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झारखंड

संसाधनो के लूट को रोकने पर जुटान – कुमार कृष्णन

 

  • कुमार कृष्णन

 

झारखंड सरकार पिछले कुछ सालों से “मोमेंटम झारखंड” का आयोजन करके देश और दुनिया के पूंजीपतियों को यहां के संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिए न्यौता दे रही है| जब झारखंड के संसाधनों के लूटने की बोली लग रही थी तभी दूसरी ओर सरकार आदिवासियो के हित के कानूनों को पूंजीनिवेश की जरूरत के नाम पर बदल रही थी। राज्य गोड्डा में 1600 मेगावाट के कोयला-आधारित अल्ट्रामेगा सुपर क्रिटिकल पॉवर प्लांट बनाने की घोषणा अडानी समूह ने मोमेंटम झारखंड सम्मेलन में की। अडानी समूह इस पॉवर प्लांट की बिजली बांग्लादेश को बेचेगा। पड़ोस के जिले साहेबगंज में गंगा नदी पर व्यावसायिक बंदरगाह बनाने का फैसला भी सरकार ने लिया। देखने में तो ये दो अलग प्रोजेक्ट हैं मगर दोनों का मकसद एक ही है। इससे अडानी समूह को व्यापारिक फायदा पहुंचेगा और इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर पूंजी का आधिपत्य बढ़ेगा। इस तरह के मेगा परियोजनाओं को जनपक्षीय दृष्टिकोण से समझना ज़रूरी है। यही राज्य की दिशा और दशा तय कर रहे हैं।

