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झारखंड

विस्थापन का दर्द और बोकारो स्टील प्लांट –  सुजाता कुमारी

 

  •  सुजाता कुमारी

 

जल, जंगल, जमीन न सिर्फ हमारे जीवित रहने की बुनियादी शर्ते हैं वरन् यह हमारी जड़ों को अपनी माटी, हवा-पानी और गुनगुनी धूप से सींचती भी है।

बोकारो स्टील प्लांट के निर्माण और उसके एवज में विस्थापन की समस्या को जब भी पीछे मुड़कर देखती हूँ मैं ठगी-सी रह जाती हूँ। हमारे पुरखों अर्थात यहाँ के वासियों की जमीन कारखाना निर्माण हेतु लगभग 60-65 साल पहले बहुत ही मामूली दाम में ली गई थी; उसके बदले में उन्हें जो सपने दिखलाए गए थे, वह दूसरी-तीसरी पीढ़ी तक आते-आते निराधार से हो गये हैं। वर्तमान में यहाँ के युवा न सिर्फ बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं वरन् उनके मूल्य, परम्परा, रीति-नीति और पहचान भी संकट की स्थिति में है।

विदित है कि वर्ष 1894 को भारत में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा भू-अर्जन अधिनियम 1894 बनाया गया था जिसके तहत सरकार विकास कार्य के लिए निजी भूमि का अधिग्रहण कर सकती थी। हमारे नेताओं ने विदेशी कम्पनियों के साथ मिलकर बड़े-बड़े करार किये। उन्हें इसके लिए जमीन-जायदाद की जहाँ कहीं भी जरूरत पड़ी, उपरोक्त अधिनियम का इस्तेमाल कर यहाँ के रैयतों से बहुत ही सस्ते मूल्य और मुआवजे पर उपलब्ध कराते रहे। फलतः विकास और प्रौद्योगिकी के लिए अंधाधुंध औद्योगिकीकरण किया जाने लगा। बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ, कल-कारखाने और उद्योग स्थापित किये जाने लगे। ये ज्यादातर उन क्षेत्रों और राज्यों में स्थापित किये गए, जिनके भूगर्भ में खनिज-संपदा और संसाधन के अकूत भंडार थे। झारखण्ड और उसके सहोदर राज्य- छतीसगढ़ एवं उत्तराखंड इसके भुक्तभोगी हैं। वर्षों से यहाँ के प्राकृतिक और मानव संसाधन दोनों का खूब दुरुपयोग और दोहन हुआ और आज भी यह बेलगाम जारी है।

विस्थापितों की रीढ़ पर खड़ा है बोकारो स्टील प्लांट:

झारखण्ड के बोकारो जिला स्थित ‘बोकारो स्टील प्लांट’ का निर्माण भी ऐसे ही करारनामे के तहत किया गया था। यह भारत के सार्वजनिक क्षेत्र में खोला गया चौथा इस्पात कारखाना है। रूस के सहयोग से माराफरी (बोकारो का पुराना नाम) में एशिया महादेश का दूसरा बड़ा कारखाना खोलने पर विचार किया गया। इसके निर्माण हेतु 10 अगस्त, 1956 को सरकार द्वारा अधिसूचना जारी की गयी, जिसके लिए लगभग 80-85 गाँवों को उजाड़ा गया। छोटे-बड़े गाँव, डीह-डूंगरी, टोला-मुहल्ला मिलाकर कुल साठ गाँव पूरी तरह और लगभग 24-25 गाँव छिटपुट रूप से प्रभावित हुए। 1960 के आस-पास कारखाना का नक्शा  बनाया गया।  24 अगस्त, 1962 को भू-अर्जन अधिनियम के तहत सरकार द्वारा रैयतों की जमीन अधिग्रहण करने हेतु एक गजट पेश किया गया और इस पर सुझाव के लिए सबको नोटिस तामिल किया गया। 25 जनवरी, 1965 को भारत और सोवियत संघ सरकार के बीच बोकारो स्टील प्लांट बनाने पर सहमति हुई जिसकी घोषणा 1 अप्रैल, 1968 को हुई। कंपनी निर्माण का कार्य 06 अप्रैल, 1968 से प्रारंभ हो गया। दिसम्बर, 1965 से ही कार्यक्षेत्र की जमीन का समतलीकरण का कार्य डी॰पी॰एल॰आर॰ (डाइरेक्टर, प्रोजेक्ट एंड लैंड रीहैबिलीटेशन) ने शुरू कर दिया था। पूरा प्लांट दस हजार एकड़ में है जिसमें सरप्लस लैंड 7300 एकड़ है।

