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अंतरराष्ट्रीय

बांग्लादेश में चीनी कर्ज़-जाल और भारत

 

  • राजकुमार कुम्भज

 

सामान्यतः देखा जाता रहा है कि तक़रीबन पाँच हज़ार किलोमीटर क्षेत्र में फैली भारत-बांग्लादेश सीमा पर सामान्यतः शान्ति ही रहती है। भारतीय क्षेत्र में सीमा की निगरानी बीएसएफ अर्थात् बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स और बांग्लादेश सीमा की निगरानी बीजीबी अर्थात् बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के ज़िम्मे होती है, किन्तु यहाँ रहने वाली ख़ामोशी के बीच अब कुछ ख़तरे भी दिखाई देने लगे हैं। अगर उन खतरों की पहचान जल्द ही नहीं की गई, तो भविष्य में उसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। शक़ नहीं है कि भारतीय सुरक्षा बल अपना काम बेहद ईमानदारी और मुस्तैदी से कर रहे हैं, लेकिन यह इलाक़ा राजनीतिक-दृष्टि से संवेदनशील होने के कारण यहाँ कई नई बातें दिखाई दे रही हैं और वोट बैंक तथा अन्य राजनीतिक-वजहों से चीजें सुलझने की बजाया और अधिक उलझती जा रही हैं।

 

राजनीतिक-वज़हों से ही बांग्लादेश को कई मौक़ों पर न सिर्फ़ सच्चाई से दूर भागना पड़ा है, बल्कि प्रचार माध्यमों का भी सहारा लेना पड़ा है। प्रचार माध्यमों की एक तरफ़ा निर्भरता किसी भी सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं मानी जाती है। कुछ ऐसी ही स्थिति बांग्लादेश की भी हो चली है कि बांग्लादेश के प्रचार माध्यम अपनी सुविधानुसार भारतीय सेना की नकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत करने में लगे रहते हैं।

बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश नॉर्थ वेस्ट रीज़न के कमांडर ब्रिगेडियर जलाल के मुताबिक़ पिछले एक बरस में बीएसएफ के जवानों ने अठारह बांग्लादेशी नागरिक मार दिए। बांग्लादेश के मीडिया द्वारा ब्रिगेडियर जलाल के कथन को ख़ूब ज़ोर-शोर से उछालने की कोशिशें भी की जा रही हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। जब पूछा गया कि अगर सीमा पर जमा तस्कर, भारतीय सेना पर हमला करें, तो बीएसएफ के जवानों को अपने बचाव में क्या करना चाहिए ? आत्मरक्षा तो होनी ही चाहिए, कहकर ब्रिगेडियर जलाल ने मुद्दे को टाल दिया, लेकिन फिर भी नागरिकों का मारा जाना सही नहीं है।

 

बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश नॉर्थ वेस्ट रीज़न के कमांडर ब्रिगेडियर जलाल

ब्रिगेडियर जलाल जब कहते हैं कि तस्करी को पूर्णतः नियंत्रित कर पाना असंभव है, तो वे इस मुद्दे की गंभीरता को कमतर करने की कोशिश करते हैं। इससे ज़ाहिर होता है कि सच्चाई जानने-समझने और स्वीकार करने के बावजूद वे राजनीतिक तथा अन्य कारणों से बचाव की मुद्रा अपना रहे हैं। यहाँ तक कि इस संदर्भ से संबंधित तमाम जानकारी देने से भी बच रहे हैं। दरअसल बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का मूल स्वभाव पशु-कारोबार है, जिसे पशु-तस्करी कहते हैं, वही बांग्लादेश का मुख्य व्यवसाय हैं। जो भी लोग इस धंधें में शामिल हैं, वे सभी न सिर्फ़ ऊँची पहुँच वाले लोग है, बल्कि कट्टरपंथी भी हैं। संकेत तो ये भी मिल ही रहे हैं कि मुस्लिम कट्टरपंथियों और उन पशु-तस्करों ने इस धंधे पर लगभग एकाधिकार कर रखा है, जो कि बांग्लादेश के राजनीतिक समीकरण हददर्जे़ तक प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं?

 