साहेबगंज पोर्ट

इन्हीं ज्वलंत सवालों को लेकर इंस्टिट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड सस्टेनेबिलिटी (आइडीएस) एवं जन संसाधन पीठ द्वारा रांची आयोजित  झारखंड में ‘विकास की इन्ही प्रवृत्तियों पर  विमर्श  काफी महत्वपूर्ण रहा|विमर्श के दौरान संसाधनों के स्वामित्व को हड़पने की साजिश साहेबगंज में पोर्ट और गोड्डा में अडानी पावर प्लांट का अध्ययन पर आधारित रिर्पोट भी जारी की गयी, जिसे जन संसाधन पीठ और इंस्टिट्यूट फॅार डेमोक्रेसी एंड सस्टेनेबिलिटी द्वारा जारी किया गया। विमर्श के आरंभ में राजेन्द्र रवि ने कहा कि पूरे देश में जनआन्दोलनों के बाद भी न सिर्फ संसाधनों को हड़पने का एक अभियान चल पड़ा है बल्कि सामाजिक और देशज ज्ञान को भी हड़पा जा रहा है। झारखंड समृद्ध है लेकिन यहां के लोग गरीब हैं, जो उनके चुने हुए प्रतिनिधि हैं उनके संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं। इस सत्र का संचालन अशोक वर्मा ने किया। बहस को आगे बढ़ाते हुए उड़ीसा से नियमगिरी आंदोलन के प्रफुल्ल सामंत ने कहा कि पांच सालों के अंदर केंद्र की सरकार कॉरपोरेट लूट को कानूनी मान्यता दे रही है। इस लूट को चुनौती देने के लिए आंदोलन के साथी आगे आएं। प्राकृतिक संसाधन यानी जल,जंगल और जमीन पर जनता का अधिकार हो। विभिन्न जनआन्दोलनों से जुड़ी दयामनी बरला ने कहा कि जल, जंगल, जमीन को बचाने वाले जनआन्दोलनों के मद्देनजर आने वाले दिन खतरनाक हैं चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। वैसे में झारखंड को बचाना और भारत को बचाना आपके हाथों में है। मोमेंटम झारखण्ड राज्य की जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। प्रोजेक्टों के लिए 21 हजार एकड़ जमीन निवेशकों को दिखलाई जा रही है। इसमें से 14 हजार एकड़ जमीन जंगल की जमीन है। रोड के लिए जो 13 हजार एकड़ जमीन आवंटित है वह औद्योगिक कॉरिडोर को बनाने के लिए है। यहाँ की खनिज संपदा को बाहर ले जाने की तैयारी है। इसका प्रतिरोध जरूरी है।जाति-धर्म के आधार पर टकराव और हिंसा पहली बार इतनी बढ़ी है। कॉरपोरेट को जहां जमीन चाहिए, वहां भूमि का अधिकार ऑनलाइन हस्तांतरण हो रहा है। एनएपीएम के राष्ट्रीय समन्वयक मधुरेश कुमार ने कहा कि मोमेंटम झारखंड में 210 एमओयू कर तीन लाख करोड़ के निवेश के साथ छह लाख से ज्यादा रोजगार पैदा करने की बात कही गयी थी, जो गलत साबित हुई। सामाजिक कार्यकर्ता बलराम ने कहा कि झारखंड में कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाने के लिए अच्छी सड़कें बन रही हैं, लेकिन इसे जनता के विकास के नाम पर प्रचारित किया जा रहा है। मौजूदा समय में मूल जनतांत्रिक अधिकारों पर सबसे बड़ा खतरा है। संवै​धानिक संस्थाओं का अतिक्रमण हो रहा है। 1974 के आंदोलन से जुड़े गौतम सागर राणा ने कहा कि झारखंड के असली मालिक को दरिद्र बनाया जा रहा है। वर्तमान सरकार का संसदीय जनतंत्र में विश्वास नहीं है। इस कारण लगातार विद्रोह हो रहा है और आनेवाले समय में बहुत बड़े विद्रोह की तैयारी है। इस सत्र में विन्नी आजाद, प्रतीक रंजन, प्रभाकर अग्रवाल, ओमप्रकाश, राधेश्याम मंगोलपुरी, सुषमा विरीनी ने भी अपने विचार रखे। विमर्श के अगले दौर में साहेबगंज में पोर्ट और गोड्डा में अडाणी पावर प्लांट के मुद्दों पर चर्चा हुई। इस सत्र में युवा क​वयित्री जसिंता केरकेट्टा ने कहा कि इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है कि स्थानीय मूलवासी अपने ही संसाधनों के उपयोग से, अपने ही जंगल जमीन में रहने से वंचित हो गई है और बड़ी बहसों से इसे गायब करने की पूरी कोशिश भी जारी है। गोड्डा में अदानी पावर प्लांट और साहेबगंज में पोर्ट के खिलाफ लोगों के संघर्ष पर लोगों ने साथ आने की बात की। यह मुद्दा सिर्फ ज़मीन का नहीं, पानी और पर्यावरण का भी है। अपनी भावनाओं को उन्होंने कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करते हुए कहा कि —— ‘चौराहे पर खड़ा हूँ सुबह से/छोटा-बड़ा कोई भी काम चाहता हूं/मैं देखता हूँ/वे मेरा हुनर छीन कर/मेरे ही मित्र को सौंप रहे हैं/और वह काम के बोझ से दबा/अपनी ऐसी नौकरी का अंत चाहता है/मैं सोचता हूँ/क्या वह मेरे जैसे हज़ारों लोगों के/ किसी काम से बहिष्कृत कर दिए जाने की/ सज़ा भुगत रहा है?/और उस पर गर्व करते रहने को/निरंतर प्रशिक्षित हो रहा है?’ जबकि संचालन करते हुए बसंत हेतमसरिया ने कहा – गांधी ने जिस अंतिम व्यक्ति की बात की थी, उसे पूरी तरह से नकार दिया गया है। गोड्डा से आए “भूमि बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक चिन्तामणि जी का कहना है कि यहां जगह—जगह करके आदिवासी–किसानों से ज़मीनें छीनी जा रही हैंI इसी साज़िश से उनकी भी 4 एकड़ ज़मीन कम्पनीवालों ने ज़बरन ले ली हैI जबकि उन्होंने न अपनी कोई सहमति दी है और न ही कोई मुआवज़ा लिया हैI सरकार और ज़िला प्रशासन हर जगह यही प्रक्रिया अपनाकर अधिकांश रैयत आदिवासी व किसानों की ज़मीनें छीनकर और झूठा सहमति-पत्र तैयार कर फर्ज़ी सूचना जारी कर रहा है कि सभी असली ज़मीन मालिक राज़ी हैं और जो विरोध कर रहें हैं वे सभी बाहरी हैं। उनके मुताबिक पूरे संथाल परगना क्षेत्र में संथाल परगना कानून (एसपीटी कानून) का विशेष संवैधानिक प्रावधान लागू है, जिसके तहत बिना ग्राम सभा की अनुमति के जंगल–ज़मीन का अधिग्रहण गैरकानूनी है। लेकिन खुलेआम इन संवैधानिक प्रावधानों को नकारते हुए राज्य की वर्तमान सरकार अडाणी कम्पनी के लिए यहाँ के रैयत आदिवासी व किसानों को उनकी ज़मीन से उजाड़ रही हैI विरोध करने वालों को ‘बाहरी’बताकर कभी कंपनी के गुंडों से पिटवाया जाता है तो कभी झूठे मुकदमों में फंसाकर प्रताड़ित किया जा रहा है। वहीं राधेश्याम मंगोलपुरी ने कहा कि साहेबगंज के पोर्ट के निर्माण की प्रक्रिया जारी है। इसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताकर दिग्भ्रमित ​किया जा रहा है। इस सत्र में रणजीत कुमार एवं विवेक ने भी अपने विचार रखे और कहा कि इससे सिर्फ अडाणी कंपनी को फायदा होगा क्योंकि इस प्लांट के लिए कोयला भारत की बजाय ऑस्ट्रेलिया स्थित अडाणी की बदहाल हो चुकी कोयला कंपनी से लाकर उसे फिर से खड़ा किया जाएगा। जिससे कोयले की लागत खर्च कई गुना महँगा होगा और इसकी मार यहाँ के राजस्व को झेलना पड़ेगा।

