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पूर्वोत्तर : 3 राज्यों में दिलचस्प होगा चुनाव

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में होने वाले चुनाव को लेकर इस बार लोगों में काफी उत्साह दिखाई पड़ रहा है. खास करके उन राजनैतिक पार्टियों में अच्छी हलचल है, जिनको इन तीनों राज्यों में अपना रंग दिखाना है. तीनों राज्यों में से त्रिपुरा एक ऐसा राज्य है, जहाँ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पिछले 20 वर्षों से लगातार शासन में है. राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार अपना चौथा कार्यकाल पूरा करके पाचवें के लिए प्रयासरत हैं.

मेघालय और नगालैंड जनजातियों का प्रदेश है, जहाँ मेघालय में कांग्रेस शासन में है और नगालैंड में नगालैंड पीपल्स फ्रंट के टी आर जेलिएंग मुख्यमंत्री हैं. इन दोनों राज्यों में राजनीतिक उठापटक का दौर लगभग चलता रहता है. सन 2014 में केंद्र में भाजपा का शासन आने के पश्चात, उसकी यही कोशिश रही है कि कैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में उसकी दखल बने. असम, मणिपुर और अरुणाचल में भाजपा सरकार बनाने के पश्चात, उसकी यही चिंता रही है कि कैसे समूचे नार्थ-ईस्ट में भगवा झंडा सबसे उपर दिखाई दे. 18 फ़रवरी को त्रिपुरा में सबसे पहले चुनाव है. त्रिपुरा मार्क्सवाद का गढ़ रहा है. उसे ध्वस्त करने में पिछले कई वर्षों से कांग्रेस ने पूरा जोर लगा दिया है, पर राज्य की विधानसभा के चौथे, पांचवे और छठे कार्यकाल के शासन के पश्चात वे सत्ता के नजदीक भी नहीं आ सकी है. इन 20 वर्षों में माकपा ने अपना वर्चस्व बनाये रखा है. पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस ने त्रिपुरा में मुहं की ही खाई है. उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गयी है. ठीक चुनाव के पहले उसके कार्यकर्त्ता लगातार भाजपा में शामिल हो रहे हैं. धर्मनगर जैसी जगह में कांग्रेस के सभी कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों कांग्रेस से इस्तीफा दे कर भाजपा में शामिल हो गये है. सिर्फ भाजपा के ही नहीं, माकपा के कार्यकर्त्ता भी भाजपा में शामिल हो रहे हैं. उल्लेखनीय है कि 60 सीटों वाली विधानसभा में माकपा की 50 सीटें है और कांग्रेस की दो है. तृणमूल से टूट कर भाजपा में जाने वाले विधायकों की संख्या 6 है. 1 सीट कम्युनिस्ट पार्टी के पास हैl माकपा-भाजपा की बात करें तो यह देखने में आ रहा है कि माकपा के कार्यकर्ता भी भाजपा की ओर जा रहे हैं. हालांकि माकपा यह तो मान रही है कि भाजपा बढ़ रही है लेकिन वह उसे कोई चुनौती नहीं मानती. माकपा का कहना है कि भाजपा ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई है. बता दें कि पिछले दिनों ही 5000 माकपा कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हुए थे. हाल ही में वनवासी कल्याण आश्रम के प्रचार प्रमुख से निकल कर भाजपा के राज्य अध्‍यक्ष बन कर आये बिप्‍लव कुमार का कहना है, हमने कांग्रेस के अधिकांश वोट अपने पाले में कर लिए हैं और अब माकपा के गढ़ की ओर बढ़ रहे हैं. माकपा की मुख्‍य ताकत आदिवासी हैं, और भाजपा ने इस बार आदिवासियों का फ्रंट गुट इंडिजीनस पीपल्‍स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा से गठबंधन किया है. इस गुट के प्रधान एन.सी. देवबर्मा ने कहा है कि राज्य की 60 सीटों में से 51 सीटों पर भजपा चुनाव लड़ेगी और 9 सीटों पर इंडिजीनस पीपल्‍स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा चुनाव लड़ेगी. उन्होंने अपनी अलग राज्य की मांग को भी भाजपा के कहने पर छोड़ दिया है.

