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अब सरकार बचाने और “वचन” पूरा करने की चुनौती

 

  • जावेद अनीस

 

मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने बहुत ही थोड़े समय में अपना कायाकल्प करने का चमत्कार किया है. यह भाजपा का सबसे मजबूत किला माना जाता था और यहां शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता तेरह सालों से मुख्यमंत्री थे जिन्हें  भाजपा का सबसे मजबूत और लोकप्रिय मुख्यमंत्री माना जाता था. वे भाजपा के उन चुनिन्दा मुख्यमंत्रियों में शामिल थे जो पार्टी में मोदी-शाह के वर्चस्व के इस दौर में भी अपनी अलग पहचान और जमीन को बचाये रखने में कामयाब रहे थे. इतने लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनकी विनम्रता और सहज-सरल छवि प्रभावित करने वाली थी. शिवराज के सामने कांग्रेस पार्टी लगातार बिखरी और लाचार नजर आ रही थी.  लेकिन जब कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर भेजा गया तो ना केवल पार्टी नये सिरे से खड़ी हुयी बल्कि सत्ता में वापसी करने में भी सफल रही. मई 2018 में जब कमलनाथ को मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गयी थी तो उनके सामने पंद्रह साल से सुस्त पड़ चुके संगठन को सक्रिय करने की चुनौती थी जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया. उनके साथ सिंधिया को चुनाव प्रचार अभियान और दिग्विजय सिंह को परदे के पीछे रहकर कार्यकर्ताओं को एकजुट व सक्रिय करने की जिम्मेदारी दी गयी थी. तीनों ने अपने दायरे में रहते हुए एक टीम की तरह काम किया जिसकी वजह से मध्यप्रदेश में कांग्रेस पंद्रह सालों को बाद सत्ता वापसी में कांग्रेस सफल रही है, लेकिन उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला और सरकार बनाने के लिये उसे बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और निर्दलीय विधायकों का सहयोग लेना पडा.

मुख्यमंत्री कमलनाथ

मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने 15 साल से सत्ता में जमी भारतीय जनता पार्टी को हराकर सत्ता तो हासिल कर ली है लेकिन यह बहुत करीबी जीत है ऐसे में अब कांग्रेस के सामने अपने वचन पत्र में किये गये वादों को पूरा करने की चुनौती तो है ही साथ ही उसे कुछ ही महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव का सामना भी करना है जो एक तरह से उसके परफार्मेंस का त्वरित टेस्ट होगा. इसके अलावा सत्ताधारी पार्टी की अंदरूनी कलह भी उसके लिये लगातार परेशानी का सबब बनी रहेगी.

अपने चार दशक लम्बे राजनीतिक कैरियर में यह पहला मौका था जब कमलनाथ मध्यप्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका में थे. इससे पहले राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका किंगमेकर की रही है और हमेशा से ही अपने आप को छिंदवाड़ा तक ही सीमित किये रहे.

बहरहाल शिवराज के बाद अब मध्यप्रदेश को कमलनाथ के रूप में नया मुख्यमंत्री मिला है. एक तरफ जहां उनके पास संसदीय राजनीति का चार दशक का लंबा अनुभव है तो वहीँ उन्हें समय के साथ चलने वाला भी माना जाता है. मैनजमेंट और समन्वय को उनकी सबसे बड़ी खूबी मानी जाती है.

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कमलनाथ ने जिस तरह से ताबड़तोड़ फैसले लिये है उससे समझा जा सकता है कि उनपर उम्मीदों पर खरा उतरने का कितना दबाव है. कमलनाथ ने शपथग्रहण कुछ ही घंटों के भीतर कर्जमाफी के उस फैसले पर हस्ताक्षर कर दिये जिसके तहत कि‍सानों के 31 मार्च 2018 तक का दो लाख तक का कर्ज माफ किये जाने थे बाद में इसके दायरे को बढ़ाते हुये 12 दिसंबर 2018 तक कर दिया गया. इसी तरह से शपथग्रहण के तुरंत बाद ही कन्या विवाह योजना के तहत दी जाने वाली राशि 28 से बढ़ाकर 51 हजार रुपए कर दी.

