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मैं कहता आँखन देखी

पत्रकारिता के इथिक्स और भारतीय मीडिया

  •  नवल किशोर कुमार

कल संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा की बैठक थी। इसके सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने अपनी-अपनी बातें कही। एएनआई की मानें तो सभी के लिए 15-15 मिनट निर्धारित थे। हमारे अपने देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने 17 मिनट का समय लिया और पड़ोसी देश (जो कभी हमारा हिस्सा था) के पीएम इमरान खान 30 मिनट तक बोलते रहे। अब जरा सोचिए कि क्या यह एक आधार हो सकता है इमरान खान की आलोचना के लिए? क्या 15 मिनट अधिक समय ले लेना और अपने देश के बारे में बातें कर इमरान खान ने कोई अनुशासनहीनता का परिचय दिया? या फिर उन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ का अपमान किया?

लेकिन एएनआई कह रहा है कि इमरान खान ने ऐसा किया। हमारे अपने देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने बहुत ही अनुशासन के साथ केवल दो मिनट का अतिरिक्त समय लिया। आप कहेंगे कि एएनआई को मीडिया माना ही नहीं जाना चाहिए क्योंकि वह केवल उन खबरों को तवज्जो देता है जो सरकार से जुड़ी होती हैं। आप चाहें तो इसे सरकार का माउथपीस भी कह सकते हैं जो कि असल में एक एजेंसी है और देश भर के अखबारों/चैनलों को खबरें देती है। इसका मतलब तो यह हुआ कि न केवल भारत के प्रधानमंत्री बल्कि भारत की मीडिया पर भी पाकिस्तान विरोध का नशा सर चढ़कर बोल रहा है। विरोध करना कोई अलोकतांत्रिक बात नहीं है। वैसे भी दुश्मन देश के साथ कोई भी देशभक्त नागिरक कैसे खड़ा हो सकता है। जब नागरिक ही खड़े नहीं होंगे तो मीडिया की क्या मजाल कि वह विरोध न करे। लेकिन विरोध के भी अपने तरीके होते हैं और होने चाहिए।

मसलन दुश्मन देश का राजा अगर अपने देश की प्रजा पर जुल्म ढाए तो उसका विरोध करना सही है। यदि वह हमारे देश के हित के विरोध में कुछ कहे तो विरोध करना जायज है। लेकिन यह क्या बात हुई कि उसने अपने देश के बारे में बताने के लिए 15 मिनट का समय अधिक ले लिया तो उसका विरोध किया जाय।

असल में आज जो भारतीय मीडिया कर रही है, वह देशद्रोह है। पत्रकारिता के साथ गद्दारी तो है ही। पत्रकारिता का इथिक्स कहता है कि वह देश के हितों के लिए हो। खबरों का मकसद देश में रहने वाले लोगों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास हो। उनके बीच भाईचारा बना रहे, वे अंधविश्वासी न हों, यह भी पत्रकारिता के उद्देश्यों में शामिल हैं। लेकिन जरा सोचिए कि आज की हमारी मीडिया क्या इन उद्देश्यों के लिए काम कर रही है?

ईमानदारी से आकलन करेंगे तो आप पाएंगे कि हमारी मीडिया अपने उद्देश्यों से बहुत दूर हो गयी है। सवाल केवल एक एएनआई का नहीं है। सवाल पूरे देश की मीडिया का है। सवाल देश और समाज के हितों का है।

बहरहाल, मीडिया की भी अपनी बंदिशें होती हैं। फिलहाल तो बंदिशें नहीं बल्कि उसे घुटनों के बल पर बिठा दिया गया है। सत्ता का चाबुक उसकी पीठ पर हर बार लगता है जब वह देश हित में सत्ता के कारनामों को उजागर करती है।

लेखक फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली के सम्पादक (हिन्दी) हैं|

सम्पर्क-  naval4socialjustice@gmail.com

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16Sep
आँखन देखी

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