त्रिपुरा के चुनाव की बढ़ती लोकप्रियता का एकमात्र कारण है माकपा, जिसको हराने के लिए भाजपा नेतृत्व पूरा जोर लगा रहा है. असम के मंत्री और पूर्वोत्तर डेमोक्रेटिक एलाइंस के संयोजक एवं त्रिपुरा चुनाव प्रभारी हेमंत विश्व शर्मा अपने पूरे लव-लश्कर के साथ पिछले एक महीने से त्रिपुरा में डेरा डाले हुए हैं. इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर के 1000 बड़े कार्यकर्त्ता, जिन्हें चुनावों के अनुभव हैं, त्रिपुरा की ओर रुख कर रहे हैं. इसमें भाजपा बड़े पैमाने पर त्रिपुरा में कार्य कर रही है. उनके नेताओं का कहना है कि त्रिपुरा का चुनाव माकपा के लिए आखरी चुनाव होगा. केरल के बाद त्रिपुरा ही एक ऐसा राज्य है, जहाँ माकपा ने पिछले 20 वर्षों से अपना किला मजबूती से बनाये हुए है. भाजपा के त्रिपुरा राज्य के चुनाव प्रेक्षक सुनील दोधार के पास इस वक्त सिर्फ जिम्मेवारी है और वह है त्रिपुरा के 800 वर्ष पुराने राजघराने के एकमात्र उतराधिकारी महाराजा प्रद्योत विक्रम माणिक्य देव बर्मन को भाजपा में शामिल करवाना. जिसकी तैयारी भाजपा पिछले वर्ष से ही कर रही है. असम के भाजपा के बड़े नेता, जो इस वक्त त्रिपुरा में डेरा डाले हुए हैं, कह रहे है कि इस दफा भाजपा अपनी पूरी तैयारी के साथ त्रिपुरा में सरकार बनाने की ओर अग्रसर हैं. उसके बूथ लेवल के कार्यकर्ता त्रिपुरा के घर-घर जाकर भाजपा के पक्ष में वोट देने की अपील कर हैं. त्रिपुरा की राजधानी अगरतल्ला इस समय भाजपा के झंडों से पटी पड़ी है, जिससे यह पता चल रहा है कि भाजपा का चुनावी अभियान कितना प्रबल है.

मेघालय में विधानसभा चुनाव 27 फरवरी को कराये जाएंगेl 60 सीटों वाली विधानसभा में अभी कांग्रेस की सरकार है, जिसके फिलहाल 24 विधायक हैं. मेघालय प्रदेश के गठन के पश्चात 1970 से ज्यादातर कांग्रेस ने इस राज्य पर शासन किया है. क्षेत्रीय पार्टियाँ ऑल पार्टी हिल लीडर्स कांफ्रेंस और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने भी समय समय पर अपनी सरकार बनाई है. मेघालय कांग्रेस के अध्यक्ष सी लिंगदोह ने आज बताया कि राज्य के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा 27 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव में गारो हिल्स क्षेत्र की 2 सीटों से चुनाव लड़ने को उत्सुक है. मुख्यमंत्री आवास पर समिति की बैठक हुई जिसमें उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा की गई. लिंगदोह ने बताया कि संगमा दक्षिण पश्चिम गारो हिल्स जिले की अपनी गृह सीट अम्पाती के साथ ही गारो हिल्स के सोग्सक से भी चुनाव लड़ना चाहते हैं. यह भी देखा जा रहा है कि कांग्रेस के कई संभावित उम्मीदवार भजपा में शामिल हो जाने से कांग्रेस में विचित्र स्थिति पैदा हो गयी है. कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि पार्टी को कुछ सीटों पर उम्मीदवार ढूंढ़ने में दिक्कत हो रही है, खासतौर पर वहां जहां के विधायक कांग्रेस छोड़ नेशनल पीपल्स पार्टी या भाजपा में शामिल हो गए हैं. कांग्रेस को आज तब झटका लगा जब उत्तर गारो हिल्स जिले के रेसुबेलपाड़ा के 42 नेताओं ने पार्टी का दामन छोड़ दिया. वे एक निर्दलीय का समर्थन कर सकते हैं. इस वक्त भाजपा, जिस पर एक हिन्दू पार्टी होने का चस्पा लगा होने के कारण मेघालय, जो एक ईसाई बहुल लोगों का प्रदेश है, उसके लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बसंत पंचमी के दिन अचानक पश्चिम गारो हिल्स के एक छोटे से कस्बे तिक्रिकिल्ला पहुच गए, और लोगों को सरस्वती पूजा की शुभकामनाएं दी. तिक्रिकिल्ला, मेघालय की पश्चिम गारो पहाड़ियों का एक छोटा सा क़स्बा है, जहाँ बड़ी संख्या में कोच, हाजोंग और राभा जनजाति के लोगो रहतें है, जो ज्यादातर हिन्दू हैं. इस इलाके में उत्तर भारत से आ कर यहाँ बसने वाले लोगों की भी बहुतायत है, जिन्होंने भाजपा को भावनात्मक समर्थन दिया है.