तस्वीर बदलने की कवायद

कमलनाथ सरकार ने मध्यप्रदेश के सभी निगम मंडल, प्राधिकरण, बोर्ड, राज्य सफाई कर्मचारी आयोग, केश शिल्पी मंडल, सिलाई कला मंडल एवं कृषि विपणन बोर्ड से पदाधिकारियों की नियुक्तियों को निरस्त कर दिया है, प्रदेश के सभी सरकारी कॉलेजों की जनभागीदारी समितियां भंग कर दिया गया है और सभी नगर पालिका परिषदों/नगररिषदों में नियुक्त सभी एल्डरमैन को तत्काल प्रभाव से पद से विमुक्त कर दिया है. नयी सरकार आने के बाद से बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादले भी किये जा चुके हैं. इसी के साथ ही कई योजनाओं के नाम बदलने और विभागों को बंद करने की कवायद की जा रही है जिससे पिछले पंद्रह में सत्ता में पैठ जमा चुकी भाजपा /संघ के प्रभाव को कम किया जा सके .

इसी कड़ी में कुछ इस्तीफे भी सामने आये हैं जैसे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने ने इस्तीफा दे दिया है. जगदीश उपासने को संघ का करीबी माना जाता है. उनके इस्तीफे को राज्य में हुए सत्ता परिवर्तन से जोड़ कर देखा जा रहा है.

इसी तरह से इमरजेंसी के दौरान जेल जा चुके लोगों को मीसा बंदी के नाम पर दी जाने वाली पेंशन भी बंद कर दी गयी है. इसका ज्यादा लाभ भाजपा और संघ से जुड़े लोग ही उठा रहे थे. इसी तरह से हिन्दू पहचान पर भाजपा के एकाधिकार को तोड़ने के लिये आनंद विभाग और धर्मस्व विभाग को मिलाकर एक नया अध्यात्म विभाग बना दिया गया है जिसके तहत राम वन गमन पथ में पड़ने वाले क्षेत्र के विकास, नर्मदा शिप्रा ताप्ती और मंदाकिनी नदियों के न्यास बनाने की योजना है.

तस्वीर बदलने की इस हड़बड़ी में कई दावं उलटे भी पड़े हैं जिसका एक उदाहरण वंदे मातरम  के नाम पर हुआ विवाद है. दरअसल लम्बे समय से भोपाल के वल्लभ भवन में वंदे मातरम के गायन की परंपरा रही है जिसपर कमलनाथ सरकार ने 1 जनवरी से रोक लगाने के निर्देश दिए थे. जिसके बाद भाजपा जबरदस्त तरीके से हमलावर हो गयी थी और बाद में सरकार को इस नियम को दोबारा लागू करते हुये कहना पड़ा कि “अब पुलिस बैंड और आम जनता की सहभागिता के साथ वंदे मातरम् का गायन होगा”. कमलनाथ सरकार के इस यूटर्न को शिवराज अपनी जीत बताने से नहीं चूंके.

चुनौतियों का अम्बार

 

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की जीत भले ही महत्वपूर्ण हो लेकिन बराबरी के मुकाबले ने इसे फीका और चुनौतीपूर्ण बना दिया है. कमलनाथ सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़ है लेकिन उन्हें कामचलाऊ बहुमत भी नहीं मिला है. सरकार बनाने के लिये उन्हें दूसरों पर निर्भर होना पड़ा है जो एक तरह से तलवार की धार पर चलने की तरह है.

जहां तक सदन में संख्या का सवाल है, 230 सदस्यों वाली विधानसभा में इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 114 सीटें मिली हैं जोकि बहुमत से दो कम हैं. दूसरी तरफ भाजपा को 109 सीटें मिली हैं, पिछली बार के मुकाबले उसे 56 सीटों का नुकसान हुआ है. कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी के दो, समाजवादी पार्टी के एक और चार निर्दलियों की मदद से 121 सीटों के साथ किसी तरह से मध्यप्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब हो सकी है.

सीटों का अंतर बहुत कम होने और बहुमत के लिये दूसरों पर निर्भरता की वजह से कमलनाथ सरकार की स्थिरता को लेकर लगातार अटकलें चलती रहती हैं. कांग्रेस के कुछ विधायकों के नाराजगी की की खबरें भी सामने आती हैं जिसकी वजह से कभी भी कमलनाथ सरकार के  अल्पमत में आने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. शायद इसी के चलते दिग्विजय सिंह भाजपा पर खुले तौर पर यह आरोप लगाते हुये दिखाई पड़े कि वो कमलनाथ सरकार को अस्थिर करना चाहती है. दिग्विजय सिंह का कहना था कि “भाजपा हॉर्स ट्रेडिंग करके सत्ता में वापस आना चाहती है.” उन्होंने शिवराज सरकार में मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा और भूपेंद्र सिंह का नाम लेकर कहा ‘ये लोग निर्दलीय और एसपी-बीएसपी विधायकों को खरीदने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेस के भी कुछ विधायकों को लालच देने की कोशिश की जा रही है.”

