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एतिहासिकदास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (59)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

1983 में यूनिवर्सिटी सेलेक्शन कमिटी द्वारा व्याख्याता पद के लिए हुए साक्षात्कार में मैं अपने दर्जनों साथियों के साथ भागलपुर और मिथिला विश्वविद्यालय के लिए अभ्यर्थी था। भागलपुर की मेधा सूची में मेरा नाम ग्यारहवाँ और मिथिला में तेरहवाँ था। केवल अंग्रेजी के साथियों के लिए स्थिति अनुकूल रही थी, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो शेष विषयों में अधिकांशतः प्रभु-पुत्रों और एक्सटर्नल या इंटर्नल एक्सपर्ट्स के कृपापात्रों का बोलबाला रहा था। तत्कालीन विधाताओं की मर्जी ऐसी हुई कि पर्याप्त रिक्ति के रहते हुए भी भागलपुर में कुल नौ और मिथिला में कुल ग्यारह की नियुक्तियाँ हिंदी में की गयीं। अंक गणित के भंवरजाल में हमारे किस्मत के सितारे डूब गये। कहा गया था कि पैनल की आयु एक वर्ष की है। रिक्तियों को छुपाकर पैनल को एग्जॉस्ट करा देने की धूर्तता की गयी थी। किसी ने यह भी नहीं सुझाया था कि हाईकोर्ट में याचिका दायर करने फायदा हो सकता है। यहाँ तक कि यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स के घाघ रहे शारदा बाबू भी गच्चा खा गये थे। अनिल भी मेरी तरह अपने नम्बर का इंतजार करते रह गये थे। इधर हाल में पता चला है कि जिस पैनल को 1984 में एक्सपायर घोषित कर दिया गया था, उसी से 1985 में गुपचुप कुछ लोग नियुक्त किये   गये।

हमारे बैच के एक साथी ने विभागाध्यक्ष प्रो0 तिवारी के अधीन पीएचडी का निबंधन साक्षात्कार के ठीक पहले करवा लिया था। उनके फटे हुए कपड़े देखकर प्रोफेसर साहब ने वचन दे दिया था कि “अच्छे और नये कपड़ों की व्यवस्था कर देता हूँ।” वचन निभाया गया था और यह बात जगजाहिर भी हो गयी थी। हालांकि उन्होंने अपना शोधकार्य प्रो0 तिवारी के अधीन पूरा नहीं किया, बल्कि यह कहा जाए कि नियुक्ति के बाद उन्होंने फिर उनसे कभी भेंट भी नहीं की। मेरी तिकड़ी के विजय कुमार ने तो एसएससी की प्रतियोगिता परीक्षा पास करके पटना सचिवालय में योगदान कर लिया था। मैंने और विनय बेसुध ने गुरुवर राधा बाबू के अधीन पीएचडी करने का निश्चय कर रखा था। कुछ दिनों तक बेरोजगारी झेलने के बाद विनय ने मधेपुरा के एक एफिलिएटेड कॉलेज में ज्वाइन कर लिया। राधानंद भैया रामेश्वर बाबू से सम्बद्ध हो चुके थे और प्रो0 विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ से वे पहले से ही जुड़े हुए थे। राधाकृष्ण जी अपने पिताजी के मित्र गोयनका जी के मथुरा स्थित श्री कृष्ण जन्म सेवा संस्थान में प्रकाशन विभाग के प्रबंधक बनकर वहीं स्थापित हो गये थे। इस प्रकार हिंदी के साथियों में से मैं अकेला पड़ गया था। सेलेक्शन कमेटी वाली नियुक्ति में नाकामयाब रहने के बाद उस अकेलेपन ने मेरे आत्मविश्वास की चूलें हिलाकर रख दी थीं। फिर रह-रहकर ‘फटे कपड़ों के बदले नये कपड़े’ वाला प्रसंग याद आता रहता था। मैं भयंकर द्वंद्व में जी रहा था। एक तरफ अपने आदर्श रहे गुरुजी राधा बाबू का आकर्षण था और दूसरी ओर पिछले घटनाक्रम से उपजे अवसरवादी नजरिए का प्रभाव। समय बीतने के साथ यह व्यावहारिक नजरिया हावी होता गया और अगला मौका पक्का करने के उद्देश्य से मैंने एक ऐसा फैसला कर लिया, जिसके लिए मेरी आत्मा मुझे आज भी धिक्कारती है। दंगल सिंह को अंदर तक जानने वाले मित्रगण भी आसानी से यह बात पचा नहीं पाये हैं। पर, मरता क्या नहीं करता!