पश्चिम गारो पहाड़ियों में भाजपा का एक बड़ा गढ़ माना जाता था. पर पिछले वर्ष केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने एक अधिसूचना पारित कर दी थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था- पशुओं को मारने और उसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. इस प्रतिबंध से पूर्वोत्तर में सभी आदिवासी राज्यों में तेज प्रतिक्रियाओं हुई, जिन्होंने पूरी दृढ़ता से यह माना कि भाजपा सरकार की यह गोमांस पर प्रतिबंध लगाने की केंद्र की एक चाल थी. यहीं से गारो पहाड़ियों में भाजपा का एक सबसे ख़राब दौर देखा गया. बर्नार्ड एन मारक, जो पार्टी की वेस्ट गारो हिल्स इकाई के अध्यक्ष थे, उन्होंने पार्टी के अधिकतर सदस्यों के साथ सामूहिक इस्तीफा देकर अपना विरोध प्रकट किया था. मारक आज भी कहते हैं कि भाजपा धीरे-धीरे पश्चिम गारो पहाड़ियों में अपना रास्ता साफ़ कर रही थी, पर उसके तानाशाही रवैये और हिन्दू कार्ड खेलने से इलाके के लोग सहम गए थे. उपर से जानवरों को मारे जाने और बिक्री पर अधिसूचना जारी करना, उसके लिए सबसे घातक सिद्ध हुआl पार्टी का विकास अब स्थिर हो गया है. उन्होंने लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वासों को मिटाने की कोशिश की है। पश्चिम गारो पहाड़ियों के लोगों का यह भी मानना है कि मेघालय के लोग प्रधानमंत्री मोदी को एक लायक और दक्ष प्रधानमंत्री मानते हैं, पर उनकी पार्टी के लोग हमेशा धर्म को आगे ले आते हैं, जिसे यह विभेद पैदा हुआ है, जो इससे पहले कभी नहीं हुआ था. इसके बावजूद भी अमित शाह का उस इलाके में जाना, इस बात को सिद्ध करता है कि भाजपा के लिए मेघालय में अभी भी सेंध लगाने की जगह बची है.

पश्चिम गारो के पांच जिलों में विधानसभा की 24 सीटें हैं, जिनकी ओर भाजपा की नजरें हैं. भाजपा का कहना है कि पश्चिम गारों पहाड़ियों के जिलों से ही उनका काफिला शिलॉंग की और बढ़ेगा. पहाड़ी राज्य के एक राजनैतिक मोर्चा यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी, जो पूर्वोत्तर में भाजपा की अगुवाई में गठित नार्थ ईस्ट डेमोकेटिक एलाइंस का एक सदस्य है, उसके अध्यक्ष पॉल लिन्दोह का कहना है कि इस बार मेघालय में एक कांग्रेस विहीन सकरार बनेगी. हालाँकि, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी ने अभी तक भाजपा से कोई गठबंधन नहीं किया है, पर चूँकि असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारें चल रही है, जिसके बाद ही नार्थ ईस्ट डेमोकेटिक एलाइंस का गठन हुआ था, ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को सत्ता से अलग रखना चाहती है. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी शिलॉंग का दौरा कर हाल ही में कई जनसभाए कर लोगों में एक बार फिर कोंग्रेस के प्रति विश्वास करने की अपील की है. इतना ही नहीं उसके पार्टी के कार्यकर्त्ता भी यह मानते हैं कि भाजपा का बढ़ता प्रभाव मेघालय में भी दिखाई दे रहा है.