इस कारखाना के लिए इस जगह के चुनाव के पीछे जो बातें थीं- वह थीं, यहाँ की जमीन और मजदूर, जो सस्ते में मिल गए तथा कोयला और लोहा जो  पास के खदानों से प्राप्त हो गए। साथ ही पानी, रेल और सड़क जैसी सुविधाएँ भी यहाँ मौजूद थीं ।

जमीन की नापी से लेकर उसे खरीदने और मुआवजा देने तक के क्रम में बहुत सारी गड़बड़िया शामिल थीं। मुवाबजे के लिए यहाँ के धानखेत तीन भाग में बाँटे गए- बहियार, कनारी और बाइद। नम्बर चार में टाँइड़ को रखा गया। मुआवजे के लिए जो दर निर्धारित किए वे इस प्रकार है: (1) न. का 3000/-प्रति एकड़ (2) न. का 2,000/-प्रति एकड़ (3) न. का 1,500/- प्रति एकड़ (4) न. का 400/- प्रति एकड़| इसी तरह मुआवजे के हिसाब में बाँध, गड़िया, गाछ-पात के मामूली दाम रखे गए। इसमें सरकारी मुलाजिमों ने अपने लाभ और स्वार्थ के लिए यहाँ के मूल निवासियों के साथ घोर धोखाधड़ी की। उन्होंने मूल वासियों की जमीन एजिसमें बहियार (धान की खेती के लिए सबसे उपयुक्त भूमि, जहाँ पानी का स्रोत/सावा पहले से मौजूद होता है), कनारी (भूमिगत जल का हल्का स्रोत), बाइद (जहाँ किसी माध्यम से पानी पहुँचाया जाता है), टाँइड़ (बेकार भूमि) और घर-बारी जो कुछ भी थाए ऊसर भूमि  में सम्मिलित कर दिया और सरकार को रिपोर्ट पेश की।

जमीन नापी के समय यह अन्याय होता देख कर जो किसान अमीन को कुछ घूस-पैसा दे पाये उनकी जमीन को सही दर्शा दिया गया, किंतु उन किसानों को बहुत नुकसान हुआ जो घूस नहीं दे पाये। पर्चा में एक बार जो भर दिया गया था, उसे वैसा ही छोड़ दिया गया। लोगों द्वारा इसकी शिकायत बड़े अफसर से करने पर भी कोई लाभ न हुआ। जनता ने इसका जम कर विरोध किया। कई बार मीटिंग हुई। इसी पर विचार करने के लिए यहाँ पर कई बार जनता के प्रतिनिधि विधायक श्री बिन्देश्वरी दूबे  और साथ में श्री डी. के. चैबे आए। मीटिंग हुई। उन्होंने लोगों को समझाया। भावी कारखाना से लाभ की जानकारी दी और कहा कि आपलोग खुशी-खुशी मुआवजा लेकर किनारे हो जाइए।… सरकार का दबाव है और हर हालत में यहाँ कारखाना खुलेगा। इस बात को गाँठ बाँध लें। इस बीच अफसरों ने टेबुल टाॅक और निगोसियेशन करने के लिय जनता और उनके जनप्रतिनिधि को आपस में मिल-बैठ कर बात करने की इत्तला दी।…ष्5 इस प्रकार एक तरफ कम्पनी के पढ़े-लिखे, ऊँच पदस्थ, कानून जानने वाले अफसर लोग तो दूसरी तरफ जनता के कुछ समझदार किस्म के लोग प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। जनता के प्रतिनिधि के रूप में पाँच लोग चुने गए थे। ष्एक जगदीश महतो, कुंडौरी गाँव के मुखिया जो थोड़ा बोल सकते थे…, श्री डी. के. चैबे वकील थे अफसर लोगों से वे ही बातचीत करने में थोड़े सक्षम थे पर वे भी अब तक जुनियर वकील ही थे।…. एक हम (जनार्दन गोस्वामी) रखे गए और एक कोई और थे जो ठीक से याद नहीं आ रहें, यही हम चार-पाँच लोग निगोसिएशन के लिए गये|

