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शख्सियत

सत्याग्रह और महात्मा चंपारण की उपज

 

  • अब्दुल ग़फ़्फ़ार

अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों ने चंपारण (बिहार) के किसानों से एक क़रार कर रखा था, जिसके अंतर्गत किसानों को अपने खेती लायक़ ज़मीन के 3/20 वें भाग पर नील की खेती करनी होती थी। इसे तिनकठिया पद्धति के नाम से जाना जाता था।
19वीं सदी के अंतिम दिनों में रासायनिक रंगों की खोज और उनके बढ़ते प्रचलन के कारण नील की मांग कम होने लगी और उसके बाज़ार में भी गिरावट आने लगी। इसके चलते नील बाग़ान मालिक चंपारन क्षेत्र में भी अपने नील कारख़ानों को बंद करने लगे। किसानों को भी नील का उत्पादन घाटे का सौदा होने लगा। वे भी नील बाग़ान मालिकों से किए गए क़रार को ख़त्म करना चाहते थे।
किसानों को इस क़रार से मुक्त करने के लिए उल्टे अंग्रेज़ बाग़ान मालिक किसानों से भारी लगान की मांग करने लगे। परेशान किसान विद्रोह पर उतर आए। 1916 में चंपारण के राजकुमार शुक्ल ने लखनऊ जाकर महात्मा गांधी से मुलाक़ात की और चंपारन के किसानों को इस अन्यायपूर्ण क़रार से मुक्त कराने वाले आंदोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध किया। गांधी जी ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया।

गांधी जी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘बिहार के बारे में जैसे-जैसे जानकारी बढ़ी, मेरा यक़ीन पक्का हो गया कि गांवों में स्थायी बदलाव लाने के लिए शिक्षा को बढ़ावा देना ज़रूरी है। काश्तकारों की हालत दयनीय थी। वे अपने बच्चों को कुछ आने पैसों के लिए सुबह से रात तक नील की खेती में लगा देते थे।’


सर्वप्रथम उन्होंने चंपारण के विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा और स्वच्छता के लिए ज़बरदस्त काम किया। जगह जगह स्कूल खोले और स्वयंसेवकों को तैयार किया। महात्मा गांधी जब चंपारन पहुंचे तो वहां के अंग्रेज़ प्रशासन ने उन्हें ज़िला छोडऩे का आदेश जारी कर दिया। जिसके ख़िलाफ़ गांधी जी ने सत्याग्रह करने की धमकी दे डाली। सारे किसान उनके समर्थन में प्रदर्शन करने लगे, जिससे घबराकर प्रशासन ने अपना जारी आदेश वापस ले लिया। इस तरह चम्पारन ही भारत में सत्याग्रह की जन्म स्थली बना।
चंपारन आंदोलन में गांधी जी के नेतृत्व में किसानों की एकजुटता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया। गांधी जी को भी इसका सदस्य बनाया गया। आयोग की सलाह मानते हुए सरकार ने तिनकठिया पद्धति को समाप्त कर दिया। किसानों से वसूले गए धन का 25 प्रतिशत रक़म भी वापस कराया गया।
चंपारन आंदोलन मे गांधी जी के कुशल नेतृत्व से प्रभावित होकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें महात्मा के नाम से संबोधित किया। तभी से लोग उन्हें महात्मा गांधी कहने लगे।

लेखक कहानीकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं|
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