अंतिम सत्र में महाराष्ट्र से आए राजेन्द्र भिसे ने स्मार्ट सिटी पर चर्चा करते हुए कहा कि शहर तथा गांव दोनो जगह शोषण है। हर शहर का आर्थिक दायरा अलग—अलग है, विषमता है और संसाधनों का असमान बंटवारा है। स्मार्ट सिटी में स्थानीय निकाय और उसके जनप्रतिनिधियों की भूमिका गौण हो जाती है। लख्खी दास ने कहा कि राज्य गठन के बाद से शहरी विकास की कोई ठोस नीति नहीं बन पायी। केन्द्र प्रायोजित योजनाओं का सरकार द्वारा पूरा किये जाने का दावा किया जा रहा है, पर इन योजनाओं से शहरी क्षेत्र के गरीबों का विकास हो जायेगा, ऐसा नहीं लगता। इसके लिए एक ठोस कानून बनाने की दिशा में पहल करने की जरूरत है। वहीं अलोका ने कहा कि विकास का मतलब सिर्फ बहुमंजिली इमारत नहीं है। उन्होंने कहा कि पूरे झारखंड में तालाब थे, लेकिन वे खत्म हो गए। लोग सर्विस टैक्स देते है, लेकिन सुविधा नहीं है। महेन्द्र यादव ने कहा कि स्मार्ट सिटी सिर्फ लूट और शोषण का जरिया है। विन्नी ने कहा कि महिलाओं के लिए शहर में शौचालय जैसी सुविधा तक नहीं है। अशोक वर्मा ने विकास के नाम पर्यावरण की अनदेखी को रेखांकित किया। इस सत्र में निशांत ने भी अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन मधुरेश ने किया। पूरे विमर्श के दौरान यह बात उभरकर सामने आयी कि संसाधन को बचाकर उसका विके​​न्द्रित उपयोग और नियोजन जरूरी है।

 

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं|

सम्पर्क- +919304706646, kkrishnanang@gmail.com

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