यहाँ के लोग सीधे-साधे और उदार थे। वे न ठीक से हिन्दी बोलना जानते थे और न ही कानून के जानकार। संभवतः जो जन प्रतिनिधि चुने गये थे, वे चतुर और व्यापार नीति के कुशल अंग्रेज अफसरों के सामने बहुत ही फीके पड़ गये। जनता गाँव से हट जाने के लिए तैयार तो थी किंतु वे जमीन का सही दाम माँग रही थी । उनके इस माँग पर कम्पनी ने कानून का हवाला देते हुए साफ-साफ अपनी नकार प्रस्तुत कर दी। लोग उनके कानूनी बातों में उलझ कर रह गये। आखिरकार परिस्थिति ऐसी बनी कि जनता वहाँ से विस्थापित होने के लिए बाध्य हो गई।

जब पेमेंट भुगतान का समय निर्धारित हुआ, तब भी तमाम तरह की पचड़ेबाजी और घोटाले हुए। भुगतान के समय सरकार ने गाँव के मुखिया लोगों को मूल हकदारों की पहचान करने का जो पावर दिया था, वे उसका दुरुपयोग कर अपने नफे में लग गये। ‘‘जब मुखिया रैयत का जान-पहचान करती तभी भुगतान होता अन्यथा नहीं होता।… मुखिया रैयत से फी नोटिस पर मनमाना फीस लेने लगे। वे पाँच रूपये से नीचे तो बात ही नहीं करते थे।…  मुखिया के सहयोगी- सरपंच, पंच, कर्मचारी, अरदली उन्हें घेरे रहतें। … मुखिया को खुलेआम कमाई करते हुए देख वे चुप कैसे बैठे रहते ? … वे रैयत के काम में कुछ न कुछ अड़गा लगा देते और भुगतान पर रोक लग जाता। डी॰पी॰एल॰आर॰ के कर्मचारी अधिकारी, जिनके हाथ में मुआवजा भुगतान करने का पावर था वे सब मुखिया-सरपंच की बात अधिक मानते थे। मानते इस लिए भी थे क्योंकि मुखिया था जमींदार का बेटा, सरपंच सौदागर, कर्मचारी जमींदार के पुरोहित और पंच थे भंडारी, जिनके हाथ में देश में जमींदारी उन्मूलन से पहले शासन का भार था।’ अर्थात् ये दोनों एक ही चरित्र के दो पलड़े थे जो जनता के शोषण में समान रूप से शामिल होने लगे। उदाहरण के लिए- किसी फलाने व्यक्ति के दो बेटे थे- जिनमें से एक की शादी हुई। कुछ दिनों के बाद वह मर गया। बहू दूसरी जगह सांघा कर चली गई और बहुत दिनों तक नहीं आयी। कुछ समय बाद फलाने का दूसरा बेटा भी मर गया। इस पर फलाने व्यक्ति का कोई वारिस नहीं रहा तो उसने अपनी सारी जायदाद भतीजे के नाम कर दी। अब उस पर भतीजे का अधिकार हो गया। पर, जब कम्पनी निर्माण हेतु जमीन का भुगतान किया जाने लगा तो मुखिया-सरपंच ने उस पर अड़ंगा लगा दिया। उन्होंने गड़े हुए मुर्दे को उखाड़ा और भुगतान रोक दिया। कहीं से फलाने की बहू को फुसलाकर बुलाया। भुगतान के बाद वे आपस में आधा पैसा बाँट लिये और बहू को सजा-धजा कर वापस भेज दिये। सदियों से गुलाम रही जनता की मानसिकता और समझ अभी इतनी ऊँची नहीं हो पायी थी कि वह मुखिया, सरपंच, अर्दली और कर्मचारी आदि का दाँव-पेंच समझ पाती और उनका विरोध करती।

कम्पनी ने कारखाना के लिए जमीन अधिग्रहण के साथ-साथ पुनर्वास के लिए भी जमीन अधिग्रहण किया था। जब पुनर्वास क्षेत्र के चुनाव और उस पर बसने का समय आया तो जो लोग पैसे वाले, थोड़े पढे़-लिखे, समझदार और चालू किस्म के थे, उन्होंने जमीन आबंटन के समय घर बनाने के लिए अच्छी और चैरस जमीन का चुनाव किया। साथ ही भुगतान के पैसें से उससे सटी हुई कुछ और जमीनें भी खरीद लीं। वहीं जो लोग गरीब-दुःखी और कम जानकार थे, उन्हें केवल पाँच डिसमिल जमीन आबंटित हुई और वह भी ऊबड़-खाबड़, ऊँची-नीची और पानी जरक जाने वाले खेत। ‘‘सरकार द्वारा आदेश था कि प्रत्येक अवार्डी को कम-से-कम पाँच डिसमिल लेना है। इससे अधिक किसी को चाहिए तो वह भी दिया जाएगा। लेकिन यहाँ बेइमानी हुई । विस्थापित लोगों को ठीक से किसी ने समझाया नहीं। यहाँ के लोग बुद्धू थे कोई अधिक जगह लेना ही नहीं चाहते थे। वहीं पुनर्वास के लिए मुखिया, मुखिया के परिवार के लोग, टिकइत को एक-एक एकड़, ठाकुर को अकेले दो-तीन एकड़ जमीन आबंटित हुईए मगर रैयत को पाँच-पाँच डिसमिल हुई। ये लोग क्या करेंगे अधिक जगह काए उधर साहब को ऐसा कह कर मना लिया और इधर यहाँ के वासिंदों को भी ऐसा ही बुझा दिया- ओह, क्या करोगे ज्यादा जमीन लेकर, यहाँ कौन रहेगा, यहाँ क्या खाओगे अभी। इस तरह एक तीर से दो निशाना साधा।’’

विस्थापन के बाद लोग अपने-अपने साइड में तम्बू-कुनबा बनाकर रहने लगे, एक बसी-बसायी हुई सृष्टि के तहस-नहस होने पर नयी सृष्टि आबाद करने के लिए। खेती-बारी ही जिनके जीने का मुख्य आधार था; जिनके खेतों को कई पीढ़ियों ने अपने खून-पसीने से सींच कर और मिट्टी-पत्थर काट-काट कर संवारा था, संजोया था, कम्पनी के बुलडोजरों ने उनके खेत-खलिहान सबको एक ही चोट में खत्म कर  दिया।

इधर ये लोग अपने को संभाल ही रहे थे उधर आने वाले समय में माराफरी एक नये बाजार के रूप में उभर रहा था। यहाँ कारखाना खुलने की खबर जब पूरे भारत में फैलने लगी तो आस-पास के शहरी लोग यहाँ कम्पनी के आस-पास जमीन खरीदने की ताक में लग गये। मतलब अभी इस्पात कम्पनी का अपना हितसाधन शुरू ही हुआ था कि छोटे-बड़े बिचैलिये-बनिये यहाँ अपनी दुकान खोलने में लग गये। कुछ तो यहाँ के अपने लोग ही जमीन की दलाली के काम में लग गये। जो लोग दलालों की चलती चलने नहीं दे रहे थे वे किसी कुछ ने अन्य तरीकों से यहाँ के लोगों को ठगना शुरू किया । उन्होंने यहाँ के लागों को पहले अपने विश्वास  में लिया और फिर धीरे-धीरे करके अपनी संपति बनानी शुरू कर दी और मौका मिलते ही खिसक लिये।

 

एक तरीका और था । कुछ छोटे किस्म के बनिया-व्यापारी लोग, जो किसी दूसरे प्रदेश से आकर कुछ समय पहले ही वहाँ बसे थे, वे यहाँ के मूल निवासियों में शामिल हो गये किन्हीं स्थानीय निवासी के वारिस के तौर पर। जाहिर है कि थोड़े से लाभ के लिए यहाँ की भोली जनता ने उन्हें अपने वारिस के रूप में अपना लिया। इस प्रकार कम्पनी द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के वे सामान हकदार बन गये। वहीं कुछ मूल निवासी ऐसे भी थे जो उचित जानकारी के अभाव और कहीं अपनी लापरवाही के कारण कम्पनी द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं से वंचित रह गये।

जब लोगों को पुनर्वासित किया गया तो उन्हें जिन बुनियादी सुविधाओं की जरूरत थी, उसकी न तो राज्य सरकार की तरफ से और न ही बोकारो स्टील प्लांट की तरफ से ठीक से व्यवस्था की गई। हाँ, केवल मिट्टी की कच्ची सड़क, गली-नाला इत्यादि का नाममात्र काम हुआ था, जो कुछ दिनों बाद किसी काम का रहा ही नहीं। सरकार का काम सिर्फ इन्हें सस्ता मुआवजा दिलवाकर जल्द से जल्द जमीन खाली करवाना था, वह उसने किया। बेघर हुए लोग क्या खायेंगे-पीयेंगे और उस सुनसान-वीरान जगह में कैसे रहेंगे, इन सबकी उन्हें कोई सुध न थी। विस्थापित लोग समय के साथ स्वयं ही अपने श्रम से सब कुछ बनाने के लिए बाध्य थे।

वहीं जब कारखाना बन कर तैयार हो गया तो उसके अधिकारियों-कर्मचारियों के रहने के लिए सेक्टर बसाये गए। इन्हें तमाम तरह की सुविधाएँ प्रदान की गईं। नये और बेहतरीन क्वाटरों के साथ-साथ साफ पानी और बिजली की सुविधाएँ भी दी गईं। उनके बच्चों के लिए नए-नए स्कूल-कॉलेज, स्टेडियम और पार्क बनाये गए। अस्पताल खोला गया। अच्छी और पक्की सड़कों का निर्माण हुआ। विस्थापित क्षेत्रों में इन सब सुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। बिजली का कनेक्शन तो लोग बहुत सालों बाद लोगों ने खुद ही लिया । ऐसे ही विस्थापित क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्र का अभाव है। जिन विस्थापित लोगों को प्लांट में नौकरी मिली थी/है, उनके परिवार का इलाज तो वहाँ हो जाता है लेकिन जिनकी नौकरी नहीं है वे लोग यहाँ-वहाँ इलाज कराने के लिए बाध्य हैं ।

कारखाना बनने के बाद लगभग 1971-72 से जब छिट-पुट बहाली होनी शुरू हुई, उस समय कम्पनी बाहरी प्रदेश के लोगों और विस्थापितों को नौकरी दिया करती थी। लेकिन 1981-82 तक आते-आते विस्थापितों की स्थिति बदतर होने लगी द्य इन्हें तमाम तरह की फजीहतों का सामना करना पड़ा अर्थात् डी॰पी॰एल॰आर॰ से नाम भेजने से लेकर थाना और मुखिया से प्रमाण-पत्र हासिल करने तक और इस पर भी मेडिकल पास करना जरूरी होता था।… डॉक्टर लोग किसी को हाइड्रोसील, किसी को कलर ब्लाइंड आदि बता देते थे जिससे उनकी उम्मादवारी में कुछ न कुछ अड़ंगा लग जाता।

विस्थापितों की वर्तमान स्थिति:

वर्तमान में बोकारो स्टील प्लांट के विस्थापितों की स्थिति बहुत दयनीय है। कारखाना खुलने के बाद यहाँ की सीधी-सादी जनता के मन में नौकरी-पेशा और बेहतर जीवन के प्रति जो आस जगी थी, वह दूसरी पीढ़ी तक आते-आते समाप्त-सी हो चुकी है। अभी एक पीढ़ी ने अपनी नौकरी पूरी की भी नहीं थी, कि दूसरी पीढ़ी पढ़-लिखकर अभी तैयार हो गईै और नौकरी देना बंद हो गया। यहाँ तक कि कारखाना निर्माण के समय चैथे ग्रेड में नियुक्ति के लिए विस्थापितों की जो सीट आरक्षित की गई थी, अब उसे भी बंद कर दिया गया है। थोड़ी-बहुत नियुक्तियाँ होती भी है तो वह ठीके के अंतर्गत, अर्थात आउटसोर्सिंग के जरिये। इसके अंतर्गत कम्पनी ने अपने ठीकेदार रखे हैं, जो अपनी शर्तों पर मजदूर रखते हैं। जरूरत पड़ने पर वे मजदूरों को बहुत ही कम वेतन पर बहाल करते हैं और जरूरत खत्म होते ही उन्हें दर किनार कर दिया जाता है। कुछ विस्थापित-बेरोजगार युवा पीढ़ी तो निराश होकर नौकरी-धंधे के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन कर चुकी हैं। वस्तुतः कंपनी अपने फायदे के लिए मजदूरों की संख्या घटा रही है जिसकी पूर्ति वह मशीनी और तकनीकी कार्य पद्धति द्वारा पूरा कर रही है।

इधर कुछ सालों से प्लांट ने कम उत्पादन और लगातार नुकसान दिखला कर समय-समय पर मजदूरों को मिलने वाली सुविधाओं, जैसे- एल टी सी, एल एल टी सी, इंसेटिव, रिवार्ड, बोनस इत्यादि पर कटौती कर दी गई  है। ओवरटाइम काम पर जो मजदूरी मजदूरों को मिला करती थी, उसे भी बंद कर दिया गया है। बिजली दर और क्वाटर भाड़ा बढ़ा दिया गया है। अधिकतर क्वाटरों को लीज पर बेच दिया गया है। आज कम्पनी की हालत यह है कि बेहतर रखरखाव और देखभाल की कमी के कारण अस्पताल, जैविक उद्यान, विद्यालयों, पार्कों और सड़कों की हालत जर्जर चुकी है।

जब कारखाना का निर्माण हुआ था तो तब उससे सटे हुए क्षेत्रों में कई छोटे-बड़े उद्योग लगाये गए थे।  बोकारो स्टील प्लांट ने अपनी कुल अधिगृहित भूमि का अनुपयोगी भाग इन छोटे कारखानों के मालिकों को लीज पर दे दिया यह कानून का उल्लंघन है। अनुपयोगी जमीन रैयतों को वापस होना चाहिए भविष्य में बोकारो प्रबंधन अपना मुनाफा देख कर कभी भी  इन  मालिकों को जमीन बेच देगी।

वर्तमान बोकारो में विस्थापित जनता की स्थिति का जायजा विस्थापितों के हक में कुल भूमि का योग, आर्थिक कार्य-व्यापार, शिक्षा और शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी के आधार पर भी लगाया जा सकता है। बोकारो के विकसित क्षेत्रों – सेक्टर-4, चास, चीराचास आदि में यहाँ की मूल जनता की अपेक्षा बाहरी क्षेत्रवासियों का व्यापार तेजी से फल-फूल रहा है। जो लोग बाहर से प्लांट के कर्मी  के तौर पर आये, वे बाद में यहीं बस गए। आज बाहरियों ने अपने नाम से बड़ी-बड़ी जमीन-जायदाद बना ली है। यहाँ तक कि छोटे-छोटे फल-सब्जियों के दुकानदारों से लेकर बड़े-बड़े शापिंग कॉम्पलेक्स और मॉल के मालिकों में भी बाहरियों की संख्या अधिक है। परिणामस्वरूप, आज बाहरी लोगों के वर्चस्व से यह पूरा शहर पट गया है और विस्थापित छोटे-छोटे पुनर्वासित भूमि में ही सिमट कर रह गये हैं।

शिक्षा के मामले में भी यहाँ के विस्थापित बाहिरियों से पिछड़े हुए है क्योंकि प्लांट द्वारा अंग्रेजी माध्यम के जितने भी विद्यालय खोले गए थे, वे सब सेक्टर के अंतर्गत ही हैं, जबकि पुनर्वासित क्षेत्र में भी इस प्रकार के विद्यालय खोलने की बहुत आवश्यकता थी। आज समय के साथ यहाँ दो-चार प्राइवेट और संस्थागत विद्यालय भी खोले गए हैं, परंतु उन विद्यालयों की फीस इतनी अधिक है कि वहाँ अपने बच्चों को पढ़ाने की क्षमता हर किसी के वश की नहीं है। हाँ, इनमें कुछ विस्थापित बच्चों ने यदि अच्छा किया है तो वे वैसे जागरूक माता-पिता की संतानें हैं जो सेक्टर में जाकर रहे हैं। बाकी विस्थापित क्षेत्र के बच्चों ने अगर भविष्य में कुछ भी अच्छा किया है तो वह अपने अतिरिक्त प्रयास और मेहनत के बल पर।

वैसे सरप्लस लैंड, जिस पर कम्पनी का कोई भी कार्य अभी नहीं हो रहा है उसे कम्पनी को एक सामाजिक दायित्व के तौर पर उनके मूल रैयतों को वापस लौटा दी जानी चाहिए। पर यहाँ भी गड़बड़ी हो रही है। ‘‘सरप्लस लैंड में वास करने वाले गाँवों को पुनर्वासित नहीं किया गया है, उल्टे उन्हें गाँव खाली करने के लिए लिखित सूचना जारी की जा रही है। इन गाँवों में विशेष कर उत्तरी क्षेत्र- महुआर, बैदमारा, शिबूटाँड़, पिपराटाँड़, बास्तेजी, महेशपुर आदि गाँवों का विकास अवरुद्ध है।… विडम्बना तो देखिये उत्तरी क्षेत्र के इन गाँवों को पंचायत के चुनाव से भी वंचित किया गया है।’ इससे इन ग्रामीणों को न तो विस्थापितों को मिलने वाला लाभ मिल पा रहा है और न ही ये सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, जैसे- वृद्धा-पेंशन, मनरेगा, लाल कार्ड, इंदिरा आवास इत्यादि का लाभ उठा पा रहे हैं।

बोकारो क्षेत्र की सबसे विकट समस्या प्रदूषण की समस्या है। बोकारो स्टील प्लांट द्वारा उत्सर्जित धुएं के गुब्बार और कचरे के कारण प्लांट के 7-8 किलोमीटर के क्षेत्रों में बसने वाले लोग फेफड़े और चमड़े से संबंधित रोग से परेशान हैं। यहाँ के चिमनियों से निकलने वाले गर्म धुएं के कारण वातावरण का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है तो तेज हवाओं के साथ बहने वाले कचरे और छाई से आसपास के किसानों के खेत दूषित हो रहे हैं। इधर प्लांट के कूलिंग पौंड की हालत भी खस्ता है। ‘‘बोकारो इस्पात संयंत्र से निकलने वाला कचरायुक्त गरम पानी को ड्रिजिंग के माध्यम से कचरे को ऐश पौंड में पहुंचाया जाता हैं और पानी को कूलिंग पौंड में, फिर यहाँ रिफाइन होकर प्लांट में जाती है। लेकिन प्रबंधन की अकर्मण्ता के कारण कूलिंग पौंड संख्या-दो का 60 प्रतिशत हिस्सा अब दलदल बन चुका है। क्योंकि कूलिंग पौंड में उस पानी के आने के 16 जगहों मे से 12 अब बंद है, मात्र चार के माध्यम से ही कूलिंग पौंड में आती है और ये चार भी राम भरोसे है।’

विस्थापितों के द्वारा उपर्युक्त समस्याओं के विरोध में कई प्रकार संगठन, जैसे- विस्थापित बेरोजगार मुक्ति संगठन, मजदूर संगठन समिति आदि बनाए जाते रहे हैं, जनाक्रोश रैलियाँ निकाली जाती रही हैं, सरकार को गुहार लगाई जाती रही है, इस लड़ाई में संगठन के नेताओं की गिरफतारियाँ भी हुई है, पर समस्या जस-की-तस बनी हुई है। आज भी कई विस्थापित अपने स्तर पर अपनी हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे लगातार संघर्षशील हैं पर अब तक की असफलता को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि उनको जीत कब तक हासिल होगी।

नोट: संदर्भ 1. 8, जनार्दन गोस्वामी ‘व्यथित’, खोरठा संस्मरण- उजरल खोंधा (माराफरी-संस्मरण), पृ॰- 12,13,25,30 एवं 31 से उद्धृत एवं अनूदित य संदर्भ 3 और 4, शिवनाथ प्रमाणिक, माटी के रंग (निबंध और संस्मरण), पृ॰- 24 और 25 तथा संदर्भ 10, रूपेश कुमार सिंह (पत्रकार), लेख- ‘विस्थापितों से धोखेबाजी और गद्दारी के नींव पर खड़ा है बोकारो इस्पात संयंत्र’, 29 जनवरी, 2017 से।

 

लेखिका स्वतन्त्र लेखन में सक्रिय हैं|

सम्पर्क- +919580110605, 99sujata@gmail.com

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