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दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (68)

 

  • पवन कुमार सिंह 

 

बाबूजी के बीमार होने की खबर मिली। तत्काल सुधा को साथ लेकर और बेटे को नानी के घर छोड़ रवाना हो गया। कहलगाँव राज घाट से उस पार तिनटंगा घाट के लिए उस समय मोटरलंच सेवा चलती थी, जो अब भी चालू है। लंच से स्कूटर सहित गंगा पार करके गाँव जाना तब बेहतर विकल्प था जो विक्रमशिला सेतु बन जाने के बावजूद कहलगाँव के लोगों के लिए अब भी बेहतर मार्ग है।
हम घर पहुँचे तो यह देख कर गहरा दुख हुआ कि बाबूजी निष्क्रिय-से बिछावन पर पड़े थे। माई पास बैठी उनके पाँव के तलवे सहला रही थीं। बाबूजी के चरणस्पर्श किये तो जीवन में पहली बार उनके मुँह से आशीर्वाद नहीं सुन सका। उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। आँखें खुली थीं, जिनमें चमक बढ़ गयी, तो समझ में आया कि उन्होंने हमें पहचान लिया है और उन्हें अच्छा लगा है। उनके बाएँ अंगों को लकवा मार गयात था। मुँह टेढ़ा होने के साथ बायाँ हाथ-पाँव निष्प्राण हो गया था। दाएँ अंगों में भी कोई ताकत नजर नहीं आ रही थी। होश संभालने से लेकर अबतक बाबूजी को जिस रूप में देखा था, उससे हमारे मन में उनकी बड़ी विराट छवि बनी हुई थी। यह कल्पनातीत था कि बाबूजी कभी अक्षम और लाचार भी हो सकते हैं! अपने कुलदेवता नृसिंह में मुझे बाबूजी दिखाई देते थे। देवत्व के गुणों से युक्त शेर की हनक वाले एक दिव्य पुरूष के रूप में मैं बाबूजी को देखता था। हनक ऐसी कि लाचार हो जाने के पहले कभी नजर उठाकर उनसे बात करने का साहस नहीं हुआ था। उन्हें उस दयनीय दशा में देखना कितना त्रासद था, इसका वर्णन कर पाना सम्भव नहीं दिखता। ढेर सारी दवाएँ उन्हें खिलानी पड़ रही थीं। उन्हें सहारा देकर उठाना और बल लगाकर बैठाये रखना होता था तभी कुछ खा पाते थे। भूख या इच्छा समाप्त होने पर मुँह फेर लेते थे, किन्तु दवा देखते ही चिढ़ जाते थे। लिक्विड दवा किसी तरह पी जाते थे। टेबलेट या कैप्सूल खिलाना शेर के मुँह में हाथ डालने के समान हिमाकत का काम था। दाँत भींचकर मुँह फेर लेते और बाघ की तरह गुर्राते थे। चिकित्सकों का कहना था कि नियमित दवाओं के सेवन से वे अवश्य ही स्वस्थ हो जायेंगे। माई दवा खिलातीं थीं, किन्तु बाबूजी की गुर्राहट से उनकी कंपकंपी छूट जाती थी। इसी परिस्थिति में मेरे मन में बसे बाबूजी के आतंक का कुफ्र टूटा था। दवा खिलाने की जिम्मेवारी मैंने ले ली थी। इसी क्रम में बाबूजी को अपने शरीर से सटाकर उनसे बात कर सकने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। ऐसा सौभाग्य जो दुर्भाग्य के रास्ते चलकर आया था। दवा खिलाते समय वे आँखें कड़ी करके मुझे घूरते और गुर्राते हुए मुँह फेर लेते थे। उनकी गुर्राहट से मेरा साहस हिल जाता था। पर कोई अन्य विकल्प नहीं था सो मुझे उस स्थिति का सामना करना ही होता था।हिम्मत जुटाकर कहता, “बाबूजी, दवाई खाना जरूरी है। खाइएगा तो जल्दी ठीक हो जाइएगा।” इससे अधिक उनसे बोल नहीं पाता था। बहुत धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था। बाएँ अंगों में हरकत आने लगी थी, दाएँ अंगों में ताकत बढ़ रही थी और बोली साफ होने लगी थी।

