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बचपन

मनुष्यता का बीज – भरत प्रसाद

 

  • भरत प्रसाद

 

बचपन मनुष्य की उस अवस्था का नाम है जब सांसारिक भेद भाव की अनुभूतियाँ, न जाने कहाँ सात तहों के भीतर सो रही होती हैं। यह अवस्था तो अल्हड़ता, नादानियों, शैतानियों और बचकानेपन  का दूसरा नाम है, जब तक बचपन है, तब तक खेल-तमाशे हैं, हवाई किले बनाना और बिगाड़ना है, झूठ-सच को फेट कर आपस में मिलाते रहना है। किन्तु यही बचपन वह निर्मल आँखें भी देता है, जब बाग की डाली-डाली, झूला, घर की  गलियाँ हुकुम बजाने का राजमार्ग और कच्चे, खट्टे तीते अमराइयों के अनाम फल-फूल स्वर्गीय आनन्द देने वाले अनमोल उपहार नजर आते हैं। यह वही आयु है, जब काले-गोरे रंग का भेद गायब रहता है, जब धर्म का नशा दूर-दूर तक मनो-मस्तिष्क पर कब्जा नहीं जमा पाता।

अत्याधुनिक विश्व की भयावह सच्चाई यह है कि तथाकथित सभ्य, संभ्रात और सर्वाधिकार सम्पन्न मनुष्य ने बच्चों को अपने ही अतीत का प्रतिरूप, अपने बीतते वर्तमान का भविष्य और अपनी क्षमताओं, योग्यताओं एवं असाधारण उपलब्धियों का समर्थ उत्तरधिकारी समझना बन्द कर दिया है। अब एक बड़ी फांक पैदा हो चुकी है, प्रौढ़ मनुष्य और बच्चों के बीच, ठीक जातिवाद की तरह। अब करीब प्रत्येक सफल व्यक्ति बच्चों की क्षमता, संभावना और कौशल को खुद से कमतर आंकने लगा है। उसकी बीमार, बूढ़ी और अशक्त आंखों ने बच्चों के भीतर खिलती अनमोल खुशबू को परखना बन्द कर दिया है। यह भला किसको ज्ञान नहीं कि संस्थानों से लेकर कारखानों तक बस्तियों से लेकर आवासों तक सरकारी केन्द्रों से लेकर बाजारों तक बच्चों का बेजा इस्तेमाल ही नहीं होता, इनके श्रम को डकैत की तरह लूटा ही नहीं जाता, बल्कि बहुरूपिए संभ्रात और मायाबी सत्ता के लोगों द्वारा उनका शारीरिक, मानसिक शोषण बेइन्तहा किया जाता है वो भी इंसानियत की हर सीमा पार करते हुए। इधर कुछ शहरों में फैशन ही चल रहा है लावारिश और बेसहारा बच्चो को विकलांग बनाकर, उन्हें अन्धा या लूला- लंगड़ा करके सड़कों के किनारे भीख मंगाना धीरे-धीरे अब यह धन्धे का रूप लेता जा रहा है। देश के कई जिलों में खासकर जनजातीय और पिछड़े हुए क्षेत्रों में किशोरियों की तस्करी, जिन्हें मानव व्यापार करने वाले तस्करों के हाथों भारत के महानगरों में और कई बार भारत के बाहर खाड़ी देशों में गुलाम बनाकर, दासी, रखैल या वेश्या के रूप में बेंचा जाता है। लाख सरकारी प्रयास और कड़े कानून के बावजूद 10 से 15 साल के बीच के किशोरियों की तस्करी बन्द होने तो क्या, कम होने का नाम नहीं ले रही। सालान आंकडे़ गवाह हैं कि प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में किशोरियाँ वेश्यावृत्ति की आग में झोंकी जाती हैं, जब तक वे उस नरककुण्ड से निकलती हैं, तब तक दर्जनों लाइलाज बीमारियों का शिकार हो चुकी होती हैं या फिर जीवन भर वेश्या का दाग लेकर अपमानित जीवन जीने को अभिशत। दफ्तरों, कार्यालयों, उद्योगों और आलीशान भवनों की दीवारों में कैद जो बच्चे श्रम करते हैं, उन्हें अधिकतम श्रम के बदले न्यूनतम मजदूरी दी जाती है। कई जगह तो उन्हें रोटी, कपड़ा, और रहने की छत की एवज  में 10-12 घंटे डटकर काम कराया जाता है, बगैर किसी रू-रियायत के।

