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चर्चा मेंदेशस्त्रीकाल

हम खुद बनायेंगे अपनी पहचान

पिछले एक साल से स्टार प्लस चैनल पर ’नामकरण’ नाम का एक धारावाहिक प्रसारित हो रहा है। इस धारावाहिक के विज्ञापन को जब प्रसारित किया जाता था, तब इस धारावाहिक की मुख्य किरदार के रूप में अवनी नाम की एक बच्ची के कुछ सवाल दिखाये गये हैं, जो महिलाओं के अस्तित्व पर करारा प्रहार करता है।

इस विज्ञापन में ’अवनी’ नाम की यह बच्ची अपनी माँ के साथ एक शादी समारोह में गयी होती है, जहां के रीति-रिवाजों को देखकर उसके जहन में कई सवाल दौड़ते हैं और वह अपनी माँ से पूछती है कि “माँ यह क्या हो रहा है?” तब वहां खड़ी महिलायें और अवनी की माँ जवाब देती है कि “बेटा यह कन्यादान किया जा रहा है।” अवनी फिर कन्यादान का मतलब पूछती है, जिसके जबाव में उसे बताया जाता है कि “कन्यादान का मतलब होता है अपनी बेटी को वर पक्ष के हाथों में सौंप देना ताकि उसे उसकी पति की पहचान मिल सके और उसे उसके पति के नाम से जाना जाये।” इस जवाब को सुनकर ’अवनी’ चौंकती हुई बोलती है कि “पहले पिता का नाम और फिर पति का नाम, तो उसका खुद का नाम कहां जाता है?”

‘अवनी’ का यह सवाल पूरी महिला समुदाय के अस्तित्व पर प्रश्न-चिन्ह की तरह है जो पूरे महिला समुदाय को गहरे सोच में डाल देता है। इस समाज में महिलायें कभी पिता के पहचान से, कभी पति के पहचान से तो कभी बेटे के पहचान से पहचानी जाती हैं, जिसका मुख्य जिम्मेदार पितृसत्तात्मक सोच है, जिसे बदलने के लिये भारतीय समाज निरंतर प्रयासरत है। परिवर्तन के इस हथियार के रूप में हमारे सामने कई ऐसे धारावाहिक सामने आते रहे हैं। ’नामकरण’ नामक धारावाहिक के बाद छोटे पर्दे की दुनिया में महिलाओं का एक नया रूप सामने आया, जिसमें महिलाओं को और भी सशक्त, बिंदास और आत्मनिर्भर दिखाया गया और स्टार प्लस चैनल की इसमें खास भूमिका दिखी।
एक साल पहले स्टार प्लस से लेकर कई अन्य चैनलों में भी पहली बार भारतीय क्रिकेट टीम के द्वारा पहने हुये लिबास को बार-बार दिखाया जा रहा था, जिसमें उन खिलाड़ियों की माँ का नाम छपा था, जिसे पहली बार भारत के क्रिकेट खिलाड़ियों ने पहनकर 10 अक्टूबर 2017 को खेला।

खिलाड़ियों द्वारा अपनी माँ के छपे नाम के साथ पोशाक पहनने का एक कारण यह बताया गया कि असली हीरो हमारी माँ हैं जिनके कारण हम यहां तक पहुंचे हैं लेकिन उन्हें सदैव उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है और वे पर्दे के पीछे के हीरो बनकर रह जाती हैं, जिनकी न तो कोई सामाजिक अस्मिता होती है न कोई पारिवारिक वजूद।

इस देश में एक ओर जहां महिला-पुरूष समानता की बात हर तरफ जोर पकड़े हुए है। वहीं दूसरी तरफ जब पुरूष दिवस नहीं मनाया जाता तो फिर महिला दिवस के मनाये जाने का औचित्य समझ के परे है। समाज में प्रारंभ से ही एक बड़ा तबका यथास्थिति को बनाए रखने की पुरजोर वकालत करता रहा है। महिला-पुरूष की बराबरी की बात करने वाला तबका भी शायद उसी भीड़ का हिस्साझ है। यही वह तबका है जो एक तरफ तो काली, दुर्गा, सरस्वाती, लक्ष्मी जैसी देवियों की पूजा करता है तो दूसरी ओर बलात्कार जैसे कृत्ये को अंजाम देता है और महिला सूचक गालियों को समाज में बनाये रखने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता।