इधर सुधा को एक दूसरे मोर्चे पर संघर्ष करना पड़ रहा था। बाबूजी को सम्पूर्ण शरीर में दवा वाले तेल की मालिश जरूरी थी। यह काम माई, बहन या नौकरों को करना होता था। लिहाज व पर्दाप्रथा के चलते भौजी और सुधा को बाबूजी की सेवा से वंचित रहना पड़ रहा था। घूँघट के बिना बहुओं को उनके सामने जाना भी मना था तो शरीर छूकर मालिश करने का सवाल कहाँ था! सेवा करने की प्रबल इच्छा के बावजूद यह लाचारी सुधा के लिए बेबर्दाश्त थी। दो-तीन दिन तो किसी तरह कसमसाते हुए कट गया, पर अन्ततः उसने विद्रोह कर दिया। एक ही झटके में उसने वर्षों से चली आ रही रूढ़ि की चूलें हिलाकर रख दीं। उसने निर्णायक स्वर में माई से जाकर कहा, “माय, है हमरा से बर्दास्त नै होतै। है कोन बात होलै कि बेटी बाबूजी के छूतै आरु पुतोहू नै। हम्मे नै मानबै। बाबूजी के तेल लगैबै। लोगें शिकायत करैछै त करै।” माई निरुत्तर हो गयीं। इस क्रांतिकारी कदम के लिए रूढ़िग्रस्त परम्परा को राह देनी पड़ी और सुधा की जीत हो गयी। गाँव-गोतियारी में इस बात की खूब चर्चा हुई, जिसमें निंदा कम और प्रशन्सा अधिक थी। इसी बहाने भौजी का बंधन भी खुल गया। अब दोनों बहुएँ बाबूजी की सेवा-सुश्रुषा करने लग गयीं। शुरुआत में बाबूजी ने भी इस प्रयास का कुनमुनाकर विरोध किया था, पर बाद में सामान्य हो गये थे। सघन चिकित्सा व देखभाल से उनकी तकलीफ निरंतर कम होती गयी। खुद उठकर बैठने और सहारा लेकर चलने लगे थे। बोली थोड़ी लटपटाती जरूर थी, किन्तु याददाश्त पूरी तरह वापस आ गयी थी। आश्वस्त होकर हम दोनों कहलगाँव लौट आये थे। उसके बाद हरेक शनिवार की शाम गाँव जाना और कभी रविवार की शाम या कभी सोमवार की सुबह कहलगाँव आने का सिलसिला शुरू हो गया। उस समय अपने मित्र राजीव रंजन गोपालपुर अंचल में सीओ थे। गंगा घाट उसी अंचल के अधीन था। राजीव जी ने अपने मातहतों को मेरे विषय में हिदायत दे रखी थी। इसका लाभ मिल रहा था। कभी घाट पहुँचने में देर-अबेर हो जाती तो भी मुझे छोटी डेंगी से पार करवा दिया जाता था। कभी अधिक की छुट्टियाँ मिलने पर सुधा भी गाँव जाती थीं। लगभग छः महीने तक बाबूजी के स्वास्थ्य में सुधार होता रहा। वे छड़ी के सहारे अपने बरामदे से चलकर दरवाजे और चौखंडी तक जाने लगे थे। बातचीत भी करने लगे थे। उनके चाहने वाले लोग और परिजन काफी खुश थे, किन्तु यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी।