कहा जाता है कि राजनीति के क्षेत्र में नफ़रत फैलाने का कारोबार धड़ल्ले से चलता है। बांग्लादेश भी इस काराबोर से अछूता नहीं है। बांग्लादेश में तीस्ता नदी के पानी पर भारतीय नियंत्रण को लेकर ख़ूब राजनीति हो रही है। पष्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्ज़ी पर बांग्लादेश ने आरोप लगाया है कि जब बाढ़ की स्थिति बनती है, तो तीस्ता का पानी उनकी ओर छोड़ दिया जाता है, लेकिन जब ज़रूरत होती है तो पानी रोक दिया है। इस मुद्दे को हवा देते हुए बांग्लादेश में भारत के खि़लाफ माहौल बनाने की कोशिशें भी ज़ोरों पर हो रही हैं। ममता बेनर्ज़ी को भी इसमें अपने लिए राजनीतिक फ़ायदे की संभावना नज़र आ रही है। हालांकि भारत-बांग्लादेश ने तीस्ता के मुद्दे पर बीच की राह ढूंढ़ने पर सहमति जताई है, किन्तु इसमें भारत सरकार के साथ-साथ राज्य की सहमति भी ज़रूरी है। मामला अस्मिता का बनता जा रहा है; क्योंकि पष्चिम बंगाल में वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव सामने हैं और टीएमसी-बीजेपी में मात्र तीन फ़ीसदी वाटों का अंतर चल रहा है। दोनों दलों में काँटे की टक्कर और दोनों देशों की सुरक्षा का सवाल भी सामने है। जाहिर है कि बांग्लादेश और पष्चिम बंगाल में राजनीति उबाल पर है, किन्तु कई कारणों से कई चीजे़ं बदल भी जाती हैं, बदल भी रही हैं।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर जारी शान्ति और बेहतर रिश्तों के बीच बढ़ती पशु-तस्करी एक ऐसे संकट की आहट है, जिससे दोनों देश के आपसी संबंध ख़राब हो सकते हैं। जब सब जानते हैं कि उक्त सीमाई-इलाक़ा भारत के लिए सबसे बड़ा पशु-तस्करी का कॉरिडोर माना जाता है, तो फिर दोनों ही देश अपने-अपने सीमाई-इलाक़ों में पशु-मेले लगाने की इजाज़त क्यों देते हैं? दोनों ही देशों के सीमाई-इलाक़ों से सटे,कई छोटे-बड़े पशु-मेले दिखाई देना आम बात हो गई है, बीएसएफ ने भारत सरकार से आग्रह भी किया है कि पशु-मेले सीमाई-इलाकों से दूर लगाए जाएँ, किन्तु स्थानीय समीकरण और वोट बैंक की राजनीति के चलते बरसों से इस विषय पर कोई फ़ैसला नहीं लिया गया। इन इलाकों में पशु-माफिया बेहद मज़बूत हैं। कहने को इन सीमाई-इलाक़ों में मानवाधिकार के आग्रह पर कुछ एन.जी.ओ. ज़रूर खुल गए हैं, किन्तु इन एन.जी.ओ. के संचालक या तो पूर्व कुख्यात पशु-तस्करी ही हैं या फिर उनके तार पशु-तस्करों से जुड़े मिलते हैं। भारत की ओर से लगने वाला सीमाई-इलक़ा सामान्यतः मुस्लिम बहुल होने से कई-कई बार पशु-तस्करी से जुडे़ मामलों को धार्मिक रंगत भी दे दी जाती है। ऐसे कठिन हालातों में इस क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना, न सिर्फ़ कठिन संकटपूर्ण है, बल्कि चुनौतीपूर्ण भी है।

 

इसी दौरान हम पाते हैं कि बांग्लादेश और चीन के रिश्तों में वर्ष 2016 से बड़ा परिवर्तन दिखाई देने लगा है। इधर भारतीय उपमहाद्वीप में चीनी सक्रियता बढ़ी है, जो कि भारत के लिए निःसंदेह चिन्ता का विषय है। दक्षिण-एशियाई देशों में अभी तक तो पाकिस्तान और श्रीलंका ही चीनी कर्ज़-जाल के शिकार हुए थे, किन्तु अब बांलादेश भी इस चक्रव्यूह में फँसता नज़र आ रहा है। अभी कुछ अर्सा पहले जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना चीन गई थीं, तब बीजिंग में उनका जैसा भव्य स्वागत-सत्कार हुआ था, वह चैंकाता है। उसी का नतीज़ा है कि ढ़ाका और बीजिंग ने वह समझौता कर लिया, जिसे शी जिनपिंग के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव या बीआरआई का हिस्सा माना जाता है।

 

यह भी ज़ाहिर हुआ है कि है। वर्ष 2018 में बांग्लादेश ने तक़रीबन साढ़े तीन बिलियन की जो एफडीआई हासिल की है, उसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी एक बिलियन डॉलर है, जबकि चीन ने अपनी मुद्रा युआन की क़ीमत घटा कर पूरी दुनिया में व्यापार युद्ध का ख़तरा पैदा कर देने का काम भी किया है। युआन का अवमूल्यन कर देने के पीछे चीन की मंशा यही है कि अमेरिकी वस्तुओं के मुक़ाबले चीनी चीजों, की निर्यात दरें घटें और निर्यात बढ़े। चीन की इस मंशा से अमेरिका नाराज़ है। चीन की तरह दूसरे देश भी अपनी-अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर सकते हैं और अमेरिका की ऊँची शुल्क-नीति को नुकसान पहुँचा सकते हैं, हालांकि चीन की औद्योगिक उत्पादन दरें पिछले सत्रह बरस में सबसे निचले स्तर पर आ गई हैं, फिर भी इतना तो तय है कि इस सबसे अंर्तराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा असंतुलन पैदा होगा और वैष्विक स्तर पर मौद्रिक-युद्ध की स्थित भी बन सकती है।