कमलनाथ की दूसरी सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के अंदरूनी खींचतान से निपटने की है. मध्यप्रदेश में कांग्रेस नेताओं के बीच गुटबाजी एक पुरानी समस्या है जो सत्ता हासिल करने के बाद भी बरकरार है. सभी गुटों के अपने हित है जिसे साधने में वे एक दूसरे के खिलाफ भी चले जाते हैं  जिसका खामियाजा अंत में पार्टी को ही उठाना पड़ता है. इसी खींचतान के चलते कमलनाथ को  मुख्यमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद अपना मंत्रिमंडल गठन करने में एक हफ्ते से ज्यादा का वक्त लग गया और बाद में इसका फैसला राहुल गांधी के दखल के बाद ही हो सका. इसपर भी कई विधायक सावर्जनिक रूप से अपना असंतोष जाहिर करते हुये नजर आये.मंत्रियों को विभागों का वितरण करने के लिये भी कमलनाथ को दिल्ली का रास्ता देखना पड़ा.

लम्बे समय बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस में यह संयोग बना है कि इसके सभी प्रमुख नेता मध्यप्रदेश की राजनीति में रूचि ले रहे हैं. कमलनाथ मुख्यमंत्री बन चुके है, नर्मदा यात्रा के बाद से दिग्विजय यहीं पर जमे हुये हैं और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी राज्य की राजनीति को लेकर काफी मुखर दिखाई पड़ रहे हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए खुले ढंग से काम करना आसान नहीं होगा. फिलहाल दिग्विजय सिंह कमलनाथ के संकट मोचन बने हुये दिखाई पड़ रहे हैं जिनका उन्हें मुख्यमंत्री बनवाने में खासा योग्यदान माना जाता है. नयी सरकार में परदे की पीछे दिग्विजय की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे सत्ता के दो केंद्र बन सकते हैं और यह सन्देश जाने का भी खतरा है कि कमलनाथ कठपुतली मुख्यमंत्री की तरह काम कर रहे हैं. ऐसे में उनके सामने संतुलन साधने की चुनौती है जिसमें वे बिना किसी दबाव के और सबको साथ लेकर चल सकें

कमलनाथ को विरासत में कर्ज में डूबी सरकार मिली है, मध्यप्रदेश के सरकारी खजाने की हालत बहुत खस्ता है, राज्य पर लगभग पौने दो लाख करोड़ रुपये का कर्ज पहले से ही था ऊपर से विधानसभा चुनाव के नतीजे आने से ठीक पहले निवर्तमान सरकार द्वारा 500 करोड़ रुपए के कर्ज लेने की खबरें आयीं थी. ऐसे में कमलनाथ के सामने संसाधन जुटाने और खर्चों को कटौती करने की चुनौती है. इस चुनौती से निपटने के लिये कांग्रेस सरकार प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर श्वेतपत्र ला सकती है जिससे प्रदेश के खजाने की हालत को जनता के सामने रखा जा सके.

फिजूलखर्ची रोकने के लिये कवायद भी शुरू कर भी दी गयी है. शिवराज सरकार की ब्रांडिंग का सालाना तकरीबन 400 करोड़ रूपए खर्च किया जाता था. कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनते के बाद कई बड़े फैसले लिये है लेकिन इन फैसलों के प्रचार-प्रसार को लेकर विज्ञापन नहीं दिया गया. अगर आगे भी यह सिलसिला बना रहा तो यह एक अच्छा कदम होगा.

कांग्रेस सरकार को एक मजबूत विपक्ष भी मिला है. ऐसे में कांग्रेस के लिये अपने किये गये वादों को बायपास करके आगे निकलना आसान नहीं होगा.

जाहिर है कांग्रेस के सामने अपने द्वारा वादों के लम्बी फेहरिस्त, खाली खजाना और मजबूत विपक्ष की चुनौती है. इस बीच 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान उसकी परीक्षा भी होने वाली है. जिनपर उसे खरा उतरना है. फिलहाल कांग्रेस के पास प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से सिर्फ तीन सीटें ही हैं, ऐसे में उनपर सीमित समय में 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में अपनी स्थिति को मजबूत करने का दबाव है. मध्यप्रदेश में कांग्रस ने जैसे-तैसे सरकार तो बना ली है लेकिन इसे बचाये रखने और वचन पत्र को जमीन पर उतारने की चुनौती लगातार बनी रहेगी.

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं|

सम्पर्क- +919424401459, javed4media@gmail.com

 

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