जनवरी 1988 के तीसरे सप्ताह में बाबूजी पर लकवा का दूसरा हमला हुआ जो जानलेवा था। उस दिन हम गाँव में ही थे। अहले सुबह माई ने यह निराशाजनक सूचना दी कि बाबूजी फिर शिथिल हो गये हैं, बल्कि लगभग बेहोश होकर पड़े हैं। बिना कोई समय गँवाए हम उन्हें लेकर पूर्णिया चल पड़े थे। साथ में माई, भैया, सुधाकर बाबा और लल्लू चाचा थे। उस समय हमारे बच्चन बाबा (स्व0 दिनेश कुमार सिंह) बिहार के स्वास्थ्य मंत्री थे। रास्ते में बूथ से उन्हें फोन किया गया तो उन्होंने कहा कि हम सीधे पूर्णिया सदर अस्पताल पहुँचें, वहाँ सारी व्यवस्था वे ठीक करवा रहे हैं। हम वहाँ पहुँचे तो सचमुच सबकुछ सही था। हमें किसी को खोजने या कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ी। सीएस सहित सभी आवश्यक लोग इंतजार करते हुए मिले। बाबूजी को फौरन आईसीयू में भर्ती कर दिया गया। उनकी सघन चिकित्सा शुरू हो गयी। दोपहर बाद मंत्री जी के आदेश से पटना से तीन विशेषज्ञ डॉक्टर हवाई जहाज से पूर्णिया पहुँच गये थे। बाबूजी के सम्पूर्ण शरीर में तरह-तरह के पाइप और तारों के सहारे कई यन्त्र व उपकरण लगा दिये गये। बाबूजी बेहोश थे। चिकित्सकों ने कहा कि वे कोमा में थे। अगले दिन फिर दो अन्य डॉक्टर राजधानी से भेजे गये थे। उनकी देखरेख में चिकित्सा चलती रही, किन्तु कोई फायदा नजर नहीं आ रहा था। तीसरे दिन शाम को सीएस ने एकांत में भैया और मुझसे बात की। उन्होंने कहा, “देखिये, आपके पिता जी के जीवन के लिए जरूरी सारे अंग जवाब दे चुके हैं। इनकी किडनी, लिवर, लंग्स और हार्ट सभी में समस्या है। किसी के सुधरने की उम्मीद नहीं है। मंत्री जी के दबाव में हम सारा कुछ कर रहे हैं, जिसका कोई फायदा नहीं होना है। फालतू में रोगी के बदन का गंजन हो रहा है। बेहतर होगा कि अब इन्हें कष्ट से मुक्ति मिल जाए। आप अनुमति दें तो रोगी के शरीर में लगाए गये उपकरणों को निकाल लिया जाए। ईश्वर से प्रार्थना करें कि वे आपके पिता जी को अपने पास बुला लें।” फैसला लेना बहुत कठिन था। धर्मसंकट की स्थिति थी। हम दोनों भाइयों ने दो मिनट मंत्रणा करके सीएस को बता दिया कि हमें कोई आपत्ति नहीं है। वे जैसा उचित समझें, करें। सीएस ने इस बाबत हमें मंत्री जी से बात कर लेने का आग्रह किया और फोन भी मिला दिया। मैंने उन्हें सारी बात बतायी तब उन्होंने सीएस से पूरा हाल सुनकर उन्हें वही निर्देश दिया जैसा हमने पहले सोचा था। रात सभी प्रकार के यंत्रादि खोल दिये गये। केवल ऑक्सीजन मास्क लगा रहने दिया गया था। 20 जनवरी 1988 की भोर में बाबूजी ने अंतिम साँस ली। हम सभी भाई और बहनों के सिर से पिता की छत्रछाया जुदा हो गयी। बाबा की मृत्यु के मात्र ग्यारह वर्ष बाद बाबूजी भी हमें छोड़ गये। बाबा की आयु सौ वर्ष के करीब थी किन्तु बाबूजी सत्तर साल भी पूरा नहीं कर सके। तीन दिनों तक उनकी अस्वस्थता की गंभीर स्थिति को देखकर हम उनकी अवश्यम्भावी मृत्यु के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुके थे, साथ ही हम असीम कष्ट से उनकी मुक्ति की कामना भी कर रहे थे। शायद यही कारण था कि उनकी मृत्यु के बाद हम सभी पुरूष सदस्य रो नहीं सके। केवल आँखें गीली होकर रह गयी थीं। माई चुपचाप सुबक रही थीं। उनके मुँह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी और न हममें से किसी में यह साहस था कि उनसे बात कर सकें। यंत्रचालित-से हम घर रवानगी की तैयारी कर रहे थे। बच्चन बाबा को खबर दे दी गयी थी। सीएस ने स्वयं आकर मृत्यु प्रमाणपत्र दे दिया था और हम बाबूजी का मुर्दा शरीर लेकर गाँव चल पड़े थे।