एक सेकुलर पार्टी होने के नाते लोगों का झुकाव कांग्रेस की और हैl मेघालय कांग्रेस के अध्यक्ष विन्सेंट पला का कहना है कि कुछ कांग्रेस विधायक इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल जरूर हो गए हैं, जिसे पार्टी को भारी झटका लगा है, पर उनका मनोबल अभी भी मजबूत है, और एक कांग्रेस सरकार जरूर बनेगी.

इधर, पूर्वोत्तर के एक अन्य राज्य नगालैंड में भी 27 फरवरी को चुनाव होने हैंl इस समय राज्य में एक विकट स्थिति पैदा हो गयी है. राज्य की 11 राजनैतिक पार्टियों ने संयुक्त रूप यह घोषणा की है कि जब तक नागा शांति वार्ता जो पिछले कई वर्षों से चल रही है, उसका कोई नतीजा नहीं निकलता, कोई भी राजनातिक पार्टी चुनाव में अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करेगी.

उल्लेखनीय है कि सन 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में नागा उग्रवादियों के साथ एक ‘फ्रेमवर्क अग्रीमेंट’ हुआ था, जिसमें यह तय किया गया था कि भारतीय संविधान के तहत नगालिम इलाके की घोषणा की जाएगी. स्थानीय संगठन नागा होहो ने आरोप लगाया है कि इस करार को सन 2015 के बाद अमली जमा पहनाने के लिए केन्द्रीय सरकार ने बहुत कुछ नहीं किया है. नगालैंड की मजबूत ट्राइबल संस्था कोर कमेटी ऑफ़ नगल्न्द ट्राइबल होहोस एंड सिविल ओर्गनाइजेसन ने सभी राजनैतिक दलों को विश्वास में लेकर चुनाव बहिष्कार की घोषणा कर दी है, पर भाजपा और उसके मित्र दलों ने उस संयुक्त घोषणा से अपने आप को अलग कर लिया है और चुनाव में भाग लेने की घोषणा कर दी है. इधर कांग्रेस में भी चुनाव में भाग लेने की फुसफुसाहट होने लगी है. नागा होहो का कहना है कि राज्य में अगर चुनाव हुए तब नगालैंड की समस्या और अधिक जटिल हो जाएगी, जिससे वार्ता में अड़चने आने की संभावनाएं है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पहले भी सन 1998 में एनएससीएन (आईएम) ने राज्य में चुनाव का बहिष्कार किया था, पर लोगों ने इसकी अनदेखी करके राज्य में चुनाव में हिस्सा किया था. इस बार भी यही कुछ होने वाला है. शांति वार्ता में भागीदार होने के नाते, वह चुनाव का खुल कर विरोध नहीं कर पा रहा है. इस बार उसने नगालैंड सिविल सोसाइटी के जरिये मोर्चा खोला है. लोगों का यह भी कहना है कि अगर राज्य में चुनाव नहीं होंगे तब 12 मार्च के बाद राज्य में संवैधानिक संकट आ जायेगा और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाएगा, जिसे भाजपा का शासन राज्य पर हो जाएगा. इधर, नगालैंड में चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग ने तैयारी शुरू कर दी है.

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनाव इसलिए भी दिलचस्प हो गये हैं, क्योंकि भाजपा लगातार गैर-भाजपा शासित राज्यों में सेंध लगा रही है. ऐसे में त्रिपुरा जैसे राज्य की ओर बार-बार नजरें जाना स्वाभाविक है, जो वाम मोर्चे का गढ़ है.

 

रवि अजितसरिया

 

लेखक गुवाहाटी के स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।

 

 

 

 

 

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