ी जला ली।

एक… दो… तीन और फिर अगली कश, हर कश में उसका काला सा दिखने वाला चेहरा बड़ा ही सौम्य दिख रहा था। लेखक के घर में आए दूसरे लोग भी उसे गौर से देख रहे थे, लेकिन वो बीड़ी पीते हुए दूर किनारे जाकर बैठ गया। इस दौरान लेखक ने उन लोगों से बात करनी शुरू की।

अरे… उसे क्या देख रहे हो। लड़की का चक्कर था उसका, उसके दूल्हे ने खूब पीटा है लाठियों से उसे। अब क्या बताऊं तुम्हें मैं तो ठहरा लिखने-पढ़ने वाला आदमी तो इस पर दया आ गई, क्योंकि वो लिखता बहुत अच्छा है।

अचानक, सभी का चेहरा अवाक सा रह गया जैसे कुछ असंभव सुन लिया हो सबने। यह पागल सा दिखने वाला लेखक है?

और नहीं तो क्या…

यह जबाव कम, सवाल ज्यादा था… अरे हुआ यह कि वो एक लड़की से प्रेम करने लगा। अब गांव का लोक-लाज जानते ही हो। वो लड़की भी प्रेम करती थी, लेकिन उसकी किस्मत परदेस में रहने वाले बाबू से बंध गई और यह रह गया अकेला। ढिठाई देखो इसकी, लड़की दूल्हे के साथ नाव से गंगा पार कर रही थी तो यह भी नाव पर सवार हो गया।

 

 

अब कोई नई-नवेली दुल्हनियां के लिए पीछे-पीछे आए तो कौन बर्दाश्त करेगा, सो इसकी जमकर पिटाई कर दी। लठैतों ने भी खूब हाथ साफ किया है। अब यहां पड़ा है मेरे यहां। लेकिन है बड़ा सौम्य इंसान, मैं इसे चंदर कहता हूं।

अच्छा तो ये बात है, हां… प्रेम ऐसा चीज ही है कि अच्छे-अच्छों को बदहाल कर दे। अब यह है भी नादान, बच्चा सा दिखने वाला।

ना… ना… इसे नादान या बच्चा मत समझना। यह बहुत अच्छा लेखक है। और एक दिन पूरी दुनिया इसे याद करेगी।

हां नहीं तो क्या। अच्छा है, इसे हमलोग अभी ही देख लिए हैं, क्या पता बड़ा बनने के बाद हमें भूल जाए।

एक लंबी हंसी उठती है जो शांत सर्द रात में कोलाहल उत्पन्न कर देती। दूसरी छोर पर बैठे उस पागल से दिखने वाली लड़के की बीड़ी सुलगनी बंद हो चुकी थी, और बीड़ी के बुझने तक वो आखिरी कश सीने में उतार चुका था।

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जब बीड़ी पीने वाला वो लड़का, मतलब चंदर, कुछ बड़ा हुआ तो उसने एक नौकरानी में सावित्री का रूप देखा। उसकी खूबी थी कि वो काले रंग के पीछे भी मीठी कोयल की आवाज सुन लेता था। यह उसकी लेखनी थी जो चरित्र को भी दीन-हीन होने से बचा लेती थी। तभी तो वो एक नौकरानी को नायिका बनाकर पेश कर देता है। फिर बात चाहे हिंदी की हो बंगला भाषा की, उस पागल लड़के ने प्रेम में सबकुछ हार तो दिया, लेकिन लिखने की हिम्मत कभी नहीं खोई। सो, आज भी याद आता रहता है हमें, और आए क्यों नहीं, प्रेम है तो दुनिया है, और जहां प्रेम की बात हो, उस पागल चंदर को कोई कैसे भूल सकता है।

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दरअसल, उस लड़के की पढ़ाई कॉलेज में छूट गई थी। लिखना बचपन से पसंद था। 18 साल का हुआ तो एक उपन्यास लिख डाला, लेकिन खुद को ही पसंद नहीं आया तो उसे फाड़ दिया। उसने कई रचनाओं को फाड़ डाला था। प्रेम में ठोकर खाकर वो विद्रोही हो गया था। वो सभी से बदला लेना चाहता था और बीड़ी से खुद को हल्के-हल्के जला रहा था। अक्खड़ स्वभाव का रहा शुरू से ही। कलकत्ता गया तो अपनी रचनाएं एक दोस्त के यहां छोड़ दी। दोस्त ने उसे बिना बताए उसकी रचनाओं पर धारावाहिक प्रकाशन शुरू करवा दिया। शायद ‘बड़ी दीदी’ नाम था उस धारावाहिक का। फिर क्या था, उसकी चर्चा होने लगी।

अब आरोप भी लगने लगे, लोग कहते कि पागल सा दिखने वाला यह लड़का कविगुरू रविंद्रनाथ ठाकुर की रचना को अपने नाम से लिख रहा है। कोई यह भी कहता कि खुद रविंद्रनाथ ठाकुर नाम बदलकर लिख रहे हैं। एक-एक दिन करके गुजरते रहे और पांच-छह साल हो गए। आखिर में पता चल गया कि उसका नाम शरत चंद्र चट्टोपाध्याय था। ‘पंडित मोशाय’ , ‘बैकुंठेर बिल’, ‘दर्पचूर्ण’, ‘श्रीकांत’, ‘आरक्षणया’, ‘निष्कृति’, ‘बाम्हन की लड़की’ उसी ने लिखी। और ‘देवदास’ तो आपको याद ही होगा।

‘और जहां प्रेम की बात हो, उस पागल चंदर को कोई कैसे भूल सकता है।’…

(जन्म : 15 सितंबर 1876, निधन 16 जनवरी 1938)

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

अभिषेक मिश्रा
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