अगर भारतीय इतिहास पर नजर दौड़ायें तो हम यह साफ-साफ पाते हैं कि यहां पितृसत्तात्मक समाज का वर्चस्व रहा है, जिसमें महिलाओं के अस्तित्व को लगातार कुचला और दबाया जाता रहा है, जिसके कारण महिलायें अपने अस्तित्व के संकट से लगातार जूझती रही हैं। भारतीय परिवेश में महिलाओं को हमेशा से चारदीवारी के भीतर कैद करके रखे जाने की परंपरा रही है, जो उनके विकास में कांटे की तरह रूकावट पैदा करती रही। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस परंपरा के स्परूप में भारी परिवर्तन आया है।

कुछ दिन पहले एक खबर आयी थी जिसमें एक लड़की के द्वारा पासपोर्ट आॅफिस में लगातार झेल रही परेशानियों से तंग आकर यह अपील की जाती है कि मुझे बचपन से ही मेरी माँ ने पाल-पोशकर बड़ा किया है। मैंने कभी अपने पिता को नहीं देखा और ना हीं मेरी माँ ने कभी इसकी कमी महसूस होने दी। फिर मैं कैसे अपने पिता का नाम दूं, जिनके बारे में मुझे पता ही नहीं है। इसलिए मुझे अपनी माँ का नाम भरने दिया जाये। इस अपील के बाद पिता के नाम की अनिवार्यता को समाप्त करते हुये माँ के नाम से भी आवेदनों को स्वीकार किया जाने लगा।

भारतीय समाज में महिलाओं के संदर्भ में व्याप्त कुरीतियों से लेकर तमाम बुराईयों के संदर्भ में महिलाओं के द्वारा जिस तरीके से विरोध दर्ज किया जा रहा है, उससे एक बात तो जाहिर है कि अब महिलायें न सिर्फ अपने नाम से अपना अस्तित्व बनाने में जुटी हैं बल्कि देश को भी एक अमिट पहचान दे रही हैं। वर्तमान समय में देश-दुनिया का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां भारतीय महिलाओं ने अपना झंडा बुलंद नहीं किया होगा। हम एक तरफ दिवंगत श्री देवी के रूप में पहली महिला सुपर स्टार को देख सकते हैं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को एक बुलंदी के साथ-साथ अमिट पहचान तो दी ही साथ ही पहली महिला सुपरस्टार भी बनी और पुरूषों के बराबर मेहनताना लेकर अपनी शर्तों पर फिल्मों में काम किया और पुरूषों के कदम-से-कदम मिलाकर चलती रहीं।

 

वहीं दूसरी ओर हम पी.वी.सिंधु, सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल, बबीता और गीता फोगाट, मैरीकाॅम जैसी सफल महिला खिलाड़ियों को भी देख सकते हैं, जिन्होंने भारत का झंडा पूरे दुनिया के सामने बुलंद किया। वहीं अवनी चतुर्वेदी, भावना कांत और मोहना सिंह देश में पहली बार वायुसेना की लड़ाकू विमानों की पायलट बनी।

देश में ऐसे तमाम उदाहरण मिल जायेंगे, जहां महिलाओं के अस्तित्व और प्रतिभा को नकारा नहीं जा सकता है। इन सबके बावजूद आज भी भारतीय महिलाओं को शर्माती, सकुचाती और घूंघट में लिपटी हुये, चारदीवारी के अंदर कैद प्रतिमूर्ति के तौर पर ही देखा जाता है, जिसे तोड़ने वाले या तो प्रिया प्रकाश की तरह वायरल हो जाती हैं या खाप पंचायत की शिकार हो जाती हैं या फिर उन्हें देश निकाला देकर या कोई फतवा सुनाकर दबाने और उनके मनोबल को तोड़ने का प्रयास किया जाता है और महिला दिवस और स्त्री विमर्श के रूप में रोटी सेंकने का मौका ढूंढ़ा जाता है।

 

डाॅ. अमिता

(सहायक प्राध्यापक)
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
गुरू घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.)