बाबूजी का शव लेकर घर पहुँचा तो कुछ ही मिनटों में दरवाजे पर मेला-सा लग गया। चाहने वाले लोग जार-जार रो रहे थे। औरतों की भीड़ जुटी तब माई के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। गाँव- जवार के गरीब-गुरबों की जरूरतें पूरी करने वाले दानवीर का इस तरह विदा हो जाना लोगों के बर्दाश्त के बाहर था। सम्पूर्ण इलाके को अपनी कोशिशों से हरियाली से भर देने वाले महामानव के प्रयाण से पेड़-पौधे भी रो रहे थे। घर के चारों तरफ फैले बाबूजी के लगाये बाग-बगीचे को निहारते हुए अचानक मेरे मन में एक विचार कौंध गया। मैंने भैया कहा तो उनसे सहमति मिल गयी। निर्णय लिया गया कि बाबूजी का दाह-संस्कार केवल चंदन और हुमाद की लकड़ी से किया जाएगा। मजदूर आम की लकड़ियाँ चीरने में जुट गये थे। मैंने उन्हें कहा कि वे चंदन और हुमाद की एक-एक शाखा काटकर उसकी लकड़ी चीर दें। दरवाजे पर बाबूजी का लगाया चंदन और हुमाद का एक-एक पेड़ था जो युवा हो चुका था। दोनों में जड़ के पास से ही दो शाखाएँ बन गयी थीं। हमने दोनों की एक-एक शाखा कटवा दी। इस अनोखे फैसले की बात से भीड़ में खुसुर-फुसुर होने लगी और साथ-साथ राजनीति भी शुरू हो गयी। विघ्नतोषी हितैषियों ने फतवा जारी कर दिया। “ऐसा अजगुत हुआ है कहीं! सभी पूर्वजों को आम की लकड़ी से जलाया गया। चंदन और हुमाद तो बिध पुराने के निमित्त चिता में दी जाती है। बिना आम की लकड़ी के मृतक को पैठ मिलबे नहीं करेगा। ई दंगल और दमन सिंह का मगज़ घूम गया है तो क्या हम लोग भी बौरा गये हैं जो ऐसा अनरथ होने देंगे।” अधिकांश बड़े-बूढ़ों की भी यही राय थी। हमारे मना करने के बावजूद लोगों ने ट्रैक्टर ट्रॉली पर आम के कई मोढ़े लदवा दिये थे।
गंगा-कोसी के संगम पर श्मशान घाट में बाबूजी को चिता पर लिटाने के पहले तक मैं बिल्कुल नहीं रोया था। जबर्दस्ती लाये गये मोढ़े बेकार नहीं गये। चिता के चारों कोने में व जमीन पर उन्हें बिछाकर ऊपर चिता सजाई गयी। उसपर बाबूजी को लिटाया गया। उनके सिर के नीचे एक मोटी लकड़ी लगायी जाने लगी कि मेरा धैर्य जवाब दे गया। मैं जोर-जोर से बुक्का फाड़कर रो पड़ा। जिन बाबूजी के झक्क सफेद तकिये पर सिर रखने का साहस और सौभाग्य किसी संतान को नहीं मिला, उनके माथे के नीचे लकड़ी का मोढ़ा! इतनी क्रूर सच्चाई का सामना करना मेरे बूते के बाहर था। कुछ लोग मुझे संभालकर चिता से बहुत दूर ले गये। मैं वहीं से बाबूजी के पार्थिव शरीर को पंचतत्व में विलीन होते देखता रहा था।
(क्रमशः)

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं|
सम्पर्क- +919431250382,
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