युद्ध की विभीषिकाओं ने सदियों शताब्दियों से स्त्रियों, बच्चों और बुजुर्गो को बेहिसाब लीला है। पीढ़ियाँ की पीढ़ियाँ जमींदोज हो चुकी होती हैं जब तक दो देशों या उससे अधिक रास्तों के बीच युद्ध समाप्त होते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जब हिरोशिमा और नागासाकी को अपने बमवर्षक विमानों का निशाना बनाया, तो दोनों शहरों को मिलाकर कई हजार की संख्या में मासूम बच्चे काल के ग्रास हुए। पिछले कई वर्षो से आइएसआइएस सीरिया और इराक की जमीं पर विनाश-दर-विनाश का महायुद्ध खेल रहा है, जिसमें लाखों की संख्या में बच्चे अपने माँ-बाप सहित या तो वतन से आसपास के देशों में पलायन कर चुके हैं या फिर रूस, अमेरिका, फ्रांस सहित मित्र राष्ट्रों  के हवाई हमलों में नेस्तनाबूद हो चुके हैं। हवाई हमलों के बाद बच्चों की बेहिसाब मौत का जो खौफनाक  मंजर दिखाई देता है इससे तो हृदय कराह उठता है कि युद्ध को पृथ्वी की सौ तहों के नीचे सदा के लिए अभी इसी वक्त मानव जाति के बीच में दफ्न कर दो। किसी बच्चे का एक हाथ उड़ गया है तो किसी बच्चे की दोनों आँखें अर्थ हीन हो चुकी हैं, कोई बच्चा अपनी मां के स्तन से चिपका सदा के लिए सो चुका है, तो कहीं कोई पिता बमों की दहशत में बेहोश हो चुके बच्चे को कंधे पर उठाए उध्वस्त अस्पताल की ओर बदहवाश भाग रहा है। सीरिया और इराक की जमीन बच्चों के दूधिया खून से इतनी लाल हो चुकी है, जिसके निशान सदियों तक मिटाए न मिटेंगे। कुछ वर्ष पहले पाकिस्तान- विरोधी अफगानी आंतकवादियों ने  बच्चों के एक सैनिक स्कूल को निशाना बनाया, जिसमें सवा सौ के लगभग किशोर-नौजवान चन्द घण्टों में मौत का शिकार बन गये। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, इराक मौजूदा वक्त में ऐसे धधकते देश हैं, जहाँ आय दिन बम विस्फोट की सर्वनाशक लपटें उठती ही रहती हैं, जहाँ बच्चे, किशोरियाँ न स्कूल जा सकती हैं, न खुली हवाओं में सांस ले सकते हैं। मलाला युसुफजई ने आखिर यही दुस्साहस किया था न कि तालिबानी दहशतगर्दो के फरमान के खिलाफ स्कूल जाने की हिम्मत दिखाई थी, फिर क्या था- उसके साथ और कई बच्चों को बन्दूकों के निशाने पर ले लिया गया । सच कहें तो उस पश्चिमी-मध्य भूमि पर वर्षो से महानृत्य करते आतंकवाद की अन्तहीन कहानी है। किसी कलमकार में उतनी हिम्मत नहीं , जो बच्चों, औरतों, युवतियों, किशोरियों के मान-सम्मान और इज्जत आबरू के खिलाफ मचे हुए गदर को शब्दों में, गीतों, कहानियों ,कविताओं और संस्मरणों में बांध सके । बच्चों के विरूद्ध अन्धकार युग की भारत में कहानी थोड़ी अलग है। यहाँ बच्चे आंतकवाद के नहीं अव्यवस्था, कुशासन और संवेदनहीनता के शिकार हो रहे हैं। प्रतिदिन औसतन यहाँ दो-चार बच्चियों का बलात्कार  होते रहना आम बात होती जा रही है। भारत वर्ष और चीन के बीच कितना फर्क है, इसका अंदाजा जरा इस आंकड़े से लगा लीजिए-‘‘ चीन की जनसंख्या हमारे देश से अधिक है, फिर भी वहाँ कुपोषित बच्चो की संख्या हमारे देश से छः गुना कम है।’’(सेंटिनल- 28 अक्टूबर, 2013)