 

वैष्विक-दृष्टिकोण से भारत के लिए भी स्थितियाँ कम चिन्ताजनक नहीं हैं। विकास की अंधी दौड़ के चलते आज दुनिया के छोटे, मझले और अल्पविकसित देश, चीन के आर्थिक चंगुल में ठीक उसी तरह फँसते चले जा रहे हैं, जिस तरह कि 18वीं-19वीं सदी, में यूरोपीय पूंजीवाद साम्राज्यवाद के चक्रव्यूह में फँसे थे। यहाँ यह देखना दिलचस्प हो सकता है कि भारतीय महाद्वीप में चीन की सक्रियता लगातार बढ़ी है और बढ़ती जा रही है। ज़ाहिर है कि चीन की लगातार बढ़ती जा रही यह सक्रियता, न सिर्फ़ दक्षिण एशियाई देशों के लिए चिन्ताजनक है, बल्कि विश्व सामरिक दृष्टि से भी शान्ति के लिए ख़तरनाक है। ख़सतौर पर भारतीय महाद्वीप में बढ़ती जा रही चीन की सक्रियता से भारत को ख़ासतौर पर सतर्क रहने की जरूरत है।

आज दक्षिण-एशियाई देशों में पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश दूसरा सबसे बड़ा चीनी निवेष प्राप्तकर्ता देश बन चुका है। बांग्लादेश के एफडीआई में सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन की है। अब चीन वर्तमान में बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार (बीसीआईएम) इकॉनोमिक कॉरिडोर क़ायम करने के लिए बांग्लादेश में निरंतर दबाव बना रहा है। यही नहीं बांग्लादेश ने वर्ष 2030 तक अपने यहाँ जो 100 स्पेशल इकोनोमिक जोन बनाने की घोषणा की है, उनमें निवेष के लिए भी बड़ी-बड़ी चीनी-कंपनियाँ तैयार खड़ी हैं। अपने महत्वाकांक्षी ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए दक्षिण एशियाई देशों में अभी तक तो पाकिस्तान और श्रीलंका ही चीनी कर्ज़-जाल में फँसे दिखाई देते थे, किन्तु अब म्यांमार के बाद बांग्लादेश भी इसी क़तार में चलता दिखाई दे रहा है।

 

अपनी विस्तारवादी रणनीति के जारी रहते चीन ने श्रीलंका में हम्बनटोटा, पाकिस्तान में ग्वादर और म्यांमार में क्याकप्यू बंदरगाहों की सुविधा प्राप्त कर ली है। अब चीन इसी उधेडबुन में लगा है कि उसे किसी भी तरह से बांग्लादेश स्थित पायरा डे और चटगाँव बंदरगाहों में सामरिक सुविधाएँ हासिल हो जाएं। अगर चीन अपनी इस रणनीति में सफल हो गया, तो भारत की मुष्किलें बढ़ सकती हैं; क्योंकि चीन की रणनीति के चलते भारत घिर जाएगा। हालांकि बांग्लादेश ने वर्ष 2016 में अपने गहरे समुद्री बंदरगाह स्पेनदिया संबंधित उस चीनी प्रस्ताव को रद्द कर दिया था, जो चीन को, भारत स्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के बहुत ही क़रीब पहुँचा देने में अहम है, लेकिन अब बदलती दुनिया की बदलती राजनीति को देखते हुए, बांग्लादेश भी वर्ष 2016 की अपनी नीति बदल सकता है। ज़ाहिर है कि इस सबसे भारत के सामने कुछ नई सामरिक चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं। बांग्लादेश में बढ़ता चीनी कर्ज़-जाल भारत के लिए ख़तरनाक है।

 

’द सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट’ का कहना है कि शी जिनपिंग की अतिमहत्वाकांक्षी योजना ’वन बेल्ट वन रोड़’ में भागीदार बनने वाले आठ देश चीनी कर्ज़-जाल में बुरी तरह से फँसे हुए हैं, ये देश हैं – जिबुती, किर्गिस्तान, लाओस, मालदीव, मंगोलिया, मोंटेनेग्रो, पाकिस्तान और तज़ाकिस्तान। इन देशों को यह अंदाज़ा तक नहीं है कि चीनी कर्ज़-जाल की वज़ह से उनकी प्रगति और विकास योजनाएं किस तरह प्रभावित हो रही हैं? कर्ज़ नहीं चुका पाने की स्थिति में संपूर्ण परियोजना कर्ज़दाता देश के हवाले करना पड़ती है। चीन ने इधर बांग्लादेश से अपनी पारंपरिक साझेदारी को बड़ी ही चतुराई से रणनीतिक साझेदारी में बदल लिया है। भारत के रणनीतिकारों को ये सब गंभीरता से समझना चाहिए।

लेखक प्रसिद्द साहित्यकार हैं|

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