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शख्सियत

कहने की तड़प से तिलमिलाती कहानियाँ

 

  • अमित कुमार सिंह 

 

जया जादवानी नारी मन को छूकर उसके आलोड़न-विलोड़न से निकले लावा को ज्वलंत रूप में पेश करने वाली कहानीकार हैं।पिछले दिनों उनकी दो कहानियाँ साहित्यिक जगत की दो श्रेष्ठतम लघु-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।”हंस” के अगस्त अंक में “मैं एक टूटा टुकड़ा भर” तथा इसी माह के “नया ज्ञानोदय” के कहानी विशेषांक में “तू भी तू है मैं भी तू है” छपकर आईं।

ये दोनों कहानियाँ एकतरह से स्त्री के मन की आत्मालाप या आत्मकेंद्रित अनवरत एकालाप हैं।इसमें स्त्री की कहानी बस “मैं” और सिर्फ “मैं” को व्यक्त करने की अनथक कोशिश है।इसमें एक ओर दुनियादारी है तो दूसरी ओर खुद की खुद से आपसदारी और अपनी ज़िंदगी जीने की ललक है।

ये दोनों कहानियाँ दो दुनिया से जूझती स्त्रियों की कहानियाँ हैं।इनके मन की दुनिया से असल की दुनिया हमेशा टकराती रहती है और वह इन्हीं दोनों के बीच हमेशा डूबती-उतराती रहती है।”मैं एक टूटा टुकड़ा भर” की लड़की तो जब-तब छप्प-से छलांग लगाकर अपने भीतर कूद जाती है और फिर बड़ी मुश्किल से उस अपने मन की दुनिया से बाहर निकल पाती है।

पहली कहानी एक लड़की को “औरत” बनाने की जुगत में लगी बाहरी औरतों और उस लड़की के अंतर में बसी वह दुनिया जो उसे मुक्त गगन का परिंदा बना देती है, के परस्पर घिसाव और अविराम टकराव की कहानी है, तो दूसरी कहानी एक ऐसी औरत की है जो अपनी पूरी ज़िन्दगी अपने संतान और परिवार के लिए कुर्बान कर देने के बाद बची-खुची खुरचन ज़िन्दगी अपने मन मुताबिक़ ज़ी लेना चाहती है, लेकिन इसी मोड़ पर उसकी एकलौती संतान उससे फिर एक कुर्बानी की ज़िद करता है, जो उसे अपने ही पुत्र से एक भावनात्मक शीत युद्ध की स्थिति में ला खड़ा करता है।

जया जादवानी की कहानियाँ स्त्री-विमर्श की कहानियाँ हैं, लेकिन उसमें पुरुष विरोध कत्तई नहीं है। आज जब कि सामान्यतः स्त्री-विमर्श की रचनाएं बड़े भयंकर तरीके से पुरूष-विरोध का रूप धारण करती जा रही हैं, जया की कहानियाँ अपने सूक्ष्म शिल्प विधान के साथ एक अलग ही वितान रचती हैं। इन कहानियों में पुरूष पात्र तो खुलकर उपस्थित भी नहीं हुए हैं, बल्कि उनके अक्स ही धूप-छाहीं की तरह उभरते-मिटते रहे हैं।इस विशिष्ठ शिल्प के कारण इनकी कहानियाँ और अधिक पठनीय बन जाती हैं।

जादवानी की इन कहानियों में स्त्री मन के व्यक्त हो जाने की बेचैनी है।उनके पात्र वह सब कुछ कह जाना चाहते हैं, जिसे उन्होंने किसी के सघन दबाव में आकर वर्षों से किसी से नहीं कहा, यहाँ तक कि खुद से भी नहीं।उनमें खुद को कह जाने की जबर्दस्त तड़प और तिलमिलाहट है।ये स्त्रियाँ बाहर से भले जैसी हों लेकिन भीतर में वह तो बिल्कुल नहीं हैं जैसा कि कवि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता में इनका चित्र खिंचते हुए व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा है…
“पढिये गीता, बनिये सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घर-बार बसाइये।
लकड़ी सिली, तबियत ढ़ीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइये।”

लेखक शिक्षक हैं और साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं|

सम्पर्क- +918249895551, samit4506@gmail.com

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