मानव सृष्टि के अन्य अस्तित्व की तरह ही बचपन का नैसर्गिक विकास प्रकृति करती है। ये धरती, आकाश, हवाएं, प्रकाश, पानी,सन्ध्या और सुबह और रातें सब मिलकर उसका बहुआयामी  व्यक्तित्व तराशते हैं। अभिभावक, पिता, अग्रज या जिम्मेदार व्यक्ति होने के कारण हमारा बस इतना ही दायित्व बनता है कि बच्चों को स्वस्थ सामाजिक, पारिवारिक, बौद्धिक और व्यावहारिक माहौल दें क्योंकि ये माहौल बच्चों के विकास में अनिवार्यतः उर्वरक की भूमिका निभाते हैं जिनके बगैर बच्चों का व्यक्तित्व कुंठित, बौना और अर्धविकसित रह जाना तय है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि एक बच्चे में जिस स्वभाव, ज्ञान और संस्कार का बीज बोते हैं- उसके प्रौढ़ होने पर ठीक वैसी की फसल काटते हैं। एक बच्चा हमारी संतान होने के बावजूद हमारी निजी सम्पत्ति या जायदाद नहीं, बल्कि वह अपनी समय की पहचान, चेहरा और सम्भावना भी है। हम उसे अपने रूचि, आकांक्षा या विश्वास के सांचे में ढालने की अवैज्ञानिक कोशिश करें, इससे लाख गुना श्रेष्ठ होगा कि समय के सवाल, चुनौतियाँ, प्रवृत्तियाँ और आवश्यकताएं उसे नये समसामयिक ढाचे में निर्मित करे। जो युवा धर्मवादी, पूजापाठी और मंदिरों -मठों का घण्टा बजाने वाला, पंडों, पुरोहितों, पुजारियों का चरण वंदन करनेवाला और धर्मग्रन्थों, वेदों, पुराणों के प्रति लकीर का फकीर बन गया फिर समझ लीजिए वह असमय ही बूढ़ा हो चला। निश्चय ही उसके पोंगापन्थी  अभिभावकों ने बचपन में उसे स्वस्थ वैज्ञानिक और स्वतंत्र विकास का वातावरण नही दिया। उसे मानसिक और बौद्धिक तौर पर एक गुलाम मूर्ति के रूप में गढ़ा। अब वह समय के ज्वलंत सवालों से टकराने वाला या अपने समय के प्रति जवाबदेह व्यक्तित्व नहीं, बल्कि शरीर से जवान किन्तु आंतरिक व्यक्तित्व के कोने-कोने से बीमार और बूढ़ा हो चला कैदी मात्र है। हमारे युवाओं को बार बार याद करना रखना चाहिए, ‘राहुल सांकृत्यायन’ का आह्नवान- ‘‘ हमें अपनी मानसिक दासता की बेड़ी की एक-एक कड़ी को बेदर्दी के साथ तोड़कर फेंकने के लिए तैयार होना चाहिए। बाहरी क्रान्ति से कहीं ज्यादा जरूरत मानसिक क्रान्ति की है। ’’ (दिमागी गुलामी, पृष्ट -10) निश्चय ही प्रत्येक बच्चा वर्तमान का भविष्य है। कल की आवाज, कई दिनौं का प्रातः काल, देश, समाज और व्यवस्था को प्रहरी और शिल्प कार तथा वक्त को अपनी प्रतिभा सोच, संकल्प और श्रम से नये सांचे में ढाल देने वाला भावी युग पुरूष भी है। कहना जरूरी है कि पृथ्वी जितनी ऊँचाई वाले मानव को दे चुकी है ठीक उतनी ही ऊँचाई के मनुष्यों को अभी क्या कभी भी, किसी भी युग और सदी में दे सकती है। क्योंकि परिस्थितियां या युग आज तक मनुष्य की मनुष्यता को आकाश छूने से रोक नहीं पाए, न रोक पाएंगे। और मत भूलिए कि हर पैमाने की मनुष्यता का बीज है बचपन ।

लेखक युवाकवि एवं आलोचक हैं, तथा केन्द्रीय विश्वविद्यालय शिलॉंग, हिन्दी विभाग में प्रोफेसर तथा अध्यक्ष हैं|

सम्पर्क- +919774125265, deshdhar@gmail.com

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