रेणु जी मेरे सर्वाधिक प्रिय लेखक हैं। मैं राधा बाबू के निर्देशन में रेणु के कथा साहित्य पर शोध-कार्य करने का अभिलाषी था। उस मोह से मुक्त होने में कुछ हफ्तों का समय लगा और अंततः पहुँच गया विभागाध्यक्ष प्रो0 तिवारी की शरण में। कथा साहित्य की बात तो उन्होंने स्वीकार कर ली, किन्तु लेखक रेणु के बदले हो गये हजारी प्रसाद द्विवेदी। “हजारी प्रसाद द्विवेदी की कथाभाषा” विषय पर मैंने शोधकार्य का निबंधन करवा लिया। दो साल में काम पूरा कर लेने का लक्ष्य बनाकर मैं पूरे मनोयोग से जुट गया था। पीजी होस्टल के रिसर्च विंग में डेरा जम चुका था। शुरुआती तीन-चार महीनों में टेक्स्ट खोजने और जुटाने का काम किया फिर लगभग रोज ही लालबाग प्रोफेसर कॉलनी स्थित प्रो0 तिवारी के आवास जाने-आने का सिलसिला शुरू हो गया। उनकी पत्नी डॉ0 अन्नपूर्णा शुक्ला पीजी मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर थीं। उनकी प्रकृति उनके नाम को सार्थक करती थी। शायद ही कोई दिन ऐसा रहा होगा जब उनकी रसोई का खाना मैंने नहीं खाया हो। छुट्टी वाले दिनों में दो-तीन बार खाना-पीना हो जाता था। करीब एक साल के बाद जूनियर बैच के मित्र विनोद कुमार चौधरी (सम्प्रति प्राचार्य, प्रोपेल इंटरनेशनल स्कूल, पन्नुचक, भागलपुर) और अरुणजय कुमार राय (सम्प्रति अध्यापक, हिंदी, संत जोसेफ्स स्कूल, कहलगाँव) भी प्रो0 तिवारी के अधीन शोधकार्य में निबंधित हो गये। विनोद जी से होस्टल में रहते हुए पहले ही जुड़ चुका था। एमए के बाद वे बीपीएससी की तैयारी के लिए अन्य चार मित्रों के साथ पटना प्रवास कर रहे थे। कुछ दिनों बाद एक दिन मिले तो मैंने कहा, “कहाँ गोली-डंडा वाली नौकरी के मोह में फँस गये हैं! आइए, पीएचडी करके शिक्षक बनिए और राष्ट्रसेवा करिए।” मेरी बात का ऐसा असर हुआ कि फिर वे वापस पटना नहीं गये। यह मित्रता की नयी तिकड़ी की शुरुआत थी, जो आज भी कायम है और निरंतर दृढ़तर हो रही है। इस बीच राधा बाबू से जुड़े कुछ साथियों के माध्यम से जानकारी मिलती रही थी कि वे मुझे बहुत याद करते हैं। उन्हें पता है कि मैं लज्जित होने के कारण उनसे नहीं मिल पा रहा हूँ। उनकी इच्छा है कि मैं बेझिझक उनसे मिलूँ। किन्तु मेरा अपराधबोध हमेशा मुझे रोकता रहा और मैं उनसे मिलने नहीं जा सका। हाँ, एकलव्य की भाँति उनसे दूर, उनसे मिली सीख और आदर्शों का संधान करता रहा था।
एक दिन संत जोसेफ्स स्कूल, भागलपुर के प्रिंसिपल फादर डॉ0 वर्गीस पनंगट्ट ने तिवारी सर से मिलकर कहा कि उनके स्कूल में एक अच्छे हिंदी शिक्षक की कमी है। इसके चलते दो साल पहले खुले उस स्कूल के जमने में बाधा आ रही है। यदि कोई अच्छा शिष्य हो तो भेजें। सर ने मुझे और विनोद जी को कहा कि निर्णय कर लें, किसे जाना है? ‘पहले आप, पहले आप’ के चक्कर में हम एक महीने से भी अधिक समय तक फैसला नहीं कर सके। इस बीच फादर का फोन सर को आता रहा। उकता कर उन्होंने खुद फैसला सुना दिया, “पवन, तुम ज्वाइन कर लो। बहू और बेटे को गाँव से ले आओ।”
(चौंकिये मत! तबतक मेरे बेटे का जन्म हो चुका था। वह कथा लम्बी है। उसपर अलग से अगली किस्त में लिखूँगा।)

छोटकी बहन अंजू के लिए लड़का ढूंढ़ने के कठिन अभियान में बड़का पाहुन के साथ लगा था, सो योगदान की तीसरी बार बढ़ाई गयी तिथि को मैंने संत जोसेफ्स स्कूल की सेवा शुरू की। वेतन था 720 रुपये महीना। पीजी होस्टल में रहना और टीएनबी कैम्पस के उस पार स्कूल में पढ़ाना। शाम को सर के साथ बैठना। शनिवार की शाम वाली लोकल से कहलगाँव जाना फिर सोमवार की सुबह पहुँचकर स्कूल पकड़ लेना। यह नया सिलसिला चल